Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Devotion

भक्ति

456 सूत्र · पृष्ठ 5 / 7

मन्दिर में दो तरह के दर्पण होते हैं काँच के दर्पण में बाहरी चेहरा दिखता है और भगवान् रूपी दर्पण में आत्मा का स्वरूप दिखाई देता है।
भक्ति
अभिषेक, पूजन, स्तोत्र, जाप, ध्यान एवं शास्त्र स्वाध्याय आचार्यों ने गृहस्थों के लिए देवपूजा के समय ये छ: आवश्यक बतलाये हैं।
भक्ति
तुम निरखत मुझको मिली मेरी सम्पति आज। कहाँ चक्री की सम्पदा कहाँ स्वर्ग साम्राज्य।
भक्ति
पावन मेरे नयन भये तुम दरस तैं, पावन पाणी भये तुम चरणन परस तैं। पावन मन हो गयो तिहारे ध्यान तैं, पावन रसना मानी तुम गुण गान तैं।। पावन भयी पर्याय मेरी, में भयो पूरण धनी। मैं शक्ति पूर्वक भक्ति, कीनी पूर्ण भक्ति नहीं बनी।। धन धन्य ते बड़भागि भविजन, नींव शिवघर की धरी। वर क्षीरसागर आदि जल मणिकुम्भ भरि भक्ति करी।।
भक्ति
इन्द्रभूति गौतम को भगवान् के दर्शन से ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तपाराधना की प्राप्ति हुयी थी।
भक्ति
जिन पूजा के प्रभाव से तीनों लोकों के इन्द्रों से पूजित महिमाशाली तीर्थंङ्कर पद की प्राप्ति होती है।
भक्ति
जो जिनेन्द्र भगवान की एक बार भी समीचीन रूप से पूजा करता है वह संसार के सुखों को भोगकर मोक्ष प्राप्त करता है।
भक्ति
विषय-कषाय से हाथ-पैर धोकर मन्दिर जी में प्रवेश करना चाहिए।
भक्ति
जिनेन्द्र भक्ति, पूजा तथा आर्षग्रन्थों का स्वाध्याय अविपाक निर्जरा का कारण तो है ही किन्तु मोक्ष का भी कारण होता है।
भक्ति
अकृत्रिम जिन प्रतिमाओं के दोनों ओर श्री देवी और सरस्वती देवी स्त्री का रूप धारण कर खड़ी हैं, सर्वाल्हाद और सनतकुमार नाम के यक्षदेव खड़े हैं।
भक्ति
लोग भगवान् का भजन तो करते हैं पर श्रद्धा नहीं करते, आप भगवान् का भजन भले ही न करें पर उनके ऊपर श्रद्धा अवश्य करें, किन्तु 'अति भक्ति से प्रबल अन्तराय कर्म की शक्ति क्षीण अवश्य हो जाती है'।
भक्ति
माता-पिता के घर, मित्र के घर, गुरु के घर और ईश्वर के घर जाने के लिए निमन्त्रण की जरुरत नहीं होती है।
भक्ति
मन्दिर, सम्मेदशिखर आदि आयतन की पूजा करते हैं एकेन्द्रिय या जड़ की नहीं।
भक्ति
स्वाध्याय में अहङ्कार हो सकता है पर भक्ति व जाप में अहंकार की सम्भावना कम होती है।
भक्ति
राजगृही के पाँचों पर्वत भगवान् वासुपूज्य को छोड़कर सभी तीर्थंङ्करों के समवसरणों के आगमन से पवित्र हुए हैं।
भक्ति
