Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Character

चरित्र

1104 सूत्र · पृष्ठ 1 / 15

जहाँ सजावट है, वहाँ मिलावट है।
चरित्र
बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रिय निग्रह, शास्त्र ज्ञान, पराक्रम, अधिक न बोलना, शक्ति अनुसार दान देना और कृतज्ञता–ये आठ गुण पुरुष की ख्याति बढ़ा देते हैं।
चरित्र
उपदेश भले ही थोड़ा हो पर जो उच्चारण में हो वही आचरण में हो, जो मुख में हो वही मन में हो, जो दिमाग में हो वही दिल में हो, जो जिह्वा में हो वही जीवन में हो।
चरित्र
दुर्गति का घोंसला छोटी-छोटी बुरी आदतों के तिनकों से ही बुना जाता है।
चरित्र
आत्महित का पथ चर्चा प्रधान नहीं, चर्या प्रधान है।
चरित्र
सच्चरित्र ही तीर्थ है, सद्ज्ञान ही धन है, सद्-दर्शन ही धर्म है।
चरित्र
हमारा जन्म नर से नारायण बनने को हुआ है, ना कि नर से वानर बनने को।
चरित्र
निष्कर्म होने के लिए जीवन में सरलता एवं सहजता लाइए।
चरित्र
यदि गुलाब की तरह सभी को आकर्षित करना चाहते हो तो याद रखो कि सुख में फूलना नहीं और दुःख में कूलना नहीं।
चरित्र
आत्मविश्वास, दृढ़ता, वैराग्य; ये गुण जिस मानव में होते हैं, वही सभी उदार गुणों का स्वामी होता है।
चरित्र
भीख माँगने वाला भी स्वाभिमानी होता है, लेकिन दूसरों पर आश्रित रहने वाला दीन हीन होता है।
चरित्र
आदमी को अपनी प्रसिद्धि के लिए अपनी विशुद्धि नहीं खोना चाहिए।
चरित्र
भूल की पुनरावृत्ति न होने देना भी भूल का सबसे बड़ा प्रायश्चित है।
चरित्र
मोक्ष मार्ग में शरीर की शुद्धता से ज्यादा आचार-विचार और दिल-दिमाग की शुद्धता की आवश्यकता होती है।
चरित्र
अत्यन्त अभिमान, अधिक बोलना, त्याग का अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालने की चिन्ता और मित्र मोह; ये छह तीखी तलवारें देह धारियों की आयु को काटती हैं।
चरित्र
स्वाभिमानी और पवित्र हृदय वाला पुरुष निर्धन होने पर भी श्रेष्ठ गिना जाता है।
चरित्र
स्वार्थी व्यक्ति परमात्मा से दूर होते हैं।
चरित्र
एक सच्चा हृदय सारे संसार की विलक्षण शक्तियों से अधिक मूल्यवान है।
चरित्र
महा पुण्यात्मा जीव ही गुरु आज्ञा में रहकर चारित्र का पालन करता है।
चरित्र
आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ अच्छा आदर्श छोड़कर जाना अध्यात्म का एक हिस्सा है।
चरित्र
खलनायक पथभ्रष्ट और नायक सत्यनिष्ठ होता पर जैन संस्कृति मूलनायक बनने की है।
चरित्र
निष्कपटता की परीक्षा स्वार्थ साधन के अवसर पर होती है। छलने से आत्मा मलिन होती, छले जाने से नहीं।
चरित्र
निःस्वार्थ भाव ही अमृत है और निःस्वार्थ भाव से कार्य करना ही अमृतपान है।
चरित्र
आत्मन्! तुम्हें तो प्रत्येक पदार्थ या अवस्था के गुण ग्रहण करने की ही आदत डालनी चाहिए।
चरित्र
कष्टों में कर्त्तव्यों को भूलने वाला बहिरात्मा है। छिपे कर्त्तव्य में ही मजा है।
चरित्र
तपस्या और विद्या अन्तःकरण की पवित्रता बिना व्यर्थ है।
