Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Attachment & Detachment

अनासक्ति

630 सूत्र · पृष्ठ 1 / 9

किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति
जैसे अतिथि आपके माल पर मालकियत नहीं जताता है, वैसे ही आप भी पर पदार्थ पर मालकियत मत जताओ क्योंकि आप भी अतिथि हो।
अनासक्ति
दुनिया में सभी को अकेले ही जीना मरना पड़ता है, भले ही बहुत भीड़ हो किन्तु अपने आँसु स्वयं को ही पोंछने पड़ते हैं।
अनासक्ति
आशा और आकांक्षा की दीवार परमात्मा के दर्शन नहीं होने देती।
अनासक्ति
आत्मा की हानि शारीरिक रोग से नहीं, विकारी भावों से होती है।
अनासक्ति
विषयों से विरक्ति व अध्यात्म में आसक्ति वाला ही आनंद को प्राप्त करता है।
अनासक्ति
कनक, कामिनी और कीर्ति की कामना ही साधक को साधना से गिराती है।
अनासक्ति
साधक का न तो जन-समुदाय में राग होना चाहिए, न एकान्त में। कल्याण परिस्थिति से नहीं होता, अपितु राग रहित होने से होता है।
अनासक्ति
किसी के अभाव में कष्ट की अनुभूति न होना अनासक्ति है।
अनासक्ति
मनुष्य को कर्मों का त्याग नहीं करना, अपितु कामना का त्याग करना है।
अनासक्ति
संसार से विमुख होने पर बिना प्रयत्न किए स्वतः सद्गुण आते हैं।
अनासक्ति
विचार करो कि अपना कौन है? अगर अभी मौत आ जाये तो क्या कोई हमारी सहायता कर सकता है?
अनासक्ति
जीवन को सहज भाव से लेना मुक्ति का पहला चरण है। आप स्वयं को महत्वाकांक्षों से जितना अधिक बाँधोगे, मुक्ति की मंजिल उतनी ही दूर होती जाएगी।
अनासक्ति
मुक्ति इच्छा के त्यागने से होती है, वस्तु के त्यागने से नहीं।
अनासक्ति
जब तक तुम्हें अपने लिए सुख और दूसरे के लिए दुःख की चाह है, तब तक तुम सदा दुःखी रहोगे।
अनासक्ति
अब देश से नहीं अपितु इस देह से स्वतन्त्र होना चाहिए।
अनासक्ति
जिसकी दृष्टि में भुक्ति है अर्थात् भोग हैं; मुक्ति उससे बहुत दूर है।
अनासक्ति
जिससे राग हो जाता है, उसमें दोष नहीं दिखते और जिससे द्वेष हो जाता है, उसमें गुण नहीं दिखते।
अनासक्ति
राग-द्वेष रहित होने पर ही वस्तु अपने वास्तविक रूप में दिखती है।
अनासक्ति
'निराग्रह' व्यक्ति ही निर्माण को उपलब्ध होता है।
अनासक्ति
राजभवनों के मोह से मनुष्य आजीवन मानसिक कारावास भोगता है।
अनासक्ति
वैरागी की आत्मशक्ति के सम्मुख विश्व की समस्त शक्तियाँ असफल हैं।
अनासक्ति
संसार में रहना पाप नहीं है, संसार में रमना पाप है अर्थात् पदार्थों के प्रति आसक्ति पाप है।
अनासक्ति
राग के समान कोई आग नहीं, द्वेष के समान कोई अनिष्ट ग्रह नहीं, मोह के समान कोई जाल नहीं और तृष्णा के समान कोई नदी नहीं है।
अनासक्ति
जिनके चित्त से राग द्वेष का नाश हो जाता है वे ज्ञानी, गुणी, दानी और ध्यानी हैं।
अनासक्ति
खोज करने पर कदाचित् अग्नि के मध्य शीतलता दिख सकती है परन्तु संसार में सुख किसी तरह और किसी समय नहीं दिख सकता है।
अनासक्ति
भगवत् प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है–भोग और संग्रह की रुचि। दूसरों के सुख से सुखी होने पर ‘भोग’ की रुचि और दूसरों के दुःख से दुःखी होने पर ‘संग्रह’ की रुचि मिट जाती है।
अनासक्ति
परमात्मा के सम्मुख होने का उपाय है–संसार से सर्वथा विमुख होना।