जो तीनों कालों में निर्वाण भक्ति पढ़ता है वह स्वर्ग-मोक्ष का पात्र होता है।
भक्ति
पुजारी प्रार्थना करता है, हे प्रभो! तुम्हे जो मिला है वह मुझे भी मिल जाय और भिखारी याचना करता है कि हे प्रभु! तुमने जो छोड़ा है वह मुझे मिल जाय।
भक्ति
सुमेरु समान निश्चल भक्ति संसार नाश कर मुक्ति लाभ कराती है।
भक्ति
भक्त जन को सब विद्या सिद्ध हो जाती हैं, भक्ति के विना जो साधु खूब चरित्र पालता है उसका तप बञ्जर भूमि में बोये शाली धान के बीज के समान निष्फल है।
भक्ति
मन से पञ्च परमेष्ठी के गुणों में अनुराग होना भाव पूजा है एवं हाँथ जोड़ना बैठकर नमस्कार करना आदि द्रव्य पूजा है।
भक्ति
माथे पर तिलक यह सङ्केत करता है, कि भगवान् का आदेश हमें शिरोधार्य है। भगवान् पर विश्वास ही जीवन है और सन्देह ही मृत्यु है।
भक्ति
हे जिनदेव! मैं निरन्तर आपकी वन्दना कर प्रणाम करता हुआ अन्य सीमित फल की याचना नहीं करता हूँ, आप में ही मेरी वह सुदृढ़ भक्ति विद्यमान रहे, जो समस्त स्वर्ग और मोक्षरूपी फल को देती है, यह वर मुझे दीजिये।
भक्ति
एक गरीब, अन्धी एवं निःसन्तान वृद्धा ने भगवान को प्रसन्न कर लिया, भगवान ने कहा एक बार में जो वरदान चाहो माँग लो, उसने कहा! मैं अपने नाती को सोने की थाली में खीर खाते देखूँ, अर्थात् उस वृद्धा ने एक ही वरदान में आँखे, बेटा-बहुएं नाती, धन सम्पत्ति सब कुछ माँग लिया, इसी प्रकार भक्त को 'मेरे न चाह कछु और ईश रत्नत्रय निधि दीजे मुनीश' रत्नत्रय माँग लेने पर तीन लोक की कोई भी सम्पत्ति शेष नहीं रहती है, इसलिए रत्नत्रय ही माँगना चाहिए अन्य कुछ नहीं।
भक्ति
बालक ने ए.बी.सी.डी. आदि सारी वर्णमाला भगवान् को सौंप दी और कहा हे भगवन्! इन्ही शब्दों से सारी स्तुतियाँ बनती हैं, आपको जो पसन्द हो वह स्तुति आप बना लेना और हमारी भक्ति स्वीकार कर लेना, यह निश्छल भक्ति कहलाती है।
भक्ति
दूरदर्शन नहीं देव दर्शन करो क्योंकि घर ममता बढ़ाता है और मन्दिर समता बढ़ाता है।
भक्ति
मैनासुन्दरी की भक्ति भोगों के लिए नहीं, पाप को पुण्य रूप सङ्क्रमण करने के लिए थी।
भक्ति
देवदर्शनप्रशंसा- प्रात: काल उठकर मङ्गलों के देने में समर्थ, पाप प्रणाशक, श्रेष्ठ पुण्य के हेतु तथा सुर-असुरों के द्वारा सेवित चरण-कमलों से युक्त श्री जिनेन्द्र प्रतिमा का अच्छी तरह दर्शन करना चाहिए।
भक्ति
हे भगवन्! आज आपके दर्शन से मेरे नेत्र कृतकृत्य हो गये हैं, जन्म सफल हो गया है और सब पाप विलीन हो गये हैं।
भक्ति