चरित्र
दूसरों के लिए हम उपादान नहीं बन सकते लेकिन निमित्त बन सकते हैं, अतः अच्छे काम में निमित्त अवश्य बने क्योंकि निमित्त के बिना काम नहीं होता है।
चरित्र
अवगुण नाव के छिद्र के समान हैं जो नाव को ले डूबते हैं।
चरित्र
ग्यारहवें गुणस्थान से चौथे गुणस्थान में आना सम्यक्त्व का नहीं चारित्र का दोष है।
चरित्र
जीव की सहन शक्ति और उत्साह शक्ति ही उसे महान् बनाती है।
चरित्र
जो चारित्र को धारणकर परीषह के भय से छोड़ देते हैं वे कायर पुरुष हैं।
चरित्र
बुराई मन को खुशी देती है परन्तु आत्मा को दुःख देती है किन्तु अच्छाई मन और आत्मा दोनों को सुख देती है।
चरित्र
मन की पवित्रता से चारित्र में पवित्रता आती है। चारित्रवान के साथ दुनिया होती है। अपरिग्रही अनगार को जो आनंद होता वह अहमिन्द्र को भी नहीं होता है, चक्रवर्ती को उसके अनंतवें भाग भी नहीं होता है।
चरित्र
मानस की सबसे बड़ी आवश्यकता शिक्षा नहीं चारित्र है क्योंकि यही सबसे बड़ा रक्षक है, चारित्र के बिना व्यक्तित्व खोखला है।
चरित्र
चारित्र जीवन में शासन करने वाला तत्त्व है और वह प्रतिभा से उच्च है। छोटे-छोटे प्रलोभनों का आकर्षण चारित्र को गिरा देता है।
चरित्र
चारित्र की तलवार के साथ वैराग्य की ढाल होना परमावश्यक है।
चरित्र
जिसका चारित्र शुद्ध है, उसकी समाधि भी श्रेष्ठ होगी।
चरित्र
गुप्ति, समिति, परीषहजय, चारित्र की रक्षा करने वाली बारह भावनाएँ हैं।
चरित्र
यदि धन नष्ट हुआ तो कुछ नहीं हुआ, यदि स्वास्थ्य नष्ट हुआ तो कुछ नष्ट हुआ, यदि चारित्र नष्ट हुआ तो सब कुछ नष्ट हुआ अतः चारित्र अच्छी तरह रक्षणीय है।
चरित्र
अध्ययन करना-सुनना, चारित्र पालन करने वाले का ही सार्थक है।
चरित्र
खराब चित्र देखने से चित्त खराब होता है और चित्त खराब होने से चरित्र खराब हो जाता है। जैसे दिखते हो या दिखाना चाहते हो वैसे बनो।
चरित्र
शक करके बर्बाद होने से अच्छा है, विश्वास करके लुट जाना।
चरित्र
मन, वचन, काय की अशुद्धि में, विशुद्ध कार्य नहीं हो सकता है।
चरित्र
सम्यग्दृष्टि अन्याय, अभक्ष्य और अनीति से दूर रहता है।
चरित्र
सद्भावना में शक्ति है, जो सोचता है कि मैं दूसरों के काम आ सकने के लिए कुछ करूँ, वही आत्मोन्नति का सच्चा पथिक है।
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मेरी शक्ति दस लोगों के बराबर है क्योंकि मेरा हृदय पवित्र है।
चरित्र
नीच मनुष्य इस लोक के लिए ही कार्यारम्भ करता है, मध्यम श्रेणी का मनुष्य परलोक में फल पाने के लिए और विशिष्ट धर्म वाला उत्तम श्रेणी का मनुष्य पुनर्जन्म से मुक्ति के लिए ही कार्य करता है।
चरित्र
उत्तम विचार और महान् चरित्र बल ही परम धन है।
चरित्र
यदि पुत्र अच्छा हो तो सास-बहु क्यों लड़े ? यदि तवा भारी हो तो रोटी खराब क्यों हो? यदि सवार ठीक हो तो घोड़ा क्यों अड़े ? यदि नियत अच्छी हो तो व्यक्ति भूखा क्यों मरे?
