Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भक्ति

भगवान् का पादमूल मेरे अन्दर की पवित्रता का कारण है अतः काया की आराधना नहीं काया के माध्यम से भगवान् के गुणों की आराधना की जाती है, तभी स्तुति होती है और ऋद्धियाँ भी प्रकट होती हैं।

The Lord's feet are the cause of my inner purity; therefore one does not worship the body, but through the body one worships the Lord's virtues — only then does true praise occur and spiritual powers manifest.

— आराध्य सूत्र · #85

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हे जिनेन्द्र भगवान्! हे देवों के देव! बाल्यावस्था से आज तक आपके श्रीचरणों की सेवा में आसक्त शिष्यों को कल्पलता सम सेवा से जो काल व्यतीत हुआ है, आज उस सेवा का वह फल आपसे चाहता हूँ कि प्राणों के निकलते समय आपके नाम से सहित अक्षरों के पढ़ने में मेरा गला कुण्ठित न हो।
भक्ति