हे देव! आपके चरण युगल के दर्शन से कर्मों का क्षय होता है, दर्शन करने वाला व्यक्ति बोधि तथा समाधि को, संसार की निकटता को, पाप के मूल कारण के विनाश को तथा परलोक में सर्वार्थसिद्धि के विपुल सुख को प्राप्त होता है।
भक्ति
नाक, मुख, नेत्र, हृदय, नाभि मण्डल के भग्न होने पर उस प्रतिमा की पूजा नहीं करनी चाहिये।
भक्ति
अगर प्रतिमा जी गिर जाती है तो उसी प्रतिमा का एक सौ आठ कलशों से अभिषेक एवं एक सौ आठ मन्त्रों से हवन करें।
भक्ति
जिनबिम्ब के गिर जाने का जो प्रायश्चित है वही प्रायश्चित अस्पृश्य मनुष्य के प्रतिमा को छू लेने पर है।
भक्ति
चेहरे पर लगी कालिख को देखकर, सबसे पहले साफ करने का भाव होता है उसी प्रकार जिनदेव रूपी दर्पण को देखकर आत्मा पर लगी कर्म-नोकर्म रुपी कालिख को छुटाने का पुरूषार्थ करना चाहिये।
भक्ति
सीता जी को लङ्का से लाने के लिए पुल बाँधने की आवश्यकता पड़ी, हनुमान जी पत्थर पर राम का नाम लिखकर पानी में डालते थे, तो पत्थर पानी में नहीं डूबता था, रामचन्द्रजी ने पानी में पत्थर डाला तो डूब गया, तब रामचन्द्र जी ने हनुमान जी से पूँछा आप पानी में पत्थर डालते हैं तो डूबता नहीं इसमें क्या रहस्य है? तो हनुमान जी बोले भगवान्! जो आपके हाँथ से छूट जाएगा वह डूबने से कैसे बच सकता है, इसी प्रकार जिसके हृदय में सच्चे देव-शास्त्र-गुरु के प्रति श्रद्धा नहीं है वह संसार समुद्र में डूबने से कैसे बच सकता है?
भक्ति
कुम्हार का दर्शन- एक व्यक्ति को मुनिराज ने देवदर्शन का नियम दिया तो वह कहने लगा की हमारे घर से मन्दिर दूर है, तो मुनिराज ने कहा तुम्हारे घर के सामने कौन रहता है? व्यक्ति बोला! 'कुम्हार', तो मुनिराज ने कहा प्रतिदिन उसी के दर्शन कर लिया करो, तो व्यक्ति तैयार हो गया और प्रतिदिन कुम्हार के दर्शन करने लगा, एक दिन कुम्हार सुबह-सुबह मिट्टी लेने दूर खान पर चला गया, तो व्यक्ति ढूँढ़ते हुए खान पर गया, कुम्हार मिट्टी खोद रहा था तो उसे स्वर्ण मोहरों से भरा एक घड़ा मिला, व्यक्ति दर्शन करके लौट रहा था, तो कुम्हार ने उसे देख लिया और सोचा कि लगता है इसने ये खजाने का घड़ा देख लिया है और ये अगर राजा के पास जाकर बोल देगा तो खजाना भी जाएगा और मैं भी जेल जाऊँगा, तो उस व्यक्ति को बुलाकर कहा कि देखो आधा तुम ले लो और आधा मैं ले लेता हूँ, व्यक्ति सोचता है कि इस कुम्हार के नियम पूर्वक दर्शन से इतना लाभ हुआ है तो भगवान् के दर्शन करने से पता नहीं कितना लाभ होगा और उसने प्रतिदिन देवदर्शन का नियम ले लिया।
भक्ति
