Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Dharma

धर्म

423 सूत्र · पृष्ठ 1 / 6

गृहस्थ के द्वारा मरण पर्यन्त जो पाप संचित किए जाते हैं। उन सब पापों को एक रात्रि का दीक्षित साधु'' नियम से भस्म कर देता है।
धर्म
यह पर्याय पदार्थ पाने को नहीं, परमार्थ पाने को मिली है।
धर्म
सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म भाई, दया मित्र, शान्ति पत्नि और क्षमा पुत्र; ये छह ही संसारी प्राणी को सुख देने वाले हैं।
धर्म
ईश्वर के द्वारा बताये नियमों का पालन करना ही ईश्वर का जाप है।
धर्म
हमारे जीवन में सुख कम और दुःख ज्यादा हैं, इसका कारण यह है कि हमने अपना उपयोग धर्म कमाने में कम और कर्म कमाने में अधिक किया है।
धर्म
सांसारिक उपलब्धियाँ समय में हैं, आध्यात्मिक उपलब्धियाँ संकल्प में हैं।
धर्म
मानव जीवन कलह करने को नहीं कल्याण करने को मिला है।
धर्म
जीवन का अमर फल उसी को प्राप्त होता है, जो स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ को अधिक महत्त्व देता है और समभाव से जीवन व्यतीत करता है।
धर्म
धर्म और प्रेम जीवन का दान देकर हासिल किया जाता है।
धर्म
संत, पंथ, मंत्र और ग्रन्थ को बार-बार बदलने वाला दुःखी होता है।
धर्म
धर्म को तिलांजलि देकर न कभी कोई सुखी हुआ है और न ही कभी कोई सुखी हो सकता है। धर्म नहीं जाना चाहिए चाहे सब कुछ चला जावे। धर्म गया तो फिर कुछ नहीं बचेगा।
धर्म
धर्म 'पंथ' नहीं, 'पथ' देता है जिस पर चलकर परमात्मा तक जाया जा सकता है। पथ चलने के लिए होता है जबकि पंथ पकड़ने और झगड़ने के लिए होता है।
धर्म
दुनिया का सबसे बड़ा धर्म स्वयं को जानना है।
धर्म
'धर्म' का सम्बन्ध तन से नहीं मन से होता है, देह से नहीं दिल से होता है, प्रदर्शन से नहीं आत्मदर्शन से होता है।
धर्म
'कर्म' को ध्वस्त करने के लिए धर्म में व्यस्त रहिये।
धर्म
'अधर्म' से जीने की अपेक्षा धर्म से मरना ही श्रेयस्कर है।
धर्म
'धर्म' का आभूषण वैराग्य है, वैभव नहीं।
धर्म
'धर्म' हीन मनुष्य बिना पतवार की नाव के समान है।
धर्म
'धर्म' के बिना विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान बिना धर्म अंधा है।
धर्म
मुनिपद के समक्ष संसार के सभी पद फीके पड़ जाते हैं।
धर्म
संसार के सारे पद भूतपूर्व बनाते हैं लेकिन परमपद (मोक्ष) अभूतपूर्व बनाता है। किसी की मेहरबानी माँगना अपनी आजादी बेचना है।
धर्म
तत्काल किया गया धर्म भी शुभ परिणामों की उत्कृष्टता से पाप कर्म के फल देने की शक्ति की उत्कृष्टता का घात कर शीघ्र ही मनुष्य को शान्ति देता है।
धर्म
जो पापों को गलाये तथा पुण्य की वृद्धि कराये, वह पर्व है।
धर्म
जो पुण्य कार्य करने से रोके वही पाप है और पाप कार्य न करने दे, वही पुण्य है।
धर्म
मनुष्य को किसी भी समय काम वासना से, भय से, लोभ से या जीवन रक्षा के लिए धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए क्योंकि धर्म नित्य है और सुख-दुःख और जीवन अनित्य है।
धर्म
जो हँसी-हँसी में भी मोक्षमार्ग की अवहेलना करता है, उसकी मुक्ति संभव नहीं है।
धर्म
सुख धन के अर्जन में नहीं धर्म के अर्जन में है।
धर्म
धार्मिक स्थान मनोरंजन का नहीं आत्मरंजन का स्थान है।
