Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 17

सफल सीख- स्वस्थ बनो पर।

71 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

'हम पुण्यवान् हैं, जिन्हें मुनि आज्ञा देते हैं' ऐसा विचार कर बुद्धिमानों को मुनियों की आज्ञा का पालन करना चाहिए।
विनम्रता
योगियों के हित-अहित का विचार करने वाले पुरुष के मानसिक विनय होती है, उससे सिद्धि की प्राप्ति होती है।
विनम्रता
सफल सीख- स्वस्थ बनो पर मोटे नहीं, चंगे (पतले) बनों पर निर्बल नहीं, बलवान बनो पर दुष्ट नहीं, सरल बनो पर मूर्ख नहीं, धीर बनो पर सुस्त नहीं, न्यायी बनो पर निर्दयी नहीं, उत्साही बनो पर जल्दबाज नहीं, दृढ बनों पर हठी नहीं, समालोचक बनो पर निन्दक नहीं, प्रशंसक बनो पर चापलूस नहीं, स्पष्ट बनो पर उद्दंड नहीं, चतुर बनो पर कुटिल नहीं, योगी बनो पर रोगी नहीं, विनम्र बनो पर याचक नहीं, साधु बनो पर स्वादु नहीं।
चरित्र
वस्तुयें ऐसी इस्तेमाल करें जो कम दाम की हों, पूरे काम की हों और होने का अभिमान न हो और खोने का भय न हो।
संतोष
विवेक, सन्तोष, दया, क्षमा, ज्ञान, शुभदान, निरहंकारता, जितेन्द्रियता और निष्कषायता ये गुण मनुष्यों को सदा सुखदायक होते हैं।
चरित्र
दूसरों के समान जो अपने दोषों को देखता है, वह शरीर से सहित होने पर भी मुक्त के समान है।
विवेक
दिन में ऐसा काम करना चाहिए जिससे रात्री में चैन की नींद आए, आठ महीने ऐसा काम करना चाहिए जिससे वर्षाऋतु में एक जगह रहकर धर्मध्यान कर सकें, पूर्व अवस्था में ऐसा काम करना चाहिए जिससे वृद्धावस्था में धर्मध्यान कर सकें और 'पूरे जीवन ऐसा काम करना चाहिए जिससे भविष्य सुखी हो जाए।'
समय
जो हितकारी आहार-विहार करता है, सोच-विचार कर काम करता है, विषयों में आसक्त नहीं होता है, दानी है, समतावान है, सत्यनिष्ठ है, क्षमावान है और ज्ञानियों की सङ्गति करता है वह हमेशा नीरोग रहता है।
स्वास्थ्य
व्यसन तो बहुत से हैं किन्तु उनमें दो ही व्यसन महत्त्वपूर्ण है, एक तो विद्या अध्ययन का व्यसन और दूसरा प्रभु के चरणों की सेवा का व्यसन।
ज्ञान
शरीर में निर्ममत्व, गुरु में विनय, नित्य श्रुताभ्यास, उज्ज्वल चारित्र, अत्यन्त शान्ति, संसार से वैराग्य, अन्तरङ्ग बहिरङ्ग परिग्रह का त्याग, धर्म का ज्ञाता, साधु का साधुओं ने यह संसार का नाश करने वाला लक्षण बताया है।
धर्म
जहाँ ग्राम ही नहीं है तो उसकी सीमा कहाँ से होगी, स्त्री ही नहीं है तो पुत्र कहाँ से होगा, बुद्धि ही नहीं है तो विद्या कहाँ से होगी और धर्म ही नहीं है तो सुख कहाँ से प्राप्त होगा?