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व्यसन तो बहुत प्रकार के होते हैं परन्तु विद्याभ्यास और भगवत् सेवा ये दो व्यसन (आदतें) ही सच्चे व्यसन हैं।
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साधु पुरुष का हृदय समृद्धि में कोमल और आपत्ति के समय कठोर हो जाता है।
चरित्र
जो उपकारियों के प्रति सज्जन है, उसकी सज्जनता में क्या? जो अपकारियों के प्रति भी सज्जनता का व्यवहार करता है, सज्जन उसे ही साधु कहते हैं।
चरित्र
गुण का सच्चा मानदण्ड मन में स्थित है। जिनके सद्विचार हैं वे सत् पुरुष हैं।
चरित्र
सौन्दर्य पवित्रता में रहता है और गुणों में चमकता है।
चरित्र
सच्चे सौन्दर्य का रहस्य सच्ची सरलता है।
चरित्र
पूजन, अध्ययन, दान, तप इन चार का तो कोई लौकिक प्रयोजन के लिए भी सेवन कर सकता है, परन्तु सत्य, क्षमा, दया, निर्लोभता ये चार तो जो सज्जन नहीं हैं उनमें रह ही नहीं सकते हैं।
चरित्र
धन बल नहीं है, साधुता एवं पवित्रता ही बल है।
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मैं अब अपने आदर्श से हटकर जीने की अपेक्षा आदर्श के समीप मरना अधिक पसंद करूँगा।
चरित्र
आत्म कार्य भी महान् कार्य है, केवल पर कार्य ही नहीं।
चरित्र
मनुष्य का समस्त चरित्र उसके विचारों से बनता है।
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प्रेम सब पर करो, विश्वास कुछ पर करो, बुरा किसी का भी न करो।
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वास्तविक सौन्दर्य हृदय की पवित्रता में है।
चरित्र
यदि किसी को अपनी आत्मा से प्रेम है, तो उसे पाप की ओर किंचित् भी नहीं झुकना चाहिए
चरित्र
रमणी के सतीत्व की तरह महत्त्व की रक्षा भी केवल अन्तरात्मा की शुद्धि से ही की जा सकती है।
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लोक में विश्वास घात से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है।
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जो तप, शास्त्र ज्ञान, धैर्य, ध्यान, विवेक, यम और संयम के द्वारा वृद्ध हैं, वे प्रशंसनीय हैं न कि सफेद बालों से वृद्ध प्रशंसनीय हैं।
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शीलवती स्त्री के पास लज्जा स्वभाव से होती है।
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जिस सौन्दर्य में शील नहीं, वह अशोभनीय है और जिस शील में संयम नहीं, वह नाटकीय है। बिना सद्गुण के सुंदरता अभिशाप है।
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यदि आप सच्ची सुगंध फैलाना चाहते हैं तो श्रृंगार से परहेज करें और सुगंधित द्रव्यों के पीछे न दौड़ें।
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स्वच्छता फटे पुराने वस्त्रों में भी सौन्दर्य ला देती है।
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कुरूपता शील से सुशोभित होती है।
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अच्छे कुल की सती स्त्री, पर पुरुष का धक्का लगने पर क्षमा माँगकर आगे बढ़ जाती है।
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अन्धे, कुब्जे, कोढ़ी, रोग से पीड़ित तथा आपत्ति ग्रस्त पति को जो नहीं छोड़ती वह महासति है।
चरित्र
वासनाएँ आदमी को बदसूरत और सरलता आदमी को सुन्दर बना देती है।
चरित्र
सारी शिक्षाएँ एक किनारे रखी जाएँ और शिष्टाचार दूसरे किनारे रखा जाए तो शिष्टाचार की कीमत अधिक होगी।
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