Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Humility

विनम्रता

456 सूत्र · पृष्ठ 1 / 7

जीवन जीने का आनंद संघर्ष में नहीं समर्पण से मिलता हैं जैसे विभीषण ने संघर्ष नहीं समर्पण किया, तो राम ने उसको लंका का राजा बना दिया, रावण ने संघर्ष किया तो मिट्टी में मिला दिया।
विनम्रता
व्रतों को सही ढंग से समझने से नम्रता अपने आप आने लगती है।
विनम्रता
अपनी आलोचना (निंदा) में रुचि होना इस बात का सबूत है कि मैंने अपने घर की देखभाल शुरू कर दी है।
विनम्रता
दूसरों की प्रशंसा और अपनी निंदा करना ही परमात्मा की अर्चना करना है।
विनम्रता
मान करन तें मर गये रहे न जिनके वंश। तीनों को तुम देख लो रावण कौरव कंश ॥
विनम्रता
प्रशंसा किए जाने पर संतुष्ट होना कापोत लेश्या है, प्रशंसा की चाह होना अशुभ परिणाम है।
विनम्रता
अपने चैतन्य की विशुद्धि से अपना लाभ मानने वाला कभी प्रशंसा के शब्दों में हर्ष की आकुलता और निंदा के शब्दों में विवाद की आकुलता नहीं कर सकता।
विनम्रता
मृदुता से प्रभुता मिलती है।
विनम्रता
मुझे लाभ नहीं, जो जनता मेरे समीप आवे, मुझे लाभ नहीं जो उपकार के कोई गुण गावे। कोई क्या कहेगा? यही तो कहेगा कि उपदेश दिये, इनका अच्छा प्रभाव है आदि। सोचो, जो पर पदार्थ के कर्तापन की बात लादे, वह ज्ञानियों की दृष्टि में सम्मान है या अपमान?
विनम्रता
‘समानता’ के भाव से अभिमान और दीनता का अभाव होता है।
विनम्रता
आत्मा का महत्त्व स्वयं है, पर निंदा आत्म प्रशंसा से नहीं, समुद्र की महत्ता स्वयं है तालाबों की तुच्छता बताने से नहीं।
विनम्रता
मुझे ईर्ष्या नहीं, ईश्वर चाहिए, मैं प्रसिद्धि के लिए विशुद्धि नहीं खोना चाहता हूँ, मैं शल्य में नहीं वात्सल्य में जीना चाहता हूँ, मैं हर काम में आऊँ जरूरी नहीं, मैं हर एक के काम आऊँ ऐसी मेरी भावना है, मैं जीत कर हारना नहीं, हारकर भी जीतना चाहता हूँ अर्थात् हारकर भी दूसरों का दिल जीतना चाहता हूँ।
विनम्रता
प्रतिष्ठा की आकांक्षा ही साधना से पतन कराती है।
विनम्रता
जिसकी होनहार खराब होती है वह गुरु के सामने अपने दोषों की आलोचना नहीं करता है। शुद्ध प्रेम सब थकान दूर करता है।
विनम्रता
बड़ा बनने का अवसर छोटे ने दिया उसकी उपेक्षा क्यों ? अर्थात् छोटे के कारण आप बड़े हैं अतः उसका ध्यान रखें।
विनम्रता
व्यक्ति की महानता अहं से नहीं, विनय से प्रकट होती है।
विनम्रता
मुमुक्षु जीव ज्येष्ठ बनने की नहीं श्रेष्ठ बनने की भावना भाता है।
विनम्रता
सम्मान पाने के लिए सम्मान देना जरूरी है।
विनम्रता
जो तीन लोक के नाथ के सामने, गुरु के सामने 'सम्मान' करवाता है वह सम्माननीय नहीं हो सकता है। जिस जगह खड़े होकर निर्वस्त्र होने के भाव होने चाहिए थे, उस जगह शाल ओढ़ रहा है, जिस भूमि पर बैठकर माला फेरने के भाव होने चाहिए थे, वहाँ पर माला पहन रहा है इसका तात्पर्य अभी भव-भ्रमण की माला बाकी है। जिन्होंने मान और मालायें छोड़ी हैं, उनके चरणों में भवसागर तिरने आना था वहाँ सम्मान कराने लगे हैं। अरे जब तक भव (शरीर) का सम्मान चलता रहेगा तब तक भवातीत नहीं हो सकते हैं। कहते हो आज अष्टमी को हरी का त्याग है और उन्हीं पुष्पों की जिसमें करोड़ों कीड़े भरे हैं, उनकी माला पहन रहे हो, भले ही प्लास्टिक के फूलों की हो, ध्यान रखना जब पाषाण के परमात्मा की वंदना करने से निर्बन्ध हो सकते हो, तो फिर फूलों के नाम पर प्लास्टिक के फूलों की माला पहनने से कर्म बंध क्यों नहीं होगा? क्योंकि संकल्प तो पुष्प माला का ही किया है।
