Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

एकस्यापि विरोधेन लभते विपदं नरः। महानपि कुलीनोऽपि, किं पुनर्बहुभिः सह।।

एक व्यक्ति का विरोध करने से महान पुरुष भी विपत्ति में पड़ जाता है, फिर अधिक लोगों का विरोध करने वाले मनुष्य का तो कहना ही क्या?

By opposing even a single person a great man may fall into calamity; what then of one who opposes many?

— आराध्य सूत्र · कण्ठाभरण श्लोक · #23

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति