आस्तां तवस्तवनमस्तसमस्तदोषं, त्वत्सङ्कथापि जगतां दुरितानि हन्ति। दूरे सहस्रकिरणः कुरुते प्रभैव, पद्माकरेषु जलजानि विकासभाञ्जि।।
हे भगवन्! समस्त दोषों से रहित आपका स्तवन तो दूर रहे, आपका नाम ही संसारी प्राणियों के पापों को नष्ट करता है, जिस प्रकार सूर्य दूर ही रहता है, किन्तु उसकी किरणें ही तालाबों में कमलों को विकसित कर देती हैं।
O Lord! Let alone Your praise which is free of all flaws — even Your very name destroys the sins of worldly beings, just as the sun stays far away yet its rays make the lotuses bloom in ponds.
— आराध्य सूत्र · #74
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