Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Speech

वाणी

450 सूत्र · पृष्ठ 1 / 6

चाहे आप हिम के समान निर्मल और निष्पाप हो जाओ तब भी निंदा से नहीं बच सकते।
वाणी
दूसरों की निंदा और अपनी प्रशंसा करने से नीचगोत्र का बंध होता है और वह बंध दूसरे गुणस्थान तक ही होता है अतः निंदा करने वाला नियम से ही मिथ्यादृष्टि पापी है।
वाणी
मीठे वचनों से स्वागत ही सच्चा अतिथि सत्कार होता है।
वाणी
पर की निंदा करने वाला और स्वयं की निंदा नहीं करने वाला मिथ्यादृष्टि होता है।
वाणी
भाषा और भाव की निर्मलता ही भव से पार करायेगी।
वाणी
वाद-विवाद न करना श्रेष्ठ पुरुषों का लक्षण है।
वाणी
जुबान का वजन बहुत कम होता, लेकिन बहुत कम लोग सम्हाल पाते।
वाणी
सबसे ज्यादा राग-द्वेष की वृद्धि वचनों से होती, आत्मा को चंचल करने का सबसे बड़ा हेतु वचन है।
वाणी
सम्माननीय बनकर जीना चाहