Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Devotion

भक्ति

456 सूत्र · पृष्ठ 6 / 7

जन्म के दस- अतिशय रूप, सुगन्ध तन, नाहीं पसेव निहार। प्रिय हित वचन, अतुल्य बल, रुधिर श्वेत आकार।। लक्षण सहस रु आठ तन, समचतुष्क सण्ठान। वज्रवृषभ नाराच जुत, ये जनमत दश जान।।
भक्ति
केवलज्ञान के दस- योजन शत इक में सुभिख, गगन गमन मुख चार। नहीं अदया उपसर्ग नहीं, नाहीं कवलाहार।। सब विद्या ईश्वरपनो, नाहीं बढ़े नख केश। अनिमिष दृग छाया रहित दश केवल के वेश।।
भक्ति
देवकृत चौदह- देवरचित हैं चार दश, अर्धमागधी भाष। आपस माहि मित्रता, निर्मल दिश आकाश।। होत फूल फल ऋतु सबै, पृथ्वी काँच समान। चरण कमल तल कमल है, नभते जय जयवान।। मन्द सुगन्ध बयार पुनि, गन्धोदक की वृष्टि। भूमि विषै कण्टक नहीं, हर्ष मयी सब सृष्टि।। धर्म चक्र आगे चले, पुनि वसु मङ्गल सार। अतिशय श्री अरहन्त के, ये चौतीस प्रकार।।
भक्ति
शास्त्रों का हो पठन सुखदा, लाभ सत्सङ्गति का। सद् व्रतों का सुजस कहके, दोष ढाकूँ सभी का।। बोलूँ प्यारे वचन हित के आपका रूप ध्याऊँ। तो लों सेऊं चरण जिन के मोक्ष जो लों न पाऊँ।। तव पद मेरे हिय में मम हिय तेरे पुनीत चरणों में। तव लों लीन रहूँ प्रभु जब लों न पाया न मुक्ति पद मैंने।।
भक्ति
जब चिन्तये तब सहस फल, लक्षा गमन करेय। होय अनन्त फल तब, जब जिनवर दर्शेय।।
भक्ति
पूजा तीन प्रकार की, छोटी-बड़ी-मझ्झोल। जैसा मौका देखिये, वैसी लीजे खोल।।
भक्ति
जिनेन्द्र भगवान में, चतुर्विध सङ्घ में, शास्त्र में, साधु में, पञ्चकल्याणक आदि महोत्सवों में निश्छल भक्ति होना भव्य के मोक्ष की सिद्धि कराने वाली भक्ति कहलाती है।
भक्ति
एक शची इन्द्राणि अपने जीवन में असंख्य तीर्थंङ्करों के कल्याणक मनाती है, पहली बार के प्रथम दर्शन से ही शची इन्द्राणि को सम्यग्दर्शन हो जाता है।
भक्ति
मैं अन्धेरी रातों में बेधड़क चलता हूँ। बुद्धि- मैं प्रकाश में भटक जाती हूँ। श्रद्धा- मैं पाषाण को भगवान् बना देती हूँ। तर्क- मैं भगवान को पाषाण बना देता हूँ।
भक्ति
जिनेन्द्र देव की पूजा शान से नही भक्ति से होती है, भक्ति के लिए शान्ति की आवश्यकता होती है।
भक्ति
बुझते हैं वे दीप जो तैल से जला करते हैं। हम तो हैं वे दीप जो आस्था से जला करते हैं।।
भक्ति
जिस प्रकार उत्तम सेवक स्वामी के कार्य में सदा दासभाव रखता है उसी प्रकार सिद्ध प्रतिमा, जिनबिम्ब, जिनमन्दिर, शास्त्र और चतुर्विध सङ्घ में दासभाव अर्थात् किसी प्रकार की बाधा या आवश्यकता होने पर उसे दूर करना, ज्ञान से पर के दुःख दूर करना पर वात्सल्य है परीषह उपसर्ग से पीड़ित होकर शुभाचार ज्ञान-ध्यान में शिथिलता न लाना स्व वात्सल्य है।
भक्ति