धर्म
सम्पत्ति होने पर नियम पालना, शक्ति होने पर भी क्षमा करना, युवावस्था में व्रत लेना और दरिद्र होने पर भी थोड़ा दान करना भी महालाभ के लिए होता है।
संयम
विद्वान् नेत्रों से हँसते हैं, मध्यम पुरुष दाँतों से हँसते हैं, अधम पुरुष अट्टाहास करते हैं, मुनीश्वर हास्य नहीं करते हैं।
चरित्र
महापुरुषों का यह स्वभाव है धन होने पर दान देते हैं, शक्ति होने पर क्षमा करते हैं, दुःख आने पर दीनहीन नहीं होते और आचरण से छलावा नहीं करते हैं।
चरित्र
ब्राह्मण भोजन से सन्तुष्ट होते हैं, मयूर मेघ के गरजने से सन्तुष्ट होते हैं, सज्जन दूसरों की सम्पत्ति को देखकर सन्तुष्ट होते हैं, और दुष्ट दूसरों की विपत्ति को देखकर सन्तुष्ट होते हैं।
चरित्र
रण में विजय प्राप्त करने से नहीं इन्द्रियों के जीतने से योद्धा कहलाता है, अध्ययन से नहीं आचरण से पण्डित कहलाता है, बोलने से नहीं हित में लगाने से वक्ता कहलाता है, दान देने से नहीं सम्मानपूर्वक देने से दाता कहलाता है।
संयम
करोड़ गुणों की तुलना में भारी औचित्य गुण है, दान तथा प्रिय वचनों के द्वारा दूसरे को सन्तुष्ट करने का नाम औचित्य गुण है, इस गुण की बड़ी महिमा है, एक ओर एक औचित्य गुण और दूसरी ओर गुणों की राशि, औचित्य गुण के विना गुणों की राशि विष तुल्य प्रतीत होती है, यदि मनुष्य में प्रिय वचनों के द्वारा दूसरे को सन्तोष दिलाने की क्षमता न हो तो उसके सभी गुण व्यर्थ हैं।
वाणी
आचार्य भगवन् पूँछते हैं हे भव्य! सच-सच बताओ कि तूने इस संसार में बन्धुजनों के द्वारा आत्म हितकारी कुछ प्राप्त किया है अर्थात् नहीं? किन्तु इतना अवश्य है कि मरने के पश्चात तुम्हारे इस अहितकारी शरीर को ये सब मिल करके भस्म कर देते हैं।
अनासक्ति
वृद्धावस्था में दूसरों के तिरस्कार पूर्ण वचनों को सुनने में समर्थ न होने से ही मानो कान बहरे हो जाते हैं, वृद्धावस्था की दयनीय दशा को देखने में समर्थ न होने से ही मानो नेत्र अन्धे हो जाते हैं, फिर भी खेद है कि जरा से जर्जरित शरीर में यह प्राणी निश्चिन्त बैठा है।
समाधि
जहाँ पर मूर्खों की पूजा नहीं की जाती है, धान्य का संचय किया जाता है, दाम्पत्य जीवन में कलह नहीं है, वहाँ पर लक्ष्मी स्वयं आ जाती है।
समृद्धि
स्त्रियों का, राजाओं का, युद्ध में समानता रखने वाले शत्रु का, शस्त्र वाले का, नदी का, नाखून और दाँत वाले का तथा सींग वाले का कभी विश्वास नहीं करना चाहिये।
विवेक
एक व्यक्ति का विरोध करने से महान पुरुष भी विपत्ति में पड़ जाता है, फिर अधिक लोगों का विरोध करने वाले मनुष्य का तो कहना ही क्या?
