Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Charity

दान

491 सूत्र · पृष्ठ 1 / 7

उपकार करके उसके बदले की आशा रखना अपने सत्कर्म पर राख डालने के समान है।
दान
दूसरों के लिए रत्तीभर काम करने से भीतर की शक्ति जाग उठती है। दूसरों के लिए रत्तीभर सोचने से धीरे-धीरे हृदय में सिंह का बल आ जाता है।
दान
परोपकार में सर्वदा संलग्न रहने वाला सज्जन व्यक्ति विनाश के अवसर पर भी विनाश करने वाले से भी शत्रु भाव नहीं रखता है जैसे चन्दन का वृक्ष काटने वाले कुल्हाड़े का भी मुख सुगन्धित कर देता है।
दान
सुख और आनन्द ऐसे इत्र हैं, इन्हें जितना अधिक दूसरों पर छिड़केंगे उतनी ही सुगन्ध आपके भीतर समाएगी।
दान
ज्ञान, वैभव और आनंद जितना बाँटो वह अनेक गुना वापस लौटेगा।
दान
रोगी को देखकर आना शिष्टाचार है, दवा लाकर देना सच्ची संवेदना है।
दान
जो दूसरों के लिए जीवन जीता है, उसका जीवन साधु जैसा होता है।
दान
साधु लोग यदि अपने आलस्य को दूर कर मठों, धर्मस्थानों में रखा धन सार्वजनिक सेवा में खर्च करें, तो उनके विरुद्ध जो शिक्षितों में भावना है वह अविलम्ब दूर हो सकती है।
दान
जिन्दगी में आप कितने खुश हैं यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्त्वपूर्ण है कि आपकी वजह से कितने लोग खुश हैं।
दान
अपना दुःख हटाने का तरीका है सबका दुःख बाँटना और अपनी खुशी बढ़ाने का तरीका है सबको खुशी बाँटना।
दान
अज्ञानी को ज्ञान, भूखे प्यासे को भोजन, भूले को मार्ग दें, दुःखी की सेवा करें।
दान
जो हाथ सेवा के लिए आगे उठते हैं, वे प्रार्थना करने वाले ओठों से अधिक पवित्र होते हैं।
दान
तुम्हारे पास कितना धन है इस बात का विचार रखो और उसके अनुसार ही तुम दान दक्षिणा दो, योग क्षेम की बस यही रीति है।
दान
कौआ अपने भाइयों से अपने भोजन को स्वार्थ से छिपाता नहीं है, बल्कि प्यार से उन्हें बुलाकर खाता है, ऐश्वर्य ऐसी ही प्रकृति के लोगों के साथ रहता है।
दान
सज्जन लोग रत्न पाकर उतने प्रसन्न नहीं होते हैं, जितने प्रसन्न उस रत्न को किसी निर्लोभ पात्र को देकर होते हैं।
दान
पुण्य बताने से घटता है, छिपाने से बढ़ता अतः छपाकर नहीं छिपाकर दान दें।
दान
थोड़े में से भी जो दान दिया जाता है, वह हजारों के दान की बराबरी करता है क्योंकि वह श्रद्धा पूर्वक दया से दिया जाता है।
दान
जलते हुए घर में से आदमी जिस वस्तु को निकाल लेता है, वही उसके काम की होती है न कि वह जो वहाँ जल जाती है इसी प्रकार यह संसार जरा-मरण से जल रहा है इसमें से दान देकर निकाल लो, जो दिया जाता है वह सुरक्षित होता है।
दान
यदि किसी को दूध नहीं पिला सकते तो छाछ देने में क्या हानि है? अन्न देने में समर्थ नहीं तो प्यासे को पानी तो पिला सकते हो।
दान
धन में अस्थिरता का स्वभाव होता है वह प्राप्त हो तो तुरन्त स्थिर धर्मों को सम्पन्न करना चाहिए।
दान
त्यागी व्यक्ति पहले धन का दान देता है बाद में प्राण त्याग करता है, कृपण पहले प्राण त्याग कर देता है बाद में धन।
दान
जिसमें उदारता है उसे वीरता की आवश्यकता नहीं है।
दान
उदार हृदय वाला पुरुष जब तक जीता रहता है तब तक आनन्द से ही रहता है और संकीर्ण हृदय वाला आयुपर्यंत दुःखी ही रहता है।
दान
सर्वस्व का त्याग मोक्ष है, मेरा मन मोक्ष चाहता है, यदि मुझे सब कुछ छोड़ ही देना है तो अच्छा है कि उसे प्राणियों को दे दिया जाय।
दान
जिस आदमी ने अपना सब कुछ दे दिया है, उसने दिया नहीं पाया है।
दान
धन का देना मित्रता का कारण है परन्तु वापस लेना शत्रुता का कारण है।
दान
प्रशंसा करने वालों के मुख पर सदा उन लोगों का नाम रहता है जो गरीबों को दान देते हैं।
दान
अप्रसिद्ध और अप्रतिष्ठित लोगों को प्रसिद्ध तथा प्रतिष्ठित बनाने में धन का दान जितना समर्थ है, उतना और कोई पदार्थ नहीं।
दान
दान के लिए वर्तमान ही सबसे उचित समय होता है।
दान
जब आपने किसी वस्तु का दान कर दिया तो फिर वह आपकी रही ही नहीं, तब उस पर आपके नाम की क्या जरूरत है ?