धर्मात्मा में, व्रतों में, स्वाध्याय में, जिन पूजन में वात्सल्य करो, वात्सल्य गुण के प्रभाव से ही समस्त द्वादशाङ्ग विद्या सिद्ध होती है, सिद्धान्त सूत्र (ज्ञान) में और सिद्धान्त के उपदेशक उपाध्याय (ज्ञानी) में सच्ची भक्ति के प्रभाव से ज्ञानावरण कर्म का रस सूख जाता है जिससे समस्त विद्याएं सिद्ध होती हैं, वात्सल्य गुण के धारक को देव भी नमस्कार करते हैं और वात्सल्य से ही अठारह प्रकार की बुद्धि ऋद्धि, दो प्रकार की आकाश गामिनी ऋद्धि, अनेक प्रकार की चारण ऋद्धि, अनेक प्रकार की विक्रिया ऋद्धि, तीन प्रकार की बल ऋद्धि, सात प्रकार की तप ऋद्धि, छ: प्रकार की रस ऋद्धि, आठ प्रकार की औषध ऋद्धि, दो प्रकार की क्षेत्र ऋद्धि इत्यादि अनेक ऋद्धियाँ प्रकट होती हैं।
भक्ति
जिसको जिनवाणी में वात्सल्य नहीं है, विनय नहीं है, उसको यथावत् अर्थ का ज्ञान नहीं होता, विपरीत अर्थ ग्रहण करता है, मनुष्य के जीवन का आभूषण वात्सल्य है, देव-शास्त्र-गुरू और दया धर्म में वात्सल्य निर्वाण का कारण है।
भक्ति
भक्त को मूर्ति में पत्थर नहीं दिखता, अहङ्कारी को भगवान् नहीं दिखते हैं।
भक्ति
पद में राजी होने वाला भूत पूर्व बन जाता है, और प्रभु मे राजी होने वाला अभूतपूर्व बन जाता है।
भक्ति
हे भगवन्! आपके लिए दुराये जाने वाले चामर झुककर ऊपर जाते हुये मानो ऐसा कहते है, की जो भगवान् को नमस्कार करता है, उसकी चामरों की तरह ऊर्ध्व गति होती है।
भक्ति
अभिमानी पिता के अनेक उपाय करने पर भी मैनासुन्दरी का भाग्य, किसने बनाया- एक बार मैनासुन्दरी ने पिता से कह दिया कि मैं अपने भाग्य का खाती हूँ, पिता ने गुस्से में आकर कुष्ट रोगी राजकुमार से मैनासुन्दरी का विवाह कर दिया, उसने सिद्धचक्र महामण्डल विधान में सिद्धों की आराधना करके गन्धोदक अपने पति को लगाया जिससे पति सहित सात सौ लोगों का कुष्टरोग ठीक हो गया था।
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धन्वन्तरि और विश्वानुलोम–धन्वन्तरि और विश्वानुलोम दोनों मित्र थे, एक जैन और एक जैनेत्तर, विश्वानुलोम ने सुन रखा था कि हाथी कुचल दे तो भी जैन मन्दिर मे नहीं जाना चाहिए, जबकि जैनेत्तर शास्त्र में जन मन्दिर पाठ था, जिसका अर्थ 'वेश्यालय अथवा मदिरालय' होता है, बाद में लोगों ने ईर्ष्या द्वेष के वश 'ज' के ऊपर दो मात्राएँ चढ़ा दीं, जिसका अर्थ जैन मन्दिर हो गया, जिससे लोग वेश्यालय और मदिरालय से तो परहेज करते नहीं हैं, जैन मन्दिर से परहेज करते हैं, इसलिए जब भी वह जैन मन्दिर के सामने से निकलता तब कानों में अङ्गुलि लगा लेता जिससे कोई शब्द कान मे न पढ़ जाए, एक बार उसे पैर में ठोकर लग गई जिससे उसके कान की अङ्गुलियाँ निकल गईं, तो 'देवों कि परछाई नहीं होती' यह शब्द कान मे पढ़ गया, उसकी पत्नी को कोई अदृश्य होकर परेशान करता था, उसने देखा तो उसकी परछाई थी, इसलिए उसने घर मे धुआँ करके उसके आँखों का अञ्जन दूर कर दिया और अपराधी को राजा के लिए सौंप दिया, वह विपत्ति से छूट गया, तब से उसका जैन मन्दिर के प्रति द्वेष दूर हो गया और वह मन्दिर जाकर दर्शन करने लगा और प्रवचन सुनने लगा, प्रवचन के बाद सबने नियम लिया तो उसने भी नियम लिया 'विना सात कदम पीछे हटे गलत काम नहीं करेंगे'। एक बार रात को बारह बजे जुआ खेलकर लौटा तो देखता है कि मेरी पत्नि किसी पुरुष के साथ सो रही है, तुरन्त तलवार निकाल कर मारने के लिए तैयार हुआ तो तुरन्त उसे याद आया कि 'सात कदम पीछे हटने के बाद ही गलत काम करना है' जैसे ही पीछे हुआ कि वहाँ से आबाज आई माँ पीछे खिसको गर्मी लग रही है, समीप आकर देखा तो वे सास बहु थीं, उस रात वे नाटक दिखाने गईं थीं और वेश-भूषा बदले विना ही सो गई थीं, उसकी पत्नी गर्भवती थी, अतः तीन प्राणियों कि रक्षा हो गई जिससे उसकी श्रद्धा और बढ़ गई।