एक राजा की असमय में मृत्यु हो गई, उसका बच्चा छोटा था उसे ही राजा बना दिया, पड़ोसी राजा ने मौके का लाभ उठाना चाहा, पर बच्चे के मंत्रियों ने कहा राजन्! राज्य तो राजा सम्भालेंगे, जब तक वे छोटे हैं तब तक हम सहयोग करेंगे, मन्त्री की बात सुनकर राजा ने कहा यदि हमारे प्रश्नों का बच्चा उत्तर दे देगा तो हम राज्य नहीं लेगें, सबको चिन्ता हुई, माँ ने बच्चे को रात भर समझाया बेटा राजा ऐसा पूँछे तो ऐसा उत्तर देना, प्रात: काल जब जाने लगा तो बच्चे ने कहा माँ! यदि राजा ने इन प्रश्नों में से कोई भी प्रश्न नहीं पूँछा तो क्या मैं अपनी कल्पना से भी उत्तर दे सकता हूँ? माँ ने कहा! हाँ बेटा पर लाज रखना, बच्चा राजा के सामने उपस्थित हुआ, राजा ने उसके दोनों हाँथ पकड़ लिये और कहा आप पराधीन हो अपनी रक्षा कैसे करोगे? तब बच्चे ने उत्तर दिया, राजन् विवाह के समय जब लड़का कन्या का एक हाँथ पकड़ता है तो पूरे जीवन रक्षा करनी पड़ती है, आपने तो मेरे दोनों हाथ पकड़ लिये हैं, अब हम निश्चिन्त हैं, राजा ने प्रसन्न होकर छाती से लगा लिया, राज गद्दी दे दी, इसी प्रकार जो भगवान के दोनों चरण की शरण ले लेता है उसे किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रहती है।
भक्ति
मन्दिर जाने के लिये घड़ी देखकर शीघ्र आरम्भ का त्याग करना मोह की मन्दता है एवं मन्दिर में घड़ी देखकर पूजा बन्द करना मोह की तीव्रता है।
भक्ति
भगवान की पूजा और पत्नि से प्यार में नौकर नहीं रखा जाता है।
भक्ति
तलवार का नाम लेने से जीभ नहीं कटेगी पर परमात्मा का नाम लेने से कर्म जरूर कटेंगे पर आज मन्दिरों में भक्त कम और भिखारी ज्यादा आते हैं।
भक्ति
विसर्जन की कथा- गणेश जी के भक्त, नाव में बैठकर, नदी पार कर रहे थे, तूफान को आया देखकर सभी डर रहे थे, अचानक नाव में पानी भरने लगा, तो हर भक्त गणेशजी का स्मरण करने लगा, गणेशजी नाव पर दौड़े-दौड़े आये, कुछ नृत्य के दृश्य दिखलाये, नाव थर्राने लगी, भक्त की जान मुंह में आने लगी, भक्त बोला, भगवान हम मर रहे हैं, ऐसे समय में आप ये क्या कर रहे हैं? गणेशजी बोले प्रिय भक्तों, जिस तरह तुम मुझे विसर्जन करने के लिये ले जाते हो, तब तुम जिस तरह नाचते गाते खुशियाँ मनाते हो, मैं भी बस उसी क्रम को दोहरा रहा हूँ, और नाच गा कर तुम्हे डुबा रहा हूँ।
भक्ति
अन्धा मन्दिर जा रहा था, किसी ने कहा तुम्हें दिखता नहीं है तो मन्दिर क्यों जाते हो? उसने कहा! हमें नहीं दिखता तो क्या भगवान को भी नहीं दिखता है?
