Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Devotion

भक्ति

456 सूत्र · पृष्ठ 4 / 7

तर्क खोपड़ी की खुजलाहट है और श्रद्धा आत्मा की सजावट है।
भक्ति
तर्क पाप से जोड़ता है और श्रद्धा परमात्मा से जोड़ती है।
भक्ति
बुद्धिजीवी तर्क करते हैं और हृदय जीवी समर्पण करते हैं।
भक्ति
अनेक तपस्या तथा साधना के फल से ही मनुष्य सरल तथा उदार बनता है। सरल हुए बिना ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती है सरल और विश्वासी के समीप ही प्रभु अपना स्वरूप प्रकट किया करते हैं।
भक्ति
किसी महान् व्यक्ति के अनुयायी प्रायः अपनी आँखें बन्द रखते हैं ताकि वे उनका गुणगान अधिक अच्छी रीति से कर सकें।
भक्ति
देव पूजा नौकरों से करवाने वाला नहीं स्वयं पूजा करने वाला देव बनता है।
भक्ति
मंदिर जी के गर्भगृह का वही महत्त्व है, जो हमारे शरीर में पेट का है, गर्भगृह में ऊर्जा संग्रहीत होती है, बिजली पानी को पहले संगृहीत किया जाता है फिर प्रवाहित किया जाता है उसी प्रकार मंदिरों और शिखरों में मंत्रादि से ऊर्जा संग्रहीत होती है अतः उन्हें पवित्र रखना चाहिए।
भक्ति
जिन्दगी की आवश्यक वस्तु की कामना से यदि भक्ति की जाती है तो वह न तो नियम है, न मिथ्यात्व है, न सकाम भाव है, वह एक मजबूरी है यदि कोई घर में बीमार हो गया णमोकार नहीं पढ़े तो क्या करें? भक्तामर नहीं पढ़े तो क्या करें? भगवान् से भोग विलास की याचना करना निदान है।
भक्ति
देवों के पास जो विभूति है मनुष्यों के पास नहीं अतः विशेष रूप से देव पञ्चकल्याणक मनाते हैं, क्षीरसागर से देव ही जल ला सकते हैं।
भक्ति
प्रतिष्ठा पाठ में कहा है–केसर से रंगे चावल पुष्प संज्ञा को प्राप्त हैं।
भक्ति
ईश्वर से प्रार्थना का उद्देश्य माँगना होता है, अभी जो कुछ मिला है उसके लिए धन्यवाद देंगे तो शायद बिना माँगे ज्यादा पा सकेंगे।
भक्ति
मनुष्य कितना मूर्ख है। प्रार्थना करते समय समझता है कि भगवान् सब कुछ सुन रहा है, पर निंदा करते समय यह भूल जाता है। पुण्य करते समय यह समझता है कि भगवान् देख रहा है, पर पाप के समय यह भूल जाता है। दान करते समय समझता है कि भगवान् सब में बसता है, पर चोर चोरी करते समय ये भूल जाता है। प्रेम करते समय यह समझता है कि पूरी दुनिया भगवान् ने बनाई है, पर नफरत करते हुए ये भूल जाता है और हम कहते हैं कि मनुष्य सबसे बुद्धिमान प्राणी है।
भक्ति
दुनिया के सभी देवी-देवता की प्रतिमा खिले कमल पर विराजमान है बन्द कमल पर नहीं अतः आप भी अपने हृदय कमल को प्रसन्न रखो जिससे परमात्मा विराजमान हो सकें।
भक्ति
कंडेक्टर बेचारा गाँव नगर के नाम चिल्लाता-चिल्लाता जीवन निकाल देता है। कुंजड़ा भटा-भाजी, आम-पपीता चिल्लाता है, अगर इतनी प्रीति से भगवान् का नाम लेता तो कल्याण हो जाता।
भक्ति
रास्ते आसान हों तो समझना किसी का आशीर्वाद मेरे साथ है।
भक्ति
प्रेम से बढ़कर प्रार्थना नहीं है।
