आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपि, नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या। जातोऽस्मि तेन जन बान्धव! दुःख पात्रं, यस्मात्क्रियाः प्रतिफलन्ति न भाव शून्याः।।
हे जनबांधव! मैंने आपका नाम सुना, पूजा की, दर्शन भी किए, किन्तु भक्ति पूर्वक हृदय में धारण नहीं किया इसलिए दुःखों का पात्र हुआ हूँ, क्योंकि भाव शून्य क्रिया पूर्ण फलदायी नहीं होती है।
O kinsman of all beings! I heard Your name, worshipped and saw You, yet did not hold You in my heart with true devotion — that is why I have become a vessel of sorrows, for action empty of feeling never bears full fruit.
— आराध्य सूत्र · #71
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