भक्ति
मन्दिर के शिखर को देखकर प्रणाम करना, मालूम नहीं मन्दिर तक पहुँच पाते कि नहीं।
भक्ति
मूर्ति में मूर्तिमान के दर्शन करना चाहिए।
भक्ति
'प्रभू चरण छह तीन रहू, दुनिया से छत्तीस' भगवद् भक्ति 63 की तरह, संसार से उदासीनता 36 की तरह होना चाहिए।
भक्ति
भगवान् के विहार की महिमा- जिस मार्ग से भगवान् का विहार होता है, वह मार्ग अपने चिन्हों से एक वर्ष तक यह प्रकट करता है कि वहाँ से भगवान् का विहार हुआ है, तथा रत्नवृष्टि से वह मार्ग ऐसा सुशोभित होता है जैसे नक्षत्रों के समूह से चन्द्रमा सुशोभित होता है, उस समय मन्दबुद्धि मनुष्य तीक्ष्णबुद्धि के धारक हो जाते हैं, समस्त हिंसक जीव अहिंसक हो जाते हैं और भगवान् के विहार से अनुगृहीत भूमि में दो सौ योजन तक उपद्रव आदि नहीं होते हैं और पचास वर्ष तक कोई उपद्रव-दुर्भिक्ष आदि नहीं होता है, भगवान् के समीप रहने वाले लोगों को खेद, पसीना, पीड़ा तथा चिन्ता आदि कुछ भी उपद्रव नहीं होता है।
भक्ति
जिनेन्द्र भगवान् के स्तवन करने से अनेक विघ्न, शाकिनी, भूत, सर्प एवं विष भी निर्विषता को प्राप्त हो जाते हैं।
भक्ति
देवाधिदेव के चरणों की पूजा समस्त दुःखों का नाश करने वाली है, मनोरथों को पूर्ण करने वाली है, काम का नाश करने वाली है, इसलिए विनय पूर्वक नित्य पूजा करनी चाहिये।
भक्ति
लोग विष को दूर करने के लिए मणि, मन्त्र, औषधि, रसायन आदि को ढूँढते हैं पर वे यह नहीं समझते कि हे भगवन्! वे सब आपके ही पर्यायवाची नाम हैं।
भक्ति
जिन भगवान् की पूजा के भाव से मेंढक क्षण भर में ऋद्धिधारी देव हो गया, फिर सच्चे भक्त मोक्ष प्राप्त कर लें तो क्या आश्चर्य है? वे महावीर भगवान् मेरे नेत्रों के पथगामी बनें।
भक्ति
विशुद्ध ज्ञान और निर्मल चरित्र के रहते हुए भी यदि जिनेन्द्र भगवान् में उत्कृष्ट भक्ति नहीं है, तो फिर मिथ्यात्व रूपी मुद्रा से अङ्कित मोक्ष मन्दिर का द्वार कैसे खोला जा सकता है।
भक्ति
जिसको संसार समुद्र को सुखाना हो, वह जिनेन्द्र भगवान् के चरणों की सेवा करे, यदि जिनेन्द्र भगवान् के चरण न मिलें, तो स्वेच्छानुसार भावपूजा, जाप, ध्यान आदि कर लें, पर कुदेवों का पूजन न करें, क्योंकि प्राणी भूख मिटाने के लिए अन्न मिलता है तो ही खाता है, अन्यथा भूखा बैठा रहता है, पर भूख मिटाने के लिए कालकूट जहर नहीं खाता है, कुदेव कालकूट जहर से भी ज्यादा हानिकारक हैं।
भक्ति
हे जनबांधव! मैंने आपका नाम सुना, पूजा की, दर्शन भी किए, किन्तु भक्ति पूर्वक हृदय में धारण नहीं किया इसलिए दुःखों का पात्र हुआ हूँ, क्योंकि भाव शून्य क्रिया पूर्ण फलदायी नहीं होती है।
भक्ति
जिनेन्द्र भगवान् में मेरी भक्ति हो, जिनेन्द्र भगवान् में मेरी भक्ति हो, जिनेन्द्र भगवान् में मेरी भक्ति हो, हमेशा हो, हमेशा हो, हमेशा हो, पूज्यपाद महाराज जी ने ऐसी भावना व्यक्त की है।
भक्ति
हे भगवन्! आपका स्तवन करने से अनेक भवों के पाप क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं, जिस प्रकार रात्रि कालीन अन्धकार सूर्य की किरणों से क्षण भर में नष्ट हो जाता है।
भक्ति
हे भगवन्! समस्त दोषों से रहित आपका स्तवन तो दूर रहे, आपका नाम ही संसारी प्राणियों के पापों को नष्ट करता है, जिस प्रकार सूर्य दूर ही रहता है, किन्तु उसकी किरणें ही तालाबों में कमलों को विकसित कर देती हैं।
भक्ति
देवों का आगमन, आकाश में गमन, चमर आदि समवसरण की विभूति तो मायावियों में भी देखी जाती है अतः इन से नहीं किन्तु वीतरागता, सर्वज्ञता और हितोपदेशिता से भगवान् आप महान् हैं।
भक्ति
बिम्ब के फल बराबर जिनालय बनवाता है या यव के बराबर भक्ति पूर्वक प्रतिमा स्थापन करवाता है उसके पुण्य का वर्णन सरस्वती देवी भी नहीं कर सकती, फिर जो जिनप्रतिमा-जिनालय दोनों बनवाते हैं, उनका तो कहना ही क्या?