भक्ति
शिष्य की परीक्षा- एक शिष्य जिससे गुरु को बड़ा लगाव था, एक दिन गुरु की पत्नी ने कहा कि आपको इस शिष्य से कुछ ज्यादा ही लगाव है, बाकी अन्य शिष्यों से इतना लगाव क्यों नहीं रखते, तब गुरु ने अपनी पत्नी को बताने के लिए शिष्य की परीक्षा की और एक आम को पैर में बाँधकर फोड़ा जैसा बनाया और सब शिष्यों से कहा की यह फोड़ा चूसने पर ही ठीक होगा, ऐसा वैद्य ने कहा है, यह सुनकर बहाना बनाकर सभी शिष्य चले गये, तब वही शिष्य आया और गुरु के फोड़े को चूसने लगा, तब गुरु की पत्नी उस शिष्य को देखकर हैरान हो गयी, वह आम था, यह जानकार सारे शिष्य को बड़ी शर्मिन्दगी हुई और शिष्य की परीक्षा हो गयी कि वास्तव में उसके पास श्रद्धा, भक्ति, विनय, सेवा भाव एवं कृतज्ञता थी।
भक्ति
आध्यात्मिक आनन्द की खोज भारतीय साधना का मूल है, अतः वैभव सम्पन्न लोग साधना सम्पन्न साधको के चरणों में झुकते हैं।
भक्ति
भगवान् को कभी मत भूलना, वह हमें अच्छी बुद्धि देता है।
भक्ति
जब मकान, दुकान, भोजन, स्नान छोड़ दो, तब पूजा छोड़ देना इसके पहले नहीं छोड़ना, पूजा ग्रहस्थी में बंधे पापों को धोने के लिए साबुन के समान है।
भक्ति
साबुन लगाना भी पड़ेगा और धोना भी पड़ेगा, साबुन नहीं लगाएंगे तो मैल नहीं निकलेगा और धोएँगे नहीं तो साबुन नहीं छूटेगी।
भक्ति
क्षेत्र- आज का बच्चा कहता है मन्दिर क्यों जाऊँ ? आत्मा या भगवान् का ध्यान घर में बैठकर भी कर सकते हैं, इसका उत्तर हमें उसी की भाषा में देना होगा कि जिस प्रकार एक घर में रसोई अलग, स्नानघर अलग, पखाना अलग, शयन कक्ष अलग-अलग होते हैं, उसी प्रकार परमात्मा का ध्यान करने के लिये मन्दिर हैं, यदि पखाना खाने के स्थान पर और खाना पखाने के स्थान पर हो तो आपको कोई आपत्ति तो नहीं ? यदि यह अयोग्य है, तो मन्दिर का कार्य मन्दिर मे होना चाहिये, घर का कार्य घर में होना चाहिये, मन्दिर की वेदी पर कोई भोजन की थाली रखकर नहीं खाता तथा आपरेशन थियेटर पर ही आपरेशन होता है रसोईघर या दुकान पर नहीं उत्तर सुनते ही बच्चे को समझ में आ जायेगा।
भक्ति
जिन भक्ति सम्यक्त्व का कारण है, श्रुत भक्ति ज्ञान का कारण है और गुरु भक्ति चारित्र का कारण है।
भक्ति
मन्दिर जाने के परिणाम और मन्दिर से घर जाने के परिणाम में महान अन्तर है, मन्दिर जाते समय मृत्यु हो तो अलग फल, घर जाते समय अगर मृत्यु हो तो अलग फल इसी प्रकार भोजन के प्रथम ग्रास और अन्तिम ग्रास के राग में अन्तर होता है।
भक्ति
मिट्टी पर पानी पड़ने से आर्द्र हो जाती है, उसी प्रकार जिनवाणी माँ के श्रवण से भाव आर्द्र होते हैं जैसे हल्दी और चूना को मिलाते ही रंग बदल जाता है उसी प्रकार जिनवाणी माँ के शब्द कान में पड़ते ही अंतरंग बदल जाता है।
भक्ति
