न रणे विजयाच्छूरोऽ, ध्ययनात् न च पण्डितः, न वक्ता वाक् पटुत्वेन, न दाता चार्थदानतः। इन्द्रियाणां जये शूरो, धर्मं चरति पण्डितः, हितप्रयोक्तिभिः वक्ता, दाता सम्मान दानतः।।
रण में विजय प्राप्त करने से नहीं इन्द्रियों के जीतने से योद्धा कहलाता है, अध्ययन से नहीं आचरण से पण्डित कहलाता है, बोलने से नहीं हित में लगाने से वक्ता कहलाता है, दान देने से नहीं सम्मानपूर्वक देने से दाता कहलाता है।
A warrior is so called not by victory in battle but by conquest of the senses; a scholar not by study but by conduct; a speaker not by speaking but by directing others to their welfare; a giver not by giving but by giving with respect.
— आराध्य सूत्र · कण्ठाभरण श्लोक · #17
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