दान
दान हमारे समाज में बनाई गई एक सुन्दर व्यवस्था है, जो आर्थिक स्तर पर असमानता को पाटने में मदद करती है।
दान
जीवन में पहले दिन से कुछ न कुछ दान करने की आदत डालें, अगर आप दस हजार की आमदनी में दान नहीं कर सकते तो दस लाख होने पर भी नहीं कर पायेंगे। गुप्त दान को प्राथमिकता देनी चाहिए।
दान
दान की प्राथमिकता हमेशा हमारे नजदीकी परिजन, मित्र, कर्मचारी के प्रति पहले होनी चाहिए। देश में बहुत मात्रा में लोग आँखों की रोशनी से वंचित हैं।
दान
हर साल हजारों लोगों की मृत्यु जलने से होती है, जिन्हें नई त्वचा लगाकर बचाया जा सकता है। यह बहुत ही दूर-दृष्टि भरा साहसिक निर्णय है।
दान
दान बंधी मुट्ठी, ध्यान बंद दृष्टि करें।
दान
जिस प्रकार स्वाति नक्षत्र में उत्पन्न नीर यदि सीप में जाता है तो वह मोती बन जाता है और सर्प के मुख में जाता है तो विष बन जाता है, उसी प्रकार पात्र-अपात्र में दिया दान भी जानना चाहिए।
दान
हमें जो मिलता है, उससे हमारी जिन्दगी चलती है, जो देते हैं उससे जिन्दगी बनती है। दान देने से पहले अपने कमजोर भाई को सहारा दो क्योंकि भगवान् से ज्यादा आपके भाई को आवश्यकता है। स्वयं जाकर दिया गया दान उत्तम, अपने यहाँ बुलाकर दिया गया दान मध्यम और माँगने पर दिया गया दान अधम व सेवा के बदले दान देना निष्फल है।
दान
पूर्वाभिमुख होकर देना उत्तराभिमुख होकर लेने से दोनों की आयु बढ़ती है।
दान
जिसने कभी दान-पूजा नहीं की वह साधु बनकर भी दुःखी रहता है।
दान
जब हम किसी को कुछ भी देते हैं तो हमारे पास सच्चा और अच्छा है वह देना चाहिए।
दान
जिस मनुष्य ने सर्प की आयु का बंध कर लिया है, तो वह न स्वयं दान देता है और न किसी को दान देने देता है।
दान
यदि कोई दरवाजे पर माँगने आ जाए तो अपना सौभाग्य समझना चाहिए कि उसने आप को इस योग्य समझा।
दान
बिना कुछ दिये कुछ पाने की कोशिश न करें।
दान
एक व्यक्ति दिखने में सुन्दर है, पढ़ा-लिखा और बुद्धिमान है, निरोग है लेकिन दरिद्री है क्योंकि उसने पूर्व में आहारदान नहीं दिया।
दान
एक व्यक्ति जिसके पूर्वज बहुत ही सम्पत्ति छोड़ गये थे और वर्तमान में भी अच्छा व्यवसाय है, निरोग है, पढ़ा-लिखा है लेकिन प्रतिसमय खाते-पीते, सोते-जागते भय बना रहता है क्योंकि उसने पूर्व में अभयदान नहीं दिया।
दान
एक व्यक्ति के पास बहुत पैसा है, लक्ष्मी सम्भाले नहीं सम्भल रही, किसी प्रकार का भय भी नहीं है, वह विद्वान् है लेकिन हमेशा रोगी ही बना रहता है, मूँग की दाल भी नहीं पचती क्योंकि उसने पूर्व में औषधिदान नहीं दिया था।
दान
एक व्यक्ति वैभव सम्पन्न है, निरोग है, पर दिन-रात अध्ययन करने पर भी कुछ याद नहीं होता क्योंकि उसने पूर्व में ज्ञानदान नहीं दिया था।
दान
दानशीलता हृदय का गुण है, हाथों का नहीं।
दान
लेकर देने की अपेक्षा न लेने का बड़ा भारी पुण्य है।
दान
जो दान कर दिया वह सोना है और जो बचा लिया वह मिट्टी है।
दान