नन्दीश्वर का विस्तार एक अरब, त्रेसठ करोड़, चौरासी लाख योजन है, एक दिशा में तेरह जिनालय हैं, चारों दिशाओं में बावन जिनालय हैं।
भक्ति
मध्यलोक में सबसे ज्यादा जिनधर्म हैं और उससे कम जिनबिम्ब हैं, कृत्रिम जिनबिम्ब अधिक हैं अकृत्रिम कम हैं। मध्यलोक में 458 चैत्यालयों की प्रसिद्धि है किन्तु असंख्यात द्वीपों में असंख्यात अकृत्रिम चैत्यालय है। जैसे नन्दीश्वर भक्ति में लिखा है ''अगणित द्वीपों में अगणित हैं अगणित गुण गण मण्डित हैं''।
भक्ति
सीमन्धर स्वामी विदेहक्षेत्र की कच्छा नगरी में विराजमान हैं।
भक्ति
समवसरण में देव विक्रिया से जिनबिम्ब बनाकर पधराते है, किन्तु श्लोक वार्तिक में लिखा है अकृत्रिम जिनबिम्ब स्वर्ग से लाकर पधराते हैं।
भक्ति
मध्यलोक के चार सौ अठ्ठावन अकृत्रिम जिनालय- ढाईद्वीप में पञ्चमेरु के अस्सी,
भक्ति
मिथ्यादृष्टि देव भी नन्दीश्वर की वन्दना करने जाते हैं तभी तो लिखा है ''वयन नहीं कहे, लखि होत सम्यक धरम''।
भक्ति
भाव सहित सम्मेद शिखरजी की वन्दना करने से दो अरब उपवासों का फल प्राप्त होता है।
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जिनेन्द्र भगवान् के दर्शन से और साधुओं को नमस्कार करने से पाप उस प्रकार नहीं ठहरते जिस प्रकार अञ्जुलि का जल ज्यादा देर नहीं ठहरता है।
भक्ति
सर्व सिद्धिदायक सिद्धचक्र का व्रत करो और प्राण नाश होने पर भी व्रतों का त्याग मत करो, सिद्धचक्र की विधि-पञ्चरत्नों से मण्डल माँड़कर चारों कोणों में प्रतिमाएं विराजमान कर अष्टद्रव्य से भक्ति करें, बारह वर्षों तक तीनों कार्तिक, फाल्गुन, आषाढ माह के शुक्लपक्ष में सिद्धचक्र का स्मरण करें, श्रावक श्राविकाओं को बड़ी विनय पूर्वक भोजन करावें, ऐसा करने से स्वर्ग/मोक्ष की सम्पदा प्राप्त होती है। इसी व्रत के माहात्म्य से अनन्त सिद्ध हुये हैं। नन्दीश्वर की महिमा तीनों लोकों मे अपूर्व है।
भक्ति
पूजा दो प्रकार की- व्यवहार पूजा- शास्त्रों की पूजा, वेष्टन (अछार) लगाना, सफाई करना, जीर्णोंद्धार करना, आदि। निश्चय पूजा- श्रुत के अर्थ को आत्मसात करना, भाव श्रुत को हृदयंगम करना, मिथ्यात्व से मुक्ति आदि।
भक्ति
शारदा स्तुति- शारदे नमस्कार करता हूँ बार-बार, ज्ञान का तो वरदान एक बार चाहिए। माता जगमाता है तू भाग्य की विधाता है तू, तेरा प्यार मात मुझे एक बार चाहिए। कण्ठ और लेखनी पे होजा तू विराजमान, माथे पे तो हाथ मात एक बार चाहिए। योगी तो है तेरा दास उससे न हो उदास, ज्ञान तो अधूरा मात्र केवलज्ञान चाहिए।।
भक्ति
गाय सफेद हो या लाल दूध सफेद ही देती है, साधु द्रव्य लिङ्गी हो या भावलिङ्गी श्रद्धा करोगे तो तिर जाओगे।
भक्ति
जो रत्नत्रय से विशुद्ध हैं, पात्र पर स्नेह करने वाले हैं, परोपकार करते हैं, धर्म का पालन करते हैं, ऐसे संसार से तारने वाले गुरु होते हैं।
भक्ति
मन्त्र, तीर्थ, व्रती, भगवान्, ज्योतिषी, वैद्य और गुरु में जिसकी जैसी श्रद्धा होती है उसको वैसी ही सिद्धि होती है।
भक्ति
वर्तमान मुनियों में, प्रतिमाओं में जिनेन्द्र भगवान् की तरह पूर्व मुनियों की स्थापना करके भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये क्योंकि केवल चर्चा करने वालों का कल्याण नहीं होता है।