भक्ति
इंसान इसलिए मायूस होता है क्योंकि वह परमात्मा को राजी करने के बजाय लोगों को राजी करने में लगा रहता है।
भक्ति
पत्थर सिर्फ एक बार मंदिर जाता है तो भगवान् बन जाता है और इंसान प्रतिदिन मंदिर जाता है फिर भी पत्थर दिल बना रहता है।
भक्ति
उन्हीं चीजों के लिए प्रार्थना करें जिन्हें खुद हासिल नहीं कर सकते हैं।
भक्ति
निर्बल के बल राम, जो किसी की गुलामी नहीं करना चाहता, उसे ईश्वर की गुलामी करनी चाहिए।
भक्ति
गुरु आशीर्वाद देने में तब गूँगे रहते हैं, जब हमारा हृदय उनकी वाणी सुनने में बहरा रहता है।
भक्ति
विश्वास तर्क से ज्यादा अच्छा मार्गदर्शक है, तर्क तो बस कुछ ही दूर जा सकता है किन्तु विश्वास की कोई सीमा नहीं होती हैं।
भक्ति
खोई हुई चीजें तो अक्सर वहाँ मिल जाती हैं जहाँ वे खोई हों, पर विश्वास वहाँ कभी नहीं मिलता जहाँ खोया हो।
भक्ति
भरोसा खुद या खुदा पर हो तो ताकत बन जाता है, दूसरों पर या भाग्य पर हो तो कमजोरी बन जाता है।
भक्ति
सपेरे के शब्द सुन कालिया नाग निर्विष हो नाचने लगता है तब गुरु/प्रभु के शब्द सुन मिथ्यात्व क्यों दूर नहीं हो सकता है।
भक्ति
श्रद्धाहीन का गुरु उद्धार नहीं कर सकते, जैसे श्रद्धाहीन मारीचि का परमगुरु आदिनाथ उद्धार नहीं कर पाये थे।
भक्ति
जो मनुष्य नित्य ही पूजा करने के योग्य, अनेक जीवों के द्वारा अर्जित किए जाने वाले पुण्य के कारणभूत, अंगुष्ठ प्रमाण जिनेन्द्र प्रतिमा को बनाता है वह नित्य ही बहुत भारी पुण्य को प्राप्त होता है।
भक्ति
समस्त जीवों का उपकारी होने से तथा समीचीन धर्म की खान की वृद्धि का कारण होने से गृहस्थों के लिए जिनालय की प्रतिष्ठा के समान कोई पुण्य नहीं है।
भक्ति
जहाँ चैत्यालय होता है वहाँ कितने ही गुणवान मनुष्य पूजा के द्वारा प्रतिदिन पुण्य उपार्जन करते हैं, कितने ही स्तुति करते हैं कितने ही बुद्धि मान उत्तम चंदोबा, दीप, धूप, कलश, झारी तथा घंटा आदि देकर दर्शन करते हैं तथा मुनिराजों का श्रेष्ठ आश्रय भी जिनालय होता है।
भक्ति
गुरु के मुख में स्थित विद्या गुरु की भक्ति से प्राप्त होती है।
भक्ति
क्यों इतना वक्त गुजारते हो देखते हुए खुद को 'आइने' में कुछ वक्त बैठो प्रभु के सामने खूबसूरत हो जाओगे सही 'माइने' में।
भक्ति
एक प्रभु हैं, जो बेहिसाब देते हैं, एक हम हैं, जो नाम भी गिन-गिन कर लेते हैं।
भक्ति
भोजन छोड़ दोगे तो जिंदा नहीं रहोगे, भजन छोड़ दोगे तो कहीं के नहीं रहोगे।
भक्ति
भोगभूमि से कर्मभूमि के आने पर जीवों को षट्कर्म का उपदेश देकर कर्मयुग का प्रवर्तन कर विचलित प्राणियों को स्थिरता देने के कारण आदिनाथ प्रथम वंदनीय हैं।
भक्ति
सुखार्थी का प्राण भक्ति है, प्रार्थना करें प्रभो कलुषता से बचाओ।
भक्ति
प्रभु का स्मरण मोह सागर में डूबते हुए को सफल जहाज है।
भक्ति
भगवान् के गुणों में अनुराग करो, व्यवहार के काम तुम्हें शान्ति नहीं पहुँचायेंगे।
भक्ति
