Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
विवेक

खादन्न गच्छामिहसन्न भाषे, गतं न सोचामि कृतं न मन्ये। द्वाभ्यां तृतीयो न भवामि राजन्, किं कारणं भोऽहं भवामि मूर्खः।।

चलते हुए मैं खाता नहीं हूँ, हँसते हुए बोलता नहीं हूँ, नष्ट हुए का शोक नहीं करता, किए हुए कार्य का अहङ्कार नहीं करता, दो लोग बात कर रहे हों तो मैं बीच में नहीं बोलता, तब मैं मूर्ख कैसे कहलाऊँगा।

I do not eat while walking, I do not speak while laughing, I do not grieve over what is lost, I take no pride in what I have done, and when two people are conversing I do not interrupt — so how then, O king, could I be called a fool?

— आराध्य सूत्र · कण्ठाभरण श्लोक · #29

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प्रकृति ने सूर्योदय, सूर्यास्त, गर्मी, बरसात, ठंड सब का समय निश्चित कर रखा है केवल मनुष्य को ही हर बात की छूट दे रखी है, कब सोना, कब जागना, क्या करना सब कुछ स्वयं मनुष्य के हाथ में है वह सब कुछ करने में स्वतंत्र है।
विवेक