भक्ति
श्रद्धा है तो गुरु में भी भगवान् के दर्शन कर लेता है, जैसे एकनलव्य ने मिट्टी के गुरु के सामने लक्ष्य प्राप्त कर लिया। नहीं तो रावण के सामने राम, कंस के सामने कृष्ण खड़े थे, पर उन्हीं के निमित्त से दुर्गति प्राप्त कर ली थी।
भक्ति
किसी साधु में दर्शन-ज्ञान-चारित्र तीनों ही प्रधानता से रहते हैं। किसी में दो प्रधानता से रहते हैं और किसी में सम्यग्दर्शन के लिए प्रधानता से उद्यम होता है। प्रायः कोई साधु गुणरहित नहीं होता है अतः सभी निर्ग्रन्थ मुद्रा के धारक मुनि सत्पुरुषों के लिए स्तुति करने के योग्य हैं।
भक्ति
चित्र में अङ्कित अचेतन साधु भी विद्वानों द्वारा वन्दनीय होता है, फिर जिनशासन को धारण करने वाले चेतन साधु की तो बात ही क्या है?
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सबसे बड़ा कौन-प्रश्न खड़ा मौन- दो मित्रों में विवाद हुआ कि सबसे बड़ा कौन? पहले ने कहा पृथ्वी। दूसरे ने कहा पृथ्वी बड़ी तो शेषनाग पर क्यों पड़ी? तो पुनः कहा शेषनाग बड़ा। तो पुनः पूँछा शेषनाग बड़ा तो महादेव जी के गले में क्यों पड़ा? तो उसने कहा महादेव जी बड़े। फिर कहा महादेव जी बड़े तो हिमालय पर क्यों पड़े? तो पुनः कहा हिमालय बड़ा। उसने कहा हिमालय बड़ा तो हनुमान जी की हथेली पर क्यों पड़ा? पुनः बोला तो हनुमान जी बड़े। पुनः पूँछा हनुमान जी बड़े तो रामचन्द्र जी के चरणों में क्यों पड़े? तब वह बोला रामचन्द्र जी बड़े। तो पुनः पूँछा रामचन्द्र जी बड़े तो गुरु जी के चरणों में क्यों पड़े? अतः संसार में सबसे बड़े गुरु होते हैं।
भक्ति
दृष्टि गुरु- जैसे मछली अण्डा देखकर पकाती है वैसे ही गणधर मानस्तम्भ या तीर्थंङ्कर को देखकर दीक्षित होते हैं।
भक्ति
शब्द गुरु- जैसे कुररी जमीन में अण्डा देती है और आकाश में शब्द करके पकाती है वैसे ही शेर ने ऋद्धिधारी मुनिराजों के उपदेश से सम्यक्त्व प्राप्त किया था।
भक्ति
स्पर्श गुरु- जैसे मुर्गी स्पर्श करके अण्डा पकाती है वैसे ही गुरु सिर पर हाथ रख कर अठ्ठाईस मूलगुणों का आरोपण करते हैं।
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गुरू ब्रह्मा-विष्णु-महेश तथा साक्षात् परम ब्रह्म हैं इसलिए गुरुजी के लिए नमस्कार है।
भक्ति
तपस्वियों को प्रणाम करने से उच्च गोत्र अर्थात् इक्ष्वाकु आदि वंश में उत्पत्ति होती है, दान देने से भोगों की अर्थात् चक्रवर्ती आदि पद की प्राप्ति होती है, सेवा करने से पूजा की अर्थात् तीर्थंङ्कर आदि पद की प्राप्ति होती है, भक्ति करने से सुन्दर रूप अर्थात् कामदेव आदि पद की प्राप्ति होती है और स्तवन करने से कीर्ति की अर्थात् शलाका पुरुषों आदि में उत्पत्ति होती है।
भक्ति
एक अक्षर भी यदि गुरु शिष्य को देता है, तो पृथ्वी पर ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जिसे देकर गुरु के ऋण को चुकाया जा सके, एक अक्षर भी देने वाले को जो गुरु नहीं मानता वह कुत्ते की सौ योनी प्राप्त करके चाण्डालों में उत्पन्न होता है।