धर्म
मेरा कर्त्तव्य तो निवृत्ति पथ गमन अर्थात् आत्मकल्याण करना ही है।
धर्म
जो आत्महित पर पहुँचा दे, वह सत् उद्देश्य है।
धर्म
जो आत्म कल्याण में लगा है उससे जीवों का कल्याण व रक्षा होती ही हैं।
धर्म
जो प्रत्येक साधन का लक्ष्य शुद्धात्म तत्त्व को बनाता है, वह शिवपथिक है।
धर्म
डेढ़ घंटे में १० मिनट सप्ताह में एक दिन एक महीने में २-३ दिन एक वर्ष में ८-१५ दिन सपरिवार तीर्थक्षेत्र पर या साधु संगति में धर्मध्यान कर मनोरंजन करें।
धर्म
धर्म में अनुराग हुए बिना धर्मात्मा की सेवा नहीं हो सकती व धर्म में दृष्टि हुए बिना संसार से पार होने का पात्र नहीं हो सकता है।
धर्म
भवसागर पार करने के लिए शुद्धभाव रखने से श्रेष्ठ कोई नौका नहीं है।
धर्म
संयम की विराधना से बचना ही आत्म प्रभावना है एवं श्रावक की टूटी आस्था को धर्म से जोड़ना धर्म की प्रभावना है।
धर्म
धर्म के बल से मनुष्य, देव, विद्याधर और धरणेन्द्र के सुख प्राप्त होते हैं, इस लोक, पर लोक में चन्द्रमा के समान यश तथा पूजा, सम्मान आदि प्रतिदिन प्राप्त होते हैं। पाप के द्वारा दुर्गति सम्बन्धी दुःख नरकगति तथा असहनीय निन्दा और अपयश प्राप्त होते हैं इसलिए हे भाई! जो इष्ट हो वही करो।
धर्म
जगत् के सारे वास छोड़े बिना सिद्धों में वास नहीं हो सकता है। धर्म संत भेष में नहीं संत स्वभाव में होता है।
धर्म
साधु की सच्ची साधना ही सिद्ध भगवान् बनाती है।
धर्म
कठिनता से प्राप्त धर्म को पाकर विषय सुख में रंजित होना, भस्म के लिए चंदन को जलाने जैसा है। विषयों से विरक्त होने पर भी तप भावना, धर्म भावना, समाधि भावना अति दुर्लभ है। जिसको सहना आ गया उसको रहना आ गया।
धर्म
धर्म कोई वाशिंग पाउडर नहीं, जिसे पहले इस्तेमाल करो फिर विश्वास करो। धर्म तो जिन्दगी के साथ भी और जिन्दगी के बाद भी जीवन बीमा कम्पनी की तरह लाभदायक ही है।
धर्म
जब से अग्नि, अम्बर हैं तब से धर्म दिगम्बर है और जब तक अग्नि अम्बर हैं। तब तक धर्म दिगम्बर है। अकषाय भाव का नाम धर्म है।
धर्म
असाधु को साधु बनाने का भाव ही प्रभावना है।
धर्म
भव्य जीव पल-पल अपने विशुद्ध भावों की रक्षा करता है।
धर्म
वैय्यावृत्ति से आत्मबल, साधना, अनुभव, ज्ञान आदि की वृद्धि होती है।
धर्म
मनुष्य गति में मरने या जीने नहीं आये अपितु जन्ममरण मिटाने आये हैं।
धर्म
जो हितकारी तप, दान, धर्म तथा चारित्र आदि को प्रेरणा देकर कराते हैं, वे श्रेष्ठ हैं।
धर्म
ज्ञान या चारित्र की कमी से मोक्षमार्ग नहीं छूटता श्रद्धा की कमी से नियम से मोक्ष मार्ग छूटता है। मौन से ज्ञान बढ़ता है।
धर्म
मोक्षमार्ग व्यवस्थाओं का नहीं व्यवस्थित रहने का है, स्वच्छन्दता का नहीं है स्वतंत्रता का है, उदासी का नहीं उत्साह से साधना का मार्ग है।
धर्म
ज्ञान के साथ श्रद्धान, आचरण के साथ विवेक मोक्षमार्ग बनाता है।
धर्म
प्रथम आत्म पोषण का लक्ष्य होना चाहिए न कि शरीर पोषण का।
धर्म
दिगम्बर मुनि से भगवान् पारसनाथ के जीव ने हाथी की पर्याय में अणुव्रत धारण किए थे और महावीर के जीव ने शेर की पर्याय में मांस का त्याग किया था और आप उनके भक्त मनुष्य पर्याय में भी व्रत नहीं लेते तो फिर कैसे कल्याण हो सकता है?