हे प्रभो! आप देना चाहते हैं तो मुझे कोई चाह उत्पन्न न हो क्योंकि स्वरूप से बढ़कर कुछ नहीं है।
भक्ति
जिनेन्द्र भगवान् के स्मरण मात्र से शोक, क्लेश, भय, शाकिनी, दरिद्रता, रोगादि नष्ट हो जाते हैं।
भक्ति
जो जन्म-मरण का भाजन न होने दे वह है भजन।
भक्ति
जैसे थोड़ी सी भी औषधि भयंकर रोग को शांत कर देती है और जैसे थोड़ा सा अमृत भी मृत्यु के भय को दूर कर देता है वैसे ही थोड़ी सी भी ईश्वर की स्तुति बहुत से पापों को शीघ्र ही नष्ट कर देती है।
भक्ति
उसकी जय कभी नहीं हो सकती जिसका दिल पवित्र नहीं है।
भक्ति
व्यक्ति और परमात्मा मिलकर बहुमत हो जाता है।
भक्ति
देव-शास्त्र-गुरु के दर्शन से नेत्र सफल होते हैं अन्यत्र देखने से नेत्र पाप देने वाले होते हैं।
भक्ति
जिनदेव गुरु पूजक हाथ सफल हैं हिंसा में प्रवृत्त हाथ निष्फल हैं।
भक्ति
देव-शास्त्र-गुरु के समक्ष नम्रीभूत मस्तक सफल है अन्यत्र नम्रीभूत मस्तक निष्फल है।
भक्ति
देव-शास्त्र-गुरु तथा यात्रादि महातीर्थ के प्रति गमन करने वाले चरण सफल हैं।
भक्ति
जो मनुष्य जैन मन्दिर बनवाता है, उसके लिए समस्त संसार किंकर के समान आचरण करता है और वह शीघ्र ही मोक्ष को प्राप्त होता है।
भक्ति
जो मनुष्य ईश्वर को छोड़कर दूसरे से प्रेम करता है वह क्या कभी सुखी हो सकता है?
भक्ति
वाणी को सँभल कर बोलना चाहिए क्योंकि इस पंचमकाल में काँच का बर्तन टूटने में तो समय लगता है पर लोगों की श्रद्धा टूटने में समय नहीं लगता अत: देव-शास्त्र-गुरु पर अश्रद्धा न हो ऐसी ही चर्चा और चर्या करनी चाहिए।
भक्ति
आपके द्वारा किसी को श्रद्धा न हो तो कोई बात नहीं पर किसी की भी श्रद्धा न टूटे यह ध्यान रखें।
भक्ति
श्रावक से माँगने वाला ही भिखारी नहीं परमात्मा के चरणों में प्रार्थना कर याचना करने वाला सर्वोच्च भिखारी है।
भक्ति
जैसे लोग फिल्म देखकर नायक-नायिका की नकल करते हैं, उसी प्रकार भगवान् के गुण गाते-गाते भक्त भी उन जैसे गुणों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता है।
भक्ति
हे भगवन! चन्दन, चन्द्रकिरण, गङ्गा का जल और मोतियों की माला भी उतनी शीतल नहीं हैं जितने शीतल समता रूपी जल से युक्त आपके वचन हैं।
भक्ति
जिनेन्द्र भगवान् के वचन विषय सुख का विरेचन करने के लिए, जरा–मरण रुपी व्याधि का क्षय करने के लिए एवं समस्त दुखों का नाश करने के लिए अमृत के समान हैं।
भक्ति
जैसे माता पुत्र को, कर देती बलवान। जिनवाणी जगमात है, अमर करत है ज्ञान।।
भक्ति
कैसे अदा करेंगे उपकार हम तुम्हारे, हम तो बने सितारे, गुरु आपके सहारे। तन को रचा सम्हारा माता-पिता ने मेरे, जीवन सम्हारा तुमने, भर ज्ञान उर में मेरे।।कैसे।। तुम देवता से बढ़कर, मेरे लिये हो गुरुवर, चरणों में शीश मेरा है गुरु जी तुम्हारे।।कैसे।। जब तक है हम जमीं पर, विस्मृत न कर सकेंगे, पथ के प्रदीप मेरे, गुरुदेव हो सहारे।।कैसे।। तुमसे मिला है सब कुछ, तुम को क्या भेंट दूं मैं, सूरज के आगे जुगनू की बात क्या करुं मैं।।कैसे।। जीवन सजाने वाले बस इतनी आरजू है, नजरे न मोड़ लेना दर से कभी हमारे।।कैसे।।
