बिम्बादलोन्नति यवोन्नतिमेव भक्त्या, ये कारयन्ति जिनसद्म जिनाकृतिञ्च। पुण्यं तदीयमिह वागपि नैव शक्ता, स्तोतुं परस्य किमु कारयितुर्द्वयस्य।।
बिम्ब के फल बराबर जिनालय बनवाता है या यव के बराबर भक्ति पूर्वक प्रतिमा स्थापन करवाता है उसके पुण्य का वर्णन सरस्वती देवी भी नहीं कर सकती, फिर जो जिनप्रतिमा-जिनालय दोनों बनवाते हैं, उनका तो कहना ही क्या?
Even goddess Saraswati cannot describe the merit of one who devotedly builds a Jina-temple the size of a fruit, or installs an image the size of a barley grain — then what to say of those who build both the image and the temple?
— आराध्य सूत्र · #77
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