Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भक्ति

शुद्धे ज्ञाने, शुचिनि चरिते, सत्यपि त्वय्यनीचा, भक्तिर्नोंचे, दनवधि सुखा, वञ्चिका कुञ्चिकेयम्। शक्योद्धाटं, भवति हि कथं, मुक्ति कामस्य पुंसो, मुक्तिद्वारं, परिदृढ़ महा, मोह मुद्रा कवाटं।।

विशुद्ध ज्ञान और निर्मल चरित्र के रहते हुए भी यदि जिनेन्द्र भगवान् में उत्कृष्ट भक्ति नहीं है, तो फिर मिथ्यात्व रूपी मुद्रा से अङ्कित मोक्ष मन्दिर का द्वार कैसे खोला जा सकता है।

Even with pure knowledge and spotless conduct, if there is no supreme devotion to Lord Jinendra, then how can the door of the temple of liberation — sealed with the stamp of wrong belief — ever be opened, by a man who longs for liberation?

— आराध्य सूत्र · #69

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हे जिनेन्द्र भगवान्! हे देवों के देव! बाल्यावस्था से आज तक आपके श्रीचरणों की सेवा में आसक्त शिष्यों को कल्पलता सम सेवा से जो काल व्यतीत हुआ है, आज उस सेवा का वह फल आपसे चाहता हूँ कि प्राणों के निकलते समय आपके नाम से सहित अक्षरों के पढ़ने में मेरा गला कुण्ठित न हो।
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