अनासक्ति
मन में किसी प्रकार की आसक्ति का न होना पवित्रता है।
अनासक्ति
मालिक गुलाम का भी गुलाम होता है क्योंकि मालिक को नौकर की पराधीनता झेलना पड़ती है।
अनासक्ति
किसी चीज से प्रभावित न होना ही मुक्ति है।
अनासक्ति
मोही-ज्ञानी भी संसारी है जबकि निर्मोही अल्पज्ञानी मोक्षमार्गी होता है।
अनासक्ति
अप्राप्त वस्तु को पाने की लालसा दुःख का कारण है, परन्तु वस्तु प्राप्त हो जाने पर उसकी सुरक्षा महादुःख का कारण है।
अनासक्ति
आन्तरिक विरक्तता के बिना बाह्य विरक्तता शव के शृंगार के समान है।
अनासक्ति
कल्याण का पथ प्रत्येक पदार्थ से विरक्त होना है।
अनासक्ति
वैराग्य से आत्म सुख प्राप्त होता है, वैराग्य से दुःख का नाश होता है, वैराग्य से शरीर में नीरोगता रहती है और वैराग्य से मोक्ष का सुख प्राप्त होता है।
अनासक्ति
ऐसे जियो कि दुनिया में तुम रहो किन्तु दुनिया तुम में न रहे अर्थात् किसी वस्तु से राग न हो।
अनासक्ति
संसार के संयोग का वियोग तो अवश्यम्भावी है, पर वियोग का संयोग अवश्यम्भावी नहीं है अतः संसार का वियोग ही सत्य है।
अनासक्ति
सांसारिक पदार्थ, मान, बड़ाई, प्रशंसा, आराम, सत्कार आदि प्रिय लगना पतन का कारण है।
अनासक्ति
सम्यग्दृष्टि स्वर्ग की सम्पदा को पाकर भी उदासीन रहता है।
अनासक्ति
सम्यग्दृष्टि का परिवार से अटेचमेंट तो होता है पर आसक्ति नहीं रहती है।
अनासक्ति
दुःखों का मूल ममता है तो सुखों का मूल समता (सुख-दुःख में समान भाव) है।
अनासक्ति
निर्मोही ही सच्चे सुख का अधिकारी होता है।
अनासक्ति
जो सुख लेने की इच्छा से किसी के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ता वह जीता है तो आनन्द से जीता है और मरता है तो आनन्द से मरता है परन्तु सुख लेने की इच्छा से सम्बन्ध जोड़ने वाला जीते हुए भी दुःख पाता है और मरते हुए भी दुःख पाता है।
अनासक्ति
सांसारिक पदार्थों के संयोग से होने वाला सुख हमारा नहीं है हमारे लिए भी नहीं है; क्योंकि हम तो सदा रहने वाले हैं और सांसारिक सुख मिटने वाला है।
अनासक्ति
हमारे पास जो भी वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य आदि है, वह सब स्थाई नहीं है हमसे भूल यह होती है कि उस वस्तु आदि को हम स्थाई मानकर उससे सुख भोगने लगते हैं इससे हमें विवश होकर दुःख भोगना पड़ता है।
अनासक्ति
जब त्यागी हुए तब आत्म कल्याण के अतिरिक्त अन्य किसी कार्य का लक्ष्य नहीं बनाओ। लोग तो उद्धार, परोपकार और शुभोपयोग आदि शब्द कहकर राग की आग लगाकर अलग ही रहते हैं, जलना पड़ता है तुम्हें।
अनासक्ति
किसी से खास परिचय करना विकल्पाग्नि का ईंधन है, महती विपत्ति है। आत्मा की तो विकल्प में हत्या ही होती रहती है।
अनासक्ति
अनिष्ट विषय में अरुचि का होना इष्ट विषयों में रुचि का द्योतक है।
अनासक्ति
संसार की असारता, दुःखों की अपारता। उलझ गये तो कुछ नहीं, सुलझ गये तो शाश्वता॥
अनासक्ति
जब तुमने दुनिया को त्यागा, तब दुनिया के लिए तुम्हारी सत्ता नहीं रही यानि तुम कुछ नहीं रहे, फिर भी यदि जबरन किसी के कुछ बनना चाहो तो तुम्हारा यह जीवन व्यर्थ है और दुःखमय है।
अनासक्ति
राग-द्वेष बढ़ाना ही आत्मबल घटाना है, समता रखना ही आत्म बल बढ़ाना है।
अनासक्ति