दान यदि धर्म की प्रभावना और आत्मा के उत्थान के लिए दिया जाता है तो सम्यग्दर्शन आदि में कारण होता है।
दान
दान देने वाले का उद्देश्य सम्मान प्राप्त करने का नहीं होना चाहिए।
दान
उदार दिलवाला दे देकर धनवान बनता है, लोभी जोड़-जोड़कर निर्धन बनता है।
दान
जो कुछ हम दूसरों को देते हैं, वास्तव में वह सब हम अपने-आपको दे रहे हैं, अगर इस तथ्य को पहचान लिया तो फिर ऐसा कौन होगा जो दूसरों को दान न दे।
दान
दान से सम्पत्ति घटती नहीं, बढ़ती है, अँगूरों की शाखाएँ काटने से और अधिक अँगूर आते हैं। दानी के चरित्र का पता दान की अपेक्षा देने की विधि से अधिक लगता है।
दान
जो देता है वह देवता होता है और जो रखता है वह राक्षस होता है।
दान
यदि आप किसी को कुछ देना चाहते हो तो बस उसका चेहरा मुस्कुराहट से भर दो।
दान
प्राप्त करने की अपेक्षा दान करना कहीं अधिक सौभाग्य का द्योतक है।
दान
माँगने पर देना अच्छा है, लेकिन जरूरत को समझकर बिना माँगे देना और भी अच्छा है।
दान
न्यायपूर्वक उपार्जित हुए धन के दो ही दुरुपयोग समझने चाहिए, अपात्र को देना और सत्पात्र को न देना।
दान
तुम्हारे द्वार पर कोई कुछ माँगने आया और तुमने नहीं दिया बस यही तुम्हारा दुर्भाग्य है।
दान
अतिथियों को आहार दान दिये बिना भोजन करने वाले गृहस्थ को दो पैर वाला बिना सींग-पूँछ का पशु कहा है।
दान
जिसके पास आकर याचक लोग सन्तुष्ट नहीं होते वह गृहस्थ निन्द्य है।
दान
प्रकृति वही लौटाकर देती है जो आप अपनी ओर से औरों को देते हैं।
दान
दूसरे की प्रसन्नता से मिली हुई वस्तु दूध के समान है, माँगकर ली हुई वस्तु पानी के समान है और दूसरे का दिल दुःखाकर ली हुई वस्तु रक्त के समान है।
दान
मनुष्य को अतिथियों और आश्रितों के लिए आहार दान देकर ही भोजन करना चाहिए।
दान
हाथों का सदुपयोग सुपात्रों को दान देने में ही है।
दान
जो भक्ति में तत्पर होता हुआ जिनालय में चंदोबा देता है वह निश्चित ही एक छत्र राज्य प्राप्त कर निर्वाण प्राप्त करता है।
दान
जो मनुष्य पुण्य के हेतु जिनालय में घण्टा देता है वह घण्टा आदि से सहित विमान को प्राप्त कर मुक्ति का वर होता है।
दान
जो मनुष्य मुनियों के लिए ज्ञान दान करता है वह स्वर्ग लोक में सुख भोगकर राज्य एवं केवलज्ञान की विभूति को प्राप्त होता हुआ मोक्ष पाता है।
दान
जो मुनियों के लिए पुण्यकारी पवित्र औषध देता है वह देवलोक में सुख भोगकर कर्म रूपी रोगादिक को नष्ट करता है।
दान
प्राणी मात्र को अभयदान देने से जीव संसार सुख भोगकर निर्भय स्थान मोक्ष को पाता है।
दान
जो मनुष्य अल्प सम्पदा से युक्त होकर भी आत्मशक्ति को प्रकट कर नाना प्रकार का दान करते हैं, वे दानियों में श्रेष्ठ हैं।
दान
यदि निर्धनता सभी अपराधों की माता है, तो बुद्धिहीनता अपराधों का पिता है।
दान
सज्जन लोग रत्न पाकर उतने प्रसन्न नहीं होते हैं, जितने प्रसन्न उस रत्न को किसी निर्लोभ पात्र को देकर होते हैं।
दान