Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Devotion

भक्ति

456 सूत्र · पृष्ठ 1 / 7

विश्वास ही व्यक्ति के लिए संजीवनी औषधि होता है।
भक्ति
गुरु कहते हैं–तुम्हारी जैसी अर्जी, प्रभु की वैसी मर्जी।
भक्ति
हे जिनेन्द्र भगवान्! हे देवों के देव! बाल्यावस्था से आज तक आपके श्रीचरणों की सेवा में आसक्त शिष्यों को कल्पलता सम सेवा से जो काल व्यतीत हुआ है, आज उस सेवा का वह फल आपसे चाहता हूँ कि प्राणों के निकलते समय आपके नाम से सहित अक्षरों के पढ़ने में मेरा गला कुण्ठित न हो।
भक्ति
छने, निर्मल और समीचीन मन्त्र से पवित्र किए हुए जल से जिनपूजा के लिए, विधि पूर्वक प्रतिदिन स्नान करना चाहिए। वह जल नाली आदि में नहीं जाना चाहिए।
भक्ति
स्त्री समागम, आहार, मल विसर्जन तथा आरम्भादि में लीन रहने वाला और अशुद्ध वस्तुओं को स्पर्श करने वाला गृहस्थ स्नान कर तथा धुले हुए पवित्र वस्त्र धारण कर ही पूजा करें।
भक्ति
प्रभु से पद की नहीं परमपद की प्रार्थना करो।
भक्ति
संसार के काम में तो नफा और नुकसान दोनों होते हैं, पर भगवान् के काम में नफा-ही-नफा होता है, नुकसान होता ही नहीं है।
भक्ति
जो बुद्धि का विषय नहीं है वहाँ श्रद्धा तथा विश्वास के बल पर ही मानव सफलता के मार्ग तक पहुँच सकता है।
भक्ति
देव-शास्त्र-गुरु के प्रति सच्ची अकाट्य श्रद्धा को सम्यग्दर्शन कहते हैं।
भक्ति
सत्पुरुषों का सम्यग्दर्शन के साथ नरक में भी निवास करना अच्छा है और सम्यग्दर्शन के बिना स्वर्ग में भी निवास शोभा नहीं देता है।
भक्ति
सम्यग्दर्शन के अभाव में जन्म मरण की पीड़ा सताती है।
भक्ति
जिस प्रकार प्राणरहित शरीर मृतक कहलाता है उसी प्रकार सम्यक्त्व से रहित मनुष्य चलता फिरता मृतक कहलाता है।
भक्ति
ईश्वर ही हमारा आश्रय और बल है वही आपत्ति के समय में रक्षा करता है।
भक्ति
सौभाग्यशाली वे नहीं जिसके पास धन, दौलत और सुख के साधन हैं बल्कि सौभाग्यशाली वे हैं जिनके पास प्रभु भक्ति व आत्मकल्याण के लिए समय है।
भक्ति
अधूरी श्रद्धा के गर्भ से भय का जन्म होता है।
भक्ति
श्रद्धा का अर्थ अन्धविश्वास नहीं है। किसी ग्रन्थ में कुछ लिखा हुआ या किसी व्यक्ति का कुछ कहा हुआ अपने अनुभव बिना सच मानना श्रद्धा नहीं है।
भक्ति
बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है वह सब असत् कहलाता है वह न तो इस लोक में लाभदायक होता है न मरने के बाद परलोक में सुखदायी होता है।
भक्ति
धर्म के क्षेत्र में श्रद्धा सर्वोपरि होती है।
भक्ति
जो श्रद्धा अनुभव की अपेक्षा नहीं रखती, वही सच्ची श्रद्धा है।
भक्ति
श्रद्धावान वही है जो विपत्तियों से घिर जाने पर भी डिगे नहीं।
भक्ति
जब एक गृहस्थ मुनि दीक्षा नहीं दे सकता है तो भगवान् को दीक्षा कैसे दे सकता है? सबसे बड़ी बात ऐसे लोग जो बिना मुनि से सूरि मंत्र की प्रतिष्ठित मूर्तियों की पूजा कर रहे हैं, उनमें से किसी का भी समाधिमरण नहीं देखा जा रहा है।
भक्ति
भगवान् के गुणों की प्राप्ति के लिए धार्मिक अनुष्ठान करना शुभोपयोग है।
भक्ति
आत्मा-परमात्मा का राग नहीं माना जाता जैसे दर्पण में हम अपने को सम्हालते हैं।
भक्ति
‘‘पावन मेरे नयन भये तुम दरश तैं, पावन पाणी भये तुम चरणन परस तैं। पावन मन हो गयो तिहारे ध्यान तैं, पावन रसना मानी तुम गुण गानतै ॥’’
भक्ति
भगवान् जगत् के लिए मंगलकारी हो इसलिए प्रतिमा के नीचे स्वस्तिक आदि रखे जाते हैं।
भक्ति