विनम्रता
संसार में वह गरीब नहीं जिसके घर खाना न हो, गरीब तो वह है जो गुणियों के गुण कहने में दरिद्रता रखता हो।
विनम्रता
स्वयं की प्रशंसा व दूसरों की निन्दा (बुराई) करने वाला कभी ज्ञानी नहीं हो सकता है।
विनम्रता
प्रशंसा करने वाले ने तुम्हें क्या दे दिया? वह तो आप में क्षोभ पैदा करके संकल्प-विकल्प की चक्की चलाकर चला गया है।
विनम्रता
ऐसी चेष्टा मत करो जिससे तुम्हारा अहंकार प्रतीत हो या दूसरों को क्लेश उत्पन्न हो। शान्ति का प्रदर्शन भी अशान्ति के बिना नहीं होता है।
विनम्रता
अपनी गलतियाँ मानने में कभी भी देर न करें क्योंकि रास्ता जितना लम्बा होगा, वापसी उतनी मुश्किल हो जायेगी।
विनम्रता
अपनी भूल को स्वीकार करने में जो गौरव है वह अन्याय को चिरायु रखने में नहीं है।
विनम्रता
किसी के बुरा भला कहे जाने पर भी अपनी सहजता, सरलता को संतुलित रखिए क्योंकि यही महानता की निशानी है।
विनम्रता
चरित्रवान् अपने दोषों को सुनना पसंद करते हैं दूसरी श्रेणी के लोग नहीं।
विनम्रता
जो बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्य को पाकर इठला कर नहीं चलता वह पण्डित (ज्ञानी) कहलाता है।
विनम्रता
महान् पुरुष की महानता का पता इस बात से लग जाता है कि वह छोटे व्यक्तियों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
विनम्रता
साधुओं के लिए श्रावक को डाँटना नहीं चाहिए क्योंकि श्रावक नौकर नहीं भक्त हैं वे साधुओं को भगवान् समझकर पूजते हैं।
विनम्रता
दरिया ने झरने से पूछा तुझे समन्दर नहीं बनना है क्या? झरने ने बड़ी नम्रता से कहा बड़ा होकर खारा होने की अपेक्षा छोटा रहकर मीठा होना अच्छा है।
विनम्रता
संसार में महान् वह है जो गुणवान की प्रशंसा कर पाता है और सुन पाता है।
विनम्रता
संसार में सबसे अवगुणी वह है जो गुणीजनों के गुण कहने में हिचकता है।
विनम्रता
जब भी कोई प्रतिभावान सामने आये तो हताश होने की बजाय उसके गुणों को बारीकी से पढ़ें।
विनम्रता
जो जितना सज्जन होगा उसके अंग-अंग में उतनी शालीनता होगी।
विनम्रता
यदि कुछ बनना चाहते हो तो सुनना व सहन करना सीखो।
विनम्रता
अनुशासित शिष्य शिक्षा को सुगमता से प्राप्त कर लेता है।
विनम्रता
अत्यन्त क्रोध की अवस्था में भी पूज्य पुरुषों की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
विनम्रता
सच्चा शिष्य गुरु के प्रति भावों को नहीं बदलता है।
विनम्रता
सच्चा शिष्य गुरु के पीछे चलता है, गुरु से नीचे बैठता है, गुरु को सामने आते देखकर खड़ा हो जाता है और गुस्से में भी नीचे स्वर में बात करता है।
विनम्रता
जो अपनी भलाई चाहते हैं, वे महापुरुषों का अपमान करने से बचें।
विनम्रता
जो झुक सकता है वह सारी दुनिया को झुका सकता है। निर्ग्रन्थों का मार्ग निष्पृह वृत्ति का मार्ग है।
विनम्रता
दूसरों को सुधारने का अहं पालने की अपेक्षा अच्छा है स्वयं को सुधारना।
विनम्रता
आदमी झूठी प्रशंसा सुन सकता है पर सच्ची आलोचना नहीं सुन पाता है। आपकी मानसिकता सशक्त किन्तु मृदु होना चाहिए।
विनम्रता
मत बनिये खुदा किसी के वास्ते, आदमी बन जाइये आदमी के वास्ते।
विनम्रता
अहं झुका तो सारे गुण ऊँचे उठ जायेंगे, अहं और इन्द्रिय दर्प विवेक को नष्ट कर देते हैं।
विनम्रता
अपनी गलती को तुरन्त स्वीकार कर लेना और दूसरों की गलती को नजर अंदाज कर देना ही सकारात्मक सोच की दिशा का पहला कदम है।
विनम्रता