संगति
धन का नाश, मानसिक सन्ताप, घर के दुश्चरित्र, स्वयं का ठगा जाना एवं स्वयं के अपमान को बुद्धिमान प्रकाशित न करें।
विवेक
अनुभवहीन व मूर्खों से बात करने के चार फल वचनों का व्यय, मानसिक सन्ताप, अपयश और प्रतारणा प्राप्त होती है।
संगति
नीति से रहित नेता, विनय से रहित शिष्य, ब्रह्मचर्य से रहित व्रती, शान्ति से रहित साधु, जीव से रहित देह, पुण्य से रहित प्राणी और धन से रहित गृहस्थ का कोई मूल्य नहीं है।
चरित्र
बुद्धिमान संयम के लिए श्रुत, धर्म के लिए संयम, मोक्ष के लिए धर्म, दान और भोग के लिए धन ग्रहण करते हैं।
संयम
राजपुत्रों से विनय, ज्ञानियों से शिक्षाप्रद वाक्य, ज्वाँरियों से झूठ, स्त्रियों से मायाचारी की शिक्षा मिलती है।
ज्ञान
चलते हुए मैं खाता नहीं हूँ, हँसते हुए बोलता नहीं हूँ, नष्ट हुए का शोक नहीं करता, किए हुए कार्य का अहङ्कार नहीं करता, दो लोग बात कर रहे हों तो मैं बीच में नहीं बोलता, तब मैं मूर्ख कैसे कहलाऊँगा।
विवेक
अभ्यास के विना विद्या विष है, अजीर्ण में भोजनविष है, दरिद्र को सभाविष है एवं वृद्ध को तरुणी विष के समान होती हैं।
ज्ञान
'निकटभव्य' में विषयों से विरक्ति, परिग्रह का त्याग, कषायों का शमन, शान्ति, आजीवन नियम, इन्द्रिय दमन, तत्त्व अभ्यास, तपश्चरण में पुरुषार्थ, मोक्ष के लिए पक्का इरादा, जिनेन्द्र भगवान में भक्ति और दयालुता पायी जाती है।
अनासक्ति
शरीर, घर, धन, स्त्री, पुत्र, मित्र, शत्रु ये सभी भिन्न स्वभाव वाले हैं फिर भी अज्ञानी इन्हें अपना मानता है।
अनासक्ति
विषय कषाय की तीव्रता, खोटे शास्त्रों का अध्ययन, दुर्ध्यान, दुष्ट लोगों की सङ्गति, स्वभाव की तीव्रता और उन्मार्ग में गमन होना अशुभ परिणाम माने जाते हैं इनसे पाप का ही बंध होता है।
कर्म
मुस्कराहट एक ऐसा अस्त्र है जो न चुभता है न चूकता है और मुस्कान बड़ी-बड़ी मुश्किलों को आसान बना देती है।
चरित्र
रामचन्द्रजी का जन्म नवमी को हुआ, नौ का अङ्क अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता पूरा पहाड़ा पढ़ लिजिए, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी ने अपनी मर्यादा को कभी नहीं छोड़ा था।
चरित्र
पञ्चेंद्रिय के विषय शत्रु हैं तथा जो धर्म, दान, हितकारी तप एवं दीक्षा आदि के ग्रहण करने का निषेध करता है वह व्यक्ति भी शत्रु है।
संयम
जो हितकारी तप, दान, धर्म तथा चारित्र आदि को बलपूर्वक प्रेरणा देकर ग्रहण कराता है, वह इस जगत् में श्रेष्ठ बन्धु है।
संगति
जिसके कर-कमल में दानरूपी अमृत है, मुख कमल में वचन रुपी अमृत है, हृदय कमल में दया रुपी अमृत है वह मनुष्य किस को प्रिय नहीं होता है? अर्थात् सभी को प्रिय होता है।
दान
मनुष्य पर्याय, उत्तम कुल में जन्म, लक्ष्मी, बुद्धि तथा कृतज्ञता ये सब विवेक के विना होते हुए भी कुछ नहीं हैं, अर्थात् विवेक के विना इनकी सार्थकता नहीं होती है।
विवेक
किसी भी क्षेत्र में जरूरत का सही आँकलन करना अथवा क्या करने योग्य है क्या नहीं करने योग्य है इसका ज्ञान होना औचित्य गुण कहलाता है, इसे ही विवेक कहते हैं।
विवेक
जहाँ समुद्रों का पानी पीने से प्यास नहीं बुझी, तो क्या ओस की बूँद चाटने से बुझ सकती है? स्वर्ग के सुख से सुखी नहीं हुये तब मनुष्य पर्याय के भोगों से कैसे सुखी होंगे?