भक्ति
जो करते हैं गुरू भक्ति पागलों की तरह। उन पर गुरूओं की कृपा बरसती है बादलों की तरह।।
भक्ति
गुरू को पूँछी चालता, सहज थान मिल जाय। क्लेश मिटे, आनन्द बढ़ै, लागे सुगम उपाय।।
भक्ति
गुरू समान संसार में, माता पिता सुत नाहि। गुरू तो तारे सर्वथा, ये डोबे भव माँहि।।
भक्ति
जहाँ तहाँ मिल जात है, सम्पति तिय सुत भ्रात। बड़े भाग ते अति कठिन, सुगुरू कहीं मिल पात।।
भक्ति
सद्गुरु एक-एक तन्तु को ताना-बाना बुनकर वस्त्र बना देने वाले जुलाहे की तरह हैं, गुरु अनावश्यक अवगुणों को निकाल कर मूर्ति बनाने वाले शिल्पकार की तरह हैं, गुरु माटी को योग्य आकार देने वाले कुम्भकार की तरह हैं।
भक्ति
एकलव्य की अनूठी गुरु भक्ति, मिट्टी के गुरु में आस्था रखी तो भी पक्का धनुर्धारी बना था।
भक्ति
एकलव्य से अङ्गूठा माँगा, यदि गर्दन भी माँगते तो वह दे देता, ऐसा समर्पण ही फल प्रदान करता है।
भक्ति
मिथ्यादर्शन ज्ञान की, पीड़ा सही न जात। गुरु का दर्शन जब मिले, दुःख सारा मिट जात।।
भक्ति
भव जल में डूबे हुए कर्म मगर दे त्रास। गुरु नौका पर बैठकर होवे भव से पार।।
भक्ति
गुरु की महिमा वरणी न जाय। गुरु नाम जपूँ मन वचन काय।।
भक्ति
गुरु कुम्हार घट शिष्य है, गढ़-गढ़ काढ़े खोट। अन्दर हाथ पसार के बाहर मारे चोट।।
भक्ति
गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागु पाय। बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय।।
भक्ति
चमन में फूल खिलते है, गले का हार बनने को। गुरु उपदेश दे दो तुम, भव से पार होने को।।
भक्ति
गुरु से शिष्य की कौन सी बात अनजानी है। सागर को पता है बूँद में कितना पानी है।।
भक्ति
भीतर लगन लगती है, तो सन्त में अरहन्त दिखते हैं। अन्यथा मारीच को आदिनाथ अच्छे नहीं लगते हैं।।
भक्ति
गुरू जीवन को साक्षर नहीं सार्थक बनाते हैं। जैसे पिता टीचर से बच्चे का परिचय कराता है उसी प्रकार गुरू परमात्मा से परिचय कराते हैं।
भक्ति
जो करते हैं गुरुभक्ति पागलो की तरह। उन पर गुरु की रहमत बरसती है बादलों की तरह।।
भक्ति
संसार में गुरू कृपा सबसे निराली, होली यही दशहरा यह ही दिवाली। जो शिष्य है वह सदैव ऋणी रहेगा, कोई कभी न उपकार चुका सकेगा।।
भक्ति
पतङ्ग की डोर जब तक हाथ में है तब तक अस्तित्व है, छूटने पर कोई ठिकाना नहीं कहाँ जा कर गिरेगी, इसी प्रकार शिष्य की डोर जब तक गुरु के हाथ में है, तब तक ही उन्नति होती है।
भक्ति
आचार्य श्री की दीक्षा स्थली अजमेर में जिनालय बनाया गया है, जन्मस्थली सदलगा में भी जिनालय बनाया गया है।
भक्ति
दीक्षा पर्व मनाने- तप का दीपक श्रद्धा वाती ज्ञान का दीप जलाने, भक्ति भाव घी डाल-डाल कर दीक्षा पर्व मनाने। अशुभ भाव तज भक्ति करना गुरुवर की शुभ भावों से, दीक्षा का सम्बन्ध जुड़ा है मात्र भीतरी भावों से।।
भक्ति
खास दास की आस बस, श्वाँस-श्वाँस पर वास, पार्श्व करो मत दास को, उदासता का दास। न तो सुर सुख चाहता, शिव सुख की न चाह, तव थुति सरवर में, सदा होवे मम अवगाह।।
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