भक्ति
संसार में गुरू कृपा सबसे निराली, होली यही दशहरा यह ही दीवाली। जो शिष्य है वह सदैव ऋणी रहेगा, कोई कभी न उपकार चुका सकेगा।।
भक्ति
जिस प्रकार सूर्य की तीक्ष्ण किरणें कमल की पाँखुड़ी को विकसित कर देती हैं, उसी प्रकार गुरु के वचन भव्यों के मन रूपी पाँखुड़ी को विकसित कर देते हैं।
भक्ति
मन्दिर धन से बनता है पर पूजा मन से होती है, मन की सादगी और शान्ति यौवन को स्थाई बनाती है।
भक्ति
जो ऐश्वर्य माँगता है वह ईश्वर को नहीं माँगता है।
भक्ति
जिस व्यक्ति से किसी को प्रेम न मिला हो, उसके लिये कौन प्राण देगा?
भक्ति
दर्पण में चेहरा तभी दिखाई पड़ता है जब वह साफ और स्थिर हो, उसी प्रकार शुद्ध मन से भगवान के दर्शन होतेहैं।
भक्ति
अश्रुपूर्ण प्रेम अत्यन्त लुभावना होता है, आँखो के आंसु अमूल्य वस्तु हैं।
भक्ति
प्रेम और खाँसी छुपाये नहीं छुपते, प्रेम आँखों से नहीं मन से देखता है।
भक्ति
आस्था वहाँ होती है जहाँ हम हजार प्रतिकूलताओं के बीच भी डाँवाडोल न हों।
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भोजन करना पर भजन मत भूलना।
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पाँच मकार-मन्दिर, मूर्ति, माला, मन्त्र, महात्मा इन पाँच पर भारतीय संस्कृति टिकी है।
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जो भजन नहीं करते, वे मनुष्य नहीं मल-मूत्र बनाने की मशीन हैं।
भक्ति
क्या आप परमात्मा एवं परलोक के बारे में विचार करते हैं?
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क्या आप गुरुओं/ज्ञानियों की सेवा करके आनन्द का अनुभव करते हैं?
भक्ति
वीतराग ने क्या क्या देखा, तु जाने क्या वीरा रे। वीतराग की वाणी सुनकर, हर ले भव की पीरा रे।।
भक्ति
मन्दिर और सन्तो के पास जाकर सिर झुकाते हैं क्योंकि सिर में गुस्से का, गर्दन में मान का, हृदय में माया का और पेट में लोभ का वास होता है, अर्थात् हम देव-शास्त्र-गुरु के सामने झुक कर अपनी कषायों का विसर्जन करते हैं।
भक्ति
संस्कार हीन जैनी- उड़ान भरते हुये वायुयान खराब हो गया, परिचारकों ने घोषणा कर दी कि सुरक्षा असम्भव, उसमें 73 व्यक्ति यात्रा कर रहे थे, घोषणा सुनते ही ईसाईयों ने बाइबिल पढ़ना शुरू कर दिया, मुसलमानों ने कुरान की आयतें बोलना शुरू कर दीं, कोई गीता का पाठ करने लगा, उसी वायुयान मे तीन जैनी भाई थे वे कुछ भी स्मरण न कर दरवाजे की ओर देख रहे थे, कि दरवाजा खुले और नीचें कूदें, उनके पास न पाठ करने को कुछ था न भगवान का स्मरण, क्योंकि वे संस्कार हीन थे।
भक्ति
भगवान् को भगवान् के रूप में देखने के लिए वैसी दृष्टि चाहिए बागवान को भगवान् के दर्शन नहीं होते हैं।
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