योग्यता की कसौटी क्या है? यही कि दूसरों में जो बड़प्पन और श्रेय है, उसे स्वीकार कर लिया जाये; फिर चाहे वह श्रेष्ठता ऐसे ही लोगों में क्यों न हो, जो कि तुम से अन्य बातों में हीन हों।
विनम्रता
अहंकार से तप नष्ट हो जाता है और इधर-उधर कहने से दान निष्फल हो जाता है।
विनम्रता
हम हर मिलने वाले से कुछ सीख सकते हैं पर हमारा दिमाग खुला होना चाहिए।
विनम्रता
अहंकार से तप नष्ट हो जाता है और इधर-उधर कहने से दान निष्फल हो जाता है।
विनम्रता
तत्त्वज्ञ पुरुष को चाहिए कि वह अपमान को अमृत के समान समझकर उससे सन्तुष्ट हो और विद्वान् मनुष्य सम्मान को विष के तुल्य समझकर उससे सदा डरता रहे।
विनम्रता
जो सन्त के सामने झुकते नहीं हैं, प्रकृति उनका सारा शरीर झुका देती है, वक्त की मार जब पड़ती है तो सन्त क्या शैतान के सामने भी सिर झुकाना पड़ता है।
विनम्रता
जीवन में वही गुरु बना पाता है जिसके भीतर का गुरुर मिट जाता है।
विनम्रता
पहली सीढ़ी से चढ़कर ही मानव अन्तिम सीढ़ी पर पहुँचता है अतः पहली सीढ़ी को कभी मत भूलो और पहली सीढ़ी पर खड़े व्यक्ति का साहस बढ़ाओ, तिरस्कार मत करो।
विनम्रता
छोटी नदियाँ शोर करती हैं और बड़ी नदियाँ शान्त चुपचाप बहती हैं।
विनम्रता
ऊँचा उठने के लिए पंखों की जरूरत पक्षियों को होती है इंसानों को नहीं, इंसान तो जितना विनम्रता से झुकता है उतना ही ऊपर उठता जाता है।
विनम्रता
ज्ञान वृद्धि के साथ विनम्रता का विकास होना जरूरी है।
विनम्रता
विद्या से विनय आती, विनय से योग्यता, योग्यता से धन, धन से धर्म, धर्म से सुख अतः सुख की प्राप्ति का मूल विनय है।
विनम्रता
जिन्दगी में अपने से बड़ों को प्रणाम करना सीखिए। कहा जाता है कि प्रणाम परिणाम बदल देता है।
विनम्रता
जो दूसरों से सम्मान नहीं चाहते और स्वयं ही दूसरों को सम्मान देते हैं तथा सम्माननीय पुरुषों को नमस्कार करते हैं, वे दुर्लंघ्य संकटों से पार हो जाते हैं।
विनम्रता
नम्र व्यवहार सबके लिए अच्छा है पर धनवान की नम्रता अमूल्य धन है।
विनम्रता
दुःख और हानि सहने के बाद आदमी अधिक नम्र और ज्ञानी होता है।
विनम्रता
जहाँ नम्रता से काम चल जाय वहाँ उग्रता नहीं दिखानी चाहिए।
विनम्रता
आप अपनी अच्छाई का जितना अभिमान करोगे, उतनी ही बुराई पैदा होगी इसलिए अच्छे बनो पर अच्छाई का अभिमान मत करो।
विनम्रता
जो व्यक्ति अभिमान में चूर रहता है, धर्म उससे उतना ही दूर रहता है।
विनम्रता
बल का घमंड करने से मनुष्य दुर्बल और धन का घमंड करने से दास बनता है।
विनम्रता
विनयी व्यक्ति सर्वत्र आदर-सम्मान पाता है और मरने के बाद देवेन्द्र, चक्रवर्ती, मण्डलीक, राजा-महाराजा आदि बनकर फिर मोक्ष पाता है।
विनम्रता
प्रेम, विनम्रता व अहिंसा से किसी का भी मन जीता जा सकता है।
विनम्रता
आत्मरक्षा के साथ दूसरों को सम्मान दीजिए और विवाद से दूर रहिये।
विनम्रता
व्यक्ति को अपने पूज्यों (माता-पिता-गुरु आदि) के लिए खड़े होकर नमस्कार करना चाहिए बैठकर नहीं।
विनम्रता
अत्यन्त क्रोध की अवस्था में भी पूज्य पुरुषों की आज्ञा का उल्लंघन और अपमान नहीं करना चाहिए।
विनम्रता
अपनी बुद्धि का अभिमान ही शास्त्रों की, सन्तों की बातों को अंतःकरण में टिकने नहीं देता है।
विनम्रता
जब तक स्वार्थ और अभिमान हैं, तब तक किसी के भी साथ प्रेम नहीं हो सकता है।
विनम्रता
अहंकार की कार में बैठकर अधोलोक की यात्रा नहीं, विनय के विमान में बैठकर ऊर्ध्व लोक की यात्रा करो।
विनम्रता