भक्ति
नन्दीश्वर द्वीप में अकृत्रिम प्रतिमाओं का अभिषेक होता है।
भक्ति
जो श्रावक खाली हाथ मन्दिर जाता है वह मन्दिर से खाली हाथ ही वापस आता है।
भक्ति
भगवान् का पादमूल मेरे अन्दर की पवित्रता का कारण है अतः काया की आराधना नहीं काया के माध्यम से भगवान् के गुणों की आराधना की जाती है, तभी स्तुति होती है और ऋद्धियाँ भी प्रकट होती हैं।
भक्ति
देव-शास्त्र-गुरू का चेहरा नहीं स्वरूप का दर्शन-चिन्तन किया जाता है।
भक्ति
सिद्धों का नाम लेने वाले भी पूज्य हैं, धन्य हैं व गुणी हैं।
भक्ति
जिनबिम्ब एक्स-रे के समान होता है, दर्पण केमरे के समान होता है।
भक्ति
हे जिनेन्द्र! चर्म मय नेत्र से भी आपका दर्शन होने पर वह पुण्य प्राप्त होता है, जो भविष्य में केवलज्ञान प्राप्त कराता है, फिर अन्तर्मन से दर्शन करने पर तो शीघ्र ही केवलज्ञान प्राप्त होता है।
भक्ति
सेठ की सेवा के लिए गरीब बालक तीर्थ यात्रा में गये थे, सेठ से पहले ज्वाँर के दाने चढ़ाये और भगवान् से पहले प्रार्थना की और कहा ‘भगवन् क्षमा करना हम गरीब हैं’ और आकर सो गये, सेठ ने सोचा मुझसे पहले कौन मोती चढ़ा कर गया है, पता चला बच्चों ने ज्वाँर के दाने चढ़ाये थे वे मोती बन गये तब सेठ का गर्व चूर-चूर हो गया, भक्ति के लिए सोना-चाँदी की नहीं श्रद्धा और समर्पण की आवश्यकता होती है।
भक्ति
नारद जी गङ्गा स्नान करने गये, घाट पर एक कन्या रो रही थी, पचास-पचास साल के ज्ञान और वैराग्य नामक दो मृत पुत्र पड़े थे, कन्या का नाम था भक्ति, पञ्चम काल में ज्ञान और वैराग्य बूढ़े हो गये किन्तु भक्ति रूपी माँ युवती है अर्थात् संगीत से सब झूमने लगते हैं अतः क्षयोपशम के अनुसार अपने ज्ञान और वैराग्य को बढ़ाते हुए भक्ति के माध्यम से अपना कल्याण करना चाहिए।
भक्ति
सास अपनी बहु को मन्दिर ले गयी उसे गाय को देखकर दूध की याद आ गयी राक्षस का स्टेच्यु देखकर डर गयी, सास ने कहा इसी प्रकार भगवान् के दर्शन से अपने स्वरूप की याद आ जाती है, इसलिए जिनदर्शन जरूरी है, अतः हमें अन्य को न देखकर अपने आदर्श को देखना चाहिए जिससे हमें उन जैसा बनने की प्रेरणा मिलती रहे।
भक्ति
पाकिस्तान में चालीस जैन परिवार थे, आतङ्कवाद से परेशान होकर मन्दिर सहित पाकिस्तान छोड़ने का विचार किया हवाई अड्डे पर अङ्ग्रेज गवर्नर ने कहा प्रति व्यक्ति इतना सामान ले जा सकते हो आस्थावान लोगों ने अपनी सम्पति वहीं छोड़ दी जयपुर में घास की झोपड़ी में भगवान विराजमान किये परिश्रम करके पहले पूजन द्रव्य फिर भोजन द्रव्य खरीदते थे कुछ दिन बाद पहले मन्दिर फिर घर बनवाया। जो खाली हाथ आये थे, वास्तव में जिसके पास धर्म है वह खाली नहीं कहलाता है, बाद में वे सब मालामाल हो गये, अतः आस्था रखकर आयतानों की रक्षा करना चाहिए।