धर्म
मनुष्य का विकास धन से नहीं, धर्म से होता है।
धर्म
सम्पूर्ण साधना/आराधना आचरण का सार विशुद्धि की वृद्धि करना है।
धर्म
पिच्छी को लेके चले थे, पर पीछे देखने के लिए नहीं आगे चलने के लिए।
धर्म
संघ में स्वाध्याय गौण वैय्यावृत्ति प्रधान होती है क्योंकि वैय्यावृत्ति करने वाला उपगूहन, वात्सल्य, स्थितिकरण और निर्विचिकित्सा इन चार अंगों से मंडित होता है। यदि ये गुण नहीं है तो कोई वैय्यावृत्ति नहीं कर सकता, जो तीर्थंकर प्रकृति की सोलह कारण भावनाओं में से एक है।
धर्म
दृष्टि में अनेकान्त, वाणी में स्याद्वाद और चर्या में अहिंसा यही जैन दर्शन का मूल सिद्धान्त है।
धर्म
अनेकान्त की वैशाखी के सहारे व्यक्ति शान्ति की दिशा में प्रस्थान कर सकते हैं।
धर्म
सम्यग्दृष्टि क्रम-क्रम से सप्त परम स्थानों को प्राप्त करता है– १. सज्जाति, २.सद्गृहस्थता, ३. मुनियों के व्रत, ४. सुरेन्द्र पद, ५. राज्य पद, ६. अरहंत पद, ७. सिद्ध पद।
धर्म
निःशंक हुए बिना निःसंग नहीं हुआ जा सकता है।
धर्म
उपगूहन अंग जिसके पास नहीं वह सम्यग्दृष्टि तो दूर भद्र परिणामी मिथ्यादृष्टि भी नहीं है। साधक की निर्मल साधना ही सच्ची प्रभावना है।
धर्म
यदि आपने अपने अपमान के कारण धर्म छोड़ा तो भूल होगी क्योंकि अपमान द्रव्य का नहीं पर्याय का हुआ है अर्थात् आत्मा का नहीं शरीर का हुआ है।
धर्म
संसार के उच्छेद का कारण रत्नत्रय की आराधना ही है।
धर्म
जो गृह में रहकर निमित्त-नैमित्तिक अनुष्ठान करता वही श्रावक कहलाता है।
धर्म
दूध की मीठी चम्मच बच्चे का मुख तो मीठा कर ही देती है दूध पियेगा तो पेट भरेगा, उसी प्रकार देशना के शब्द अन्दर गये तो कल्याण होगा ही बाहर रहे तो भी पुण्य बंध होगा ही एवं उतने समय पाप से बचेंगे।
धर्म
जो आत्मा के स्वरूप की शुद्धि का घात करे उसका नाम अशुद्धि है।
धर्म
वह 'सुख' है जहाँ दुःख नहीं है, वह 'गति' है जहाँ से पुनः न आना पड़े, वह 'ज्ञान' है जहाँ अज्ञान न हो, इसलिए हे भाई! तू शाश्वत पद की भावना कर।
धर्म
धर्म धैर्य की अपेक्षा रखता है।
धर्म
साधना का लक्ष्य है–एक ओर तो वासनाओं का नाश करना और दूसरी ओर सद्वृत्तियों का विकास करना-वासनाओं के नष्ट होते ही हृदय दिव्य भावों से परिपूर्ण हो जायेगा और हृदय में दिव्य भावों के प्रवेश करते ही समस्त दुर्बलतायें भाग जाएंगी।
धर्म
अशुद्ध साधना का परिणाम अशुद्ध ही होता है।
धर्म
जो बड़ी कठिनता से मिलता है, बिजली की चमक की तरह चंचल है, ऐसे 'मनुष्य जन्म' को पाकर जो धर्म साधना में प्रमाद करता है, वह सज्जन नहीं दुष्ट एवं दूर भव्य है।
धर्म
धर्म का दान सारे दानों को जीत लेता है, धर्म रस सारे रसों को जीत लेता है, धर्म में प्रेम सब प्रेमों को जीत लेता है, तृष्णा का विनाश सारे दुःखों को जीत लेता है।
धर्म
'साधना' मात्र ही शक्ति की आराधना है।
धर्म
मनुष्य की संस्कृति क्या है? वह आत्म शोधन की, आत्मोद्धार की, अपने आपको मुक्त कराने की प्रक्रिया है।
धर्म
मनुष्य स्वतंत्रता से सुख, शान्ति, परम तत्त्व एवं परमपद प्राप्त करता है। स्वयं अपने प्रति उत्तरदायी होना अर्थात् कर्त्तव्य करना ही स्वतंत्रता है।
धर्म