रागद्वेष मोह का निमित्त, आश्रय, आधार और विषय पर पदार्थ हैं। यदि किसी से कहा जाये कि तुम रागद्वेष मोह करो किन्तु शुद्धात्मा के सिवाय अन्य पदार्थ में मत करो तो वह कर ही कैसे सकता है।
अनासक्ति
राग की वेदना मेटने का उपाय तो यह है कि राग के विषयभूत पदार्थ को भिन्न समझो तथा उस राग को भी अपने स्वभाव से भिन्न एवं अहितकारी समझो।
अनासक्ति
मोक्षमार्ग के सेवक को धार्मिक संस्थाओं के झंझट में भी नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि लोग जुदे- जुदे ख्याल के होते हैं, अपने अभिप्राय के अनुकूल कार्य का होना अत्यन्त कठिन है।
अनासक्ति
आत्मा अनादि अनन्त है तब मनुष्य पर्याय के व्यवहार में क्या रुचि रखना।
अनासक्ति
पर की अनुकूल परिणति नहीं स्वयं का विरक्ति भाव ही सुखी बनायेगा।
अनासक्ति
किसी वस्तु से लगाव होना राग है और उसके बिना न रह पाना मोह है।
अनासक्ति
इस असार परिवर्तनशील संसार में प्रतिष्ठा का व्यामोह करना घोर दुःखों का कारण है।
अनासक्ति
परवस्तु को ग्रहण करने वाला चोर कहलाता है, परन्तु तुम तो सतत पर को अपना मानते हो धिक्कार ऐसी चोर जैसी जिन्दगी को।
अनासक्ति
सम्मान का अभाव अखरना, दूसरे अच्छी दृष्टि से न देखे तो अखरना, पड़ोसी से अधिक वैभव न हो तो अखरना, पर आत्माओं से स्नेह होना ये सब पर द्रव्य को अपना मानने के कारण होता है। अनात्म दृष्टि पिशाचिन की करतूत है।
अनासक्ति
भविष्य में स्वप्नवत् हो जाने वाली घटना को अभी स्वप्न वत समझो तो महती शान्ति मिलेगी।
अनासक्ति
विभाव-विकार के वियोग से मोक्ष मिलता है, अतः अच्छा है।
अनासक्ति
सांसारिक सुख रेत का घर है और उसका फल उसे मिटना ही है।
अनासक्ति
जिन पदार्थों के देखने से राग-द्वेष बढ़े उनका देखना और सुनना भी अपशकुन है।
अनासक्ति
जिन पदार्थों के देखने-सुनने से राग-द्वेष मोह में शैथिल्य हो उनका देखना-सुनना शुभ शकुन है।
अनासक्ति
पर पदार्थ में ममत्व रखने के कारण अनन्त काल से दुःख भोगा है, पर पदार्थ अपना होता नहीं है, फिर ममत्व क्यों करना?
अनासक्ति
जब-तक राग रहेगा चाहे वह धार्मिक संस्था का भी क्यों न हो, निर्भय और निःशल्य नहीं रह सकोगे, निर्मलता ही अलौकिक वैभव है और वही सहायक है।
अनासक्ति
अनासक्ति की परीक्षा इष्ट अनिष्ट द्रव्य के लाभ होने में होती है।
अनासक्ति
इच्छा करना अपनी आत्मा को दुःखी करना है। जिसकी इच्छा की जाती है उसका परिणमन उसके होनहार से होता है इच्छा से अपना बिगाड़ करने के अलावा और कुछ नहीं होता। कदाचित् इच्छा के अनुकूल उसी की होनहार से कुछ हो भी जावे तो भी राग रूपी कीचड़ लपेट देने के सिवाय आत्मा को और क्या मिल जाता है?
अनासक्ति
सत्पुरुष वही है जो संसार शरीर और भोगों से विरक्त है।
अनासक्ति
हे आत्मन्! तूने अनन्त भव बिता दिये, जिनमें विविध भोग भोगे, अब यह भव बिना भोग के ही सही, फिर बिना अहंकार ममकार का ही सही फिर तू अनन्तकाल सुख भोगेगा, दुःख की छाया भी न रहेगी।
अनासक्ति
हाथ से छूटे उसका नाम त्याग है और हृदय से छूटे उसका नाम वैराग्य है। संसारी तन धन को, संन्यासी मन-जीवन को संभालता है।
अनासक्ति
दुनिया में वस्त्र रहितों की संख्या तो बहुत है किन्तु वासना रहितों की संख्या कम है।
अनासक्ति