भक्ति
सीता जी की प्राप्ति के बाद रामचन्द्रजी ने हनुमान जी से कहा मैने अङ्गद, विभीषण सुग्रीव आदि को प्रत्युपकार के रूप में एक-एक पद दिया है, तुम्हे कौन सा पद चाहिए? उन्होंने मना किया रामचन्द्रजी के आग्रह पर बोले मैं दो पद लूँगा, रामचन्द्रजी ने कहा तुम्हारी मर्जी, हनुमान जी बोले मर्जी नहीं अर्जी है वैसे पद से मद आता है, रामचन्द्रजी की स्वीकृति के बाद हनुमान जी ने दोनों पैर पकड़ लिये और कहा प्रभु ये दोनों पद हृदय में रहेंगे तो तीन लोक की सम्पति मिल जायेगी, बाकी के पद अपद हैं, आपद के आस्पद हैं एवं पद में राजी होने वाला भूतपूर्व बन जाता है तथा प्रभु में राजी होने वाला अभूतपूर्व बन जाता है, रामचन्द्रजी ने हनुमान जी के शीश पर आशीष का हाथ रख दिया।
भक्ति
दश अतिशय हैं जन्म के, दश ही केवलज्ञान। चौदह होते देवकृत, अतिशय चौतिस जान।।
भक्ति
रत्नवृष्टि की बिक्री- एक वणिक अपना खरीदा हुआ माल बेचने के लिए बहुत से अमूल्य मणि लेकर जरासन्ध से मिला, उन मणियों को देखकर राजा जरासन्ध ने उससे पूँछा कि ये मणि तुम कहाँ से लाये हो? वणिक ने कहा हे स्वामिन्! ये मणि उस द्वारिका पुरी से लाये हैं जहाँ अत्यन्त पराक्रमी राजा कृष्ण जी रहते हैं, यादवों के स्वामी समुद्रविजय और उनकी रानी शिवादेवी को जब तीर्थंङ्कर श्री नेमिनाथ जी उत्पन्न हुये थे, तब पन्द्रह मास तक देवों ने रत्न वृष्टि की थी, उन्हीं रत्नों में से ये रत्न लाये हैं, तात्पर्य यह है कि दिव्य रत्नों का भी व्यापार होता है।
भक्ति
तरु अशोक के निकट में, सिंहासन छविदार, तीन छत्र सिर पर लसें, भामण्डल पिछ्वार। दिव्य ध्वनि मुखते खिरे, पुष्प वृष्टि सुर होय, ढौंरै चौसठ चमर जस, बाजे दुन्दुभि जोय।।
भक्ति
ज्ञान अनन्त, अनन्त सुख, दरश अनन्त प्रमान। बल अनन्त अरिहन्त सो, इष्ट देव पहचान।।
भक्ति
जन्म जरा तृषा क्षुधा, विस्मय आरत खेद, रोग शोक मद मोह भय, निद्रा चिन्ता स्वेद। राग-द्वेष अरु मरण जुत, ये अष्टादश दोष, नाहीं होत अरहन्त के सो छवि लागत मोष।।
भक्ति
समकित दर्शन ज्ञान अगुरुलघु अवगाहना। सूक्ष्म वीरजवान निराबाध गुण सिद्ध के।। सिद्धों का सुमिरण करे, पाप रहे न कोय। करम झरत क्षण एक में, निज गुण सिद्धि होय।।
भक्ति