संतोष
छोटी सी नदी पार करने के लिये घाट की जरूरत होती है, संसार समुद्र को पार करने के लिए मनुष्य पर्याय, उच्च कुल एवं धर्मरूपी घाट को पकड़ना पड़ता है।
धर्म
जेल में, पिजड़े में तथा नरक में पराधीन होकर जो वेदना सही है, उसके सामने मुनि अवस्था के कष्ट कुछ भी नहीं हैं।
संयम
तीनों लोकों में ऐसा कोई भी न हुआ, न है, और न होगा, जिसके कार्य में विघ्न न आये हों और कार्य निर्विघ्न हुआ हो क्योंकि भाग्य पुरुषार्थ की परीक्षा किया ही करता है।
पुरुषार्थ
धन और नारी का मोह छोड़ दिया जाय, तो शेष मोह अपने आप छूट जाता है।
अनासक्ति
जिन्दगी की दौड़ में वो लोग पीछे रह गये, जो कभी दौड़े ही नहीं, 'दौड़ेंगे' कहते-कहते रह गये।
पुरुषार्थ
मात्र पढ़ने वाले, पढ़ाने वाले, शास्त्र का चिन्तन करने वाले तथा आसक्ति पूर्वक कार्य करने वाले सब मूर्ख हैं, जो क्रियावान् है अर्थात् पठित एवं चिन्तित योग्य कार्य को करता है, वही पण्डित है।
ज्ञान
अध्ययन के विना मन विकलांग हो जाता है, और मेहनत के विना शरीर विकलांग हो जाता है।
पुरुषार्थ
शान्त बनना सन्त बनने से भी कठिन है, शान्त मनुष्य वह हो सकता है, जो अपनी प्रशंसा नहीं चाहता है।
संयम
जो सत्य, तप, ज्ञान, अहिंसा तथा ज्ञानियों की विनय और ब्रह्मचर्य को धारण करता है वह विद्वान् है, न कि केवल जो पढ़ता है वह विद्वान् है।
ज्ञान
पर के सम्बन्ध से होने वाली चिन्ता शुभ-अशुभ रूप क्यों न हो, निश्चय से बन्ध कराती है, अतः मुझ मुमुक्षु को पर की चिन्ता से क्या प्रयोजन है? मैं सदा एक हूँ अतः मुझे पर से क्या प्रयोजन है?
अनासक्ति
निर्मलज्ञान से सुशोभित जो मनुष्य जैनधर्म का ज्ञान कराते हैं, वे समस्त पृथिवीतल पर अनायास ही जीवसमूह की रक्षा करते हैं।
ज्ञान
जिसने दोनों हाथ दान की विधि में, मन जैनमत में, वचन सत्य और प्रिय भाषण में, प्राण सब मनुष्यों का उपकार करने में और धन प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा महोत्सवों में सैकड़ों बार लगाया है, ऐसा तीन लोक का अद्वितीय तिलक भाग्यशाली श्रावक पञ्चम काल में भी होता है।
दान
शास्त्रज्ञान, चारित्र और शान्त भाव नामक परम दुर्लभ धन जिनके पास है, वे मनुष्य धनी कहे गये हैं, शेष निर्धन माने गये हैं।
धन
यहाँ पर व्यक्ति काले-गोरे का भेद करता है, किन्तु मरने के बाद राख तो सबकी एक जैसी ही होती है।
Misc.
डण्डा मारकर छत्ते से शहद नहीं मिलती, अतः दादागिरी की अपेक्षा मिठास से काम लीजिए।
वाणी
ज्योतिषियों के चक्कर काटने की अपेक्षा अपना पुण्य बढ़ाइए और कार्य शैली बदलिए।
पुरुषार्थ
गुब्बारे रंग आदि की वजह से नहीं अपनी आन्तरिक क्षमता से आकाश को छूते है।
पुरुषार्थ
धूर्त मनुष्य ज्ञान का तिरस्कार व सरल मनुष्य ज्ञान की प्रशंसा और ज्ञानी लोग ज्ञान का उपयोग करते हैं।
ज्ञान
नाम को पकड़ने वाला मर जाता है, गुणों को पकड़ने वाला तर जाता है।
चरित्र
नीरोगता, विद्वत्ता, सज्जनों के साथ मित्रता, महान् कुल में जन्म और स्वाधीनता ये धन के विना भी मनुष्यों का ऐश्वर्य कहलाता है।
धन