Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
समाधि

अश्रोत्रीव तिरस्कृतापरतिरस्कार श्रुतीनां श्रुतिः, चक्षुर्वीक्षितुमक्षमं तव दशां दुष्यामिवान्ध्यं गतं। भीत्येवाभिमुखान्तकादतितरां कायोऽप्ययं कम्पते, निष्कम्पस्त्वमहो प्रदीप्तभवनेऽप्यासे जराजर्जरे।।

वृद्धावस्था में दूसरों के तिरस्कार पूर्ण वचनों को सुनने में समर्थ न होने से ही मानो कान बहरे हो जाते हैं, वृद्धावस्था की दयनीय दशा को देखने में समर्थ न होने से ही मानो नेत्र अन्धे हो जाते हैं, फिर भी खेद है कि जरा से जर्जरित शरीर में यह प्राणी निश्चिन्त बैठा है।

In old age the ears, as if unable to bear hearing others' contemptuous words, become deaf; the eyes, as if unable to look upon the pitiable state of old age, become blind; the very body trembles greatly as though from fear of approaching death — yet, alas, this being sits unconcerned within a body decayed by age.

— आराध्य सूत्र · आत्मानुशासन 91 · #20

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बालक जन्मता है तो वह बड़ा होगा कि नहीं, पढ़ेगा कि नहीं, उसका विवाह होगा कि नहीं, उसके बाल-बच्चे होंगे कि नहीं, उसके पास धन होगा कि नहीं आदि सब बातों में सन्देह है, पर वह मरेगा कि नहीं, इसमें कोई संदेह नहीं है।
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