भगवान् नहीं कहते मुझे मन्दिरों में बसाओ, वे कहते हैं मुझे दिल में बसाओ।
भक्ति
भगवान् को मन्दिर में सुमन न चढ़ाओ तो चलेगा पर अपने सु-मन को भगवान् की भक्ति में नहीं लगाओगे तो नहीं चलेगा। अरे भाई! जब कुरूप, निर्धन, अपंग को राज कन्या वरमाला नहीं डालती तो फिर कुरूप मन अर्थात् अशुद्ध मन वाले को मुक्ति लक्ष्मी कैसे वरमाला डालेगी।
भक्ति
सम्यग्दृष्टि जीव तीनों लोकों में कही भी हो पूज्य ही होता है, पर सम्यग्दर्शन के बिना साधु भी पद-पद पर निन्दनीय होता है।
भक्ति
धर्मात्मा श्री को श्रीमति में नहीं श्री जी में लगाता है।
भक्ति
प्रेम मन से, विश्वास बुद्धि से परन्तु श्रद्धा आत्मा से उत्पन्न होती है।
भक्ति
भगवान् आपको भगवान् नहीं बनाएँगे, आपको अपने भाव ही भगवान् बनायेंगे।
भक्ति
साधक को संकट में या अंतिम दिन नहीं प्रतिपल भगवान् दिखते हैं।
भक्ति
देवाधिदेव के भक्तों की देव रक्षा अवश्य करते हैं।
भक्ति
निजदेव से मिलने के लिए जिनदेव से मिलना अनिवार्य है।
भक्ति
जो प्रतिदिन जिनालय जाता है वह एक दिन सिद्धालय अवश्य पहुँच जाता है।
भक्ति
श्रावक अभिषेक के समय प्रभु के और आहार दान के समय गुरु के अति निकट होता है, तब दो बांसों के घर्षण के समान भक्ति व चारित्र की ज्योति प्रकट होती है।
भक्ति
भावों से की गयी वंदना भव बंधन से मुक्त कराती है।
भक्ति
जिस जीव के वंदना में भाव नहीं लगते उसका भव भ्रमण अभी दीर्घ है।
भक्ति
सर्वज्ञ के स्तवन मात्र से सब रोग, सब भय और समस्त दुःखों की परम्परा नष्ट हो जाती है इसमें संशय नहीं है।
भक्ति
जो देव-शास्त्र-गुरु का भक्त है और संसार-शरीर-भोगों से विरक्त है वह सम्यग्दृष्टि है।
भक्ति
सम्यग्दृष्टि प्रभु के पास भिखारी नहीं भक्त बनकर जाता है।
भक्ति
जैसे दरिद्री व्यक्ति स्वर्ण/रत्न को देखकर उठाने के लिए दौड़ता है वैसे ही सम्यग्दृष्टि साधु/रत्नत्रयधारी को देखकर दौड़ पड़ता है।
भक्ति
संसार में सिर्फ दो को देखो जिनदेव को या फिर, निजदेव को।
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जिसके हाथों में जिनवाणी हो, पास में दिगम्बर गुरु हों और मन में जिनेन्द्र प्रभु हो तो उसके पास सब कुछ है ऐसा समझना चाहिए।
भक्ति
समर्पण का अर्थ पूर्णरूपेण प्रभु गुरु को हृदय से स्वीकार करना, उनकी इच्छा, प्रेरणाओं के प्रति सदैव जागृत रहना और जीवन के प्रत्येक क्षण में उसे परिणत करते रहना है।
भक्ति
अरहंत संसार पार नहीं लगाते, उनके प्रति आस्था पार लगाती है।
भक्ति
जब भी बुद्धि और श्रद्धा के बीच मतभेद होता है, तब श्रद्धा को महत्व देना चाहिए।
भक्ति
धर्म को समझने के लिए बुद्धि और आँखों की अपेक्षा श्रद्धा अधिक जरूरी है।
भक्ति
एकलव्य की आस्था थी तो पत्थर के गुरु से भी विद्या प्राप्त हो गयी थी।
भक्ति
दूसरे के घर से लाकर पत्नी को सब कुछ सौंप देते उसी प्रकार श्रद्धा रूपी पत्नी को सब कुछ देना पड़ेगा, तभी पूर्णानंद मिलेगा।
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श्रद्धा अंक और ज्ञान चारित्र शून्य के समान हैं, अंक के बिना सारे शून्य बेकार है।
भक्ति
संसार में जो केवल भगवान् का ही भजन करते हैं वे बलवान हैं और जो किसी के द्वारा उद्विग्न नहीं किए जाते वे सन्त हैं।
भक्ति
प्रार्थना या भजन जीभ से नहीं हृदय से होता है इसलिए गूँगे, तोतले और मूर्ख भी प्रार्थना कर सकते हैं।
भक्ति
स्वार्थ के कारण विघटित हुए समाज के अनेक दल रूपी फूलों को गुलदस्ता बनाने के लिए प्रार्थना एक साधन है।
भक्ति
जहाज किसी भी दिशा में क्यों न जाय, कम्पास की सुई उत्तर दिशा ही दिखाती है, इस कारण जहाज को दिशाभ्रम नहीं होता। इसी प्रकार मनुष्य का मन यदि भगवान् की ओर रहे तो फिर उसे कोई डर नहीं रहेगा।
भक्ति
संतों की वाणी सुनो, शास्त्र पढ़ो, विद्वान् हो जाओ, लेकिन ईश्वर के प्रति भक्ति नहीं तो कुछ नहीं।
भक्ति
जिसका साथी ईश्वर है उसको दुःख क्या, फिक्र क्या, दूसरे साथी की आवश्यकता क्या है ? मेघों से ढके हुए सूर्य वाला दिन 'दुर्दिन' नहीं है, उसी दिन को दुर्दिन कहो जिस दिन भगवान् की कथा का अमृतमय सुन्दर आलाप रस सुनायी नहीं पड़ता है।
भक्ति
निष्काम भाव से की जाने वाली भक्ति की तुलना तीनों लोकों के किसी भी पदार्थ से नहीं की जा सकती है। मन में कामना रखकर भजन करने से केवल उसका फल मिलता है, पर निष्काम भक्ति से प्रभु पद की प्राप्ति होती है।
भक्ति
अल्पबुद्धि मनुष्य परमात्मा को मूर्तियों में देखते हैं, योगी लोग अपने हृदय में परमात्मा को देखते हैं।
भक्ति
१. जो अश्रद्धालु है, २. पापात्मा है, ३. नास्तिक है, ४. संशयात्मा है और ५. केवल तर्क वितर्क में ही डूबा रहता है–ये पाँच प्रकार के मनुष्य तीर्थ के फल को प्राप्त नहीं करते हैं।
भक्ति
अन्तःकरण यदि मलिन और अपवित्र बना रहे, तो परमात्मा की उपासना भी फलवती न होगी अतः ईश्वर की उपासना निष्पाप हृदय से करें।
भक्ति
बिना श्रद्धा के किया हुआ शुभकर्म सब असत् कहलाता है वह न तो इस लोक में लाभदायक होता है न मरने के बाद परलोक में लाभदायक होता है।
भक्ति
जिनालय बाहरी मंदिर है, शरीर रूपी घर भीतरी मंदिर है।
भक्ति
भगवान् को अपना मानना योग है और भगवान् से कुछ चाहना भोग है।
भक्ति
जीने का आनंद संघर्ष में नहीं समर्पण में होता है संघर्ष में हमेशा पुरस्कार नहीं तिरस्कार ही मिलता है और समर्पण में सदा आदर-सत्कार मिलता है, इतिहास में हनुमान का समर्पण और रावण का संघर्ष दोनों दृष्टान्त हैं।
भक्ति
हाथ-पैर के साथ-साथ मंदिर में मन को भी पवित्र करके जाना चाहिए।
भक्ति
श्रद्धा रहित का तप करना एवं साधु बनना व्यर्थ है।
भक्ति
जिस घर में जिनेन्द्र देव का समीचीन बिम्ब नहीं है उसे विद्वानों ने पक्षी के घोंसले के समान पापदायक कहा है।
भक्ति
सन्त के चरण छूने से पुण्य गुण व आचरण में लाने से परमात्मा मिलता है।
भक्ति
यदि भगवान् की याद स्वतः नहीं आती, उन्हें याद करना पड़ता है तो समझें कि अभी साधना शुरू ही नहीं हुई है।
भक्ति
हे प्रभु! मुझे अधिक लेने के नहीं अधिक देने के योग्य बनाओ।
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इंसान से मोहब्बत आपकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है, भगवान् से मोहब्बत आपकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है।
भक्ति
कभी आप भगवान् से दूसरों के लिए माँग कर देखो, आपको कभी अपने लिए माँगने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
भक्ति
जो शरीर की अनुकूलता-प्रतिकूलता में राजी नाराज होता है, वह हड्डी-मांस का भक्त है भगवान् का नहीं।
भक्ति
प्रभु से मत कहो समस्या विकट है, समस्या से कह दो कि मेरा प्रभु मेरे निकट है। यदि किसी समस्या को सुलझाया जा सकता है तो फिर चिन्ता करने की क्या जरूरत है और यदि नहीं सुलझाया जा सकता तो फिर चिन्ता करने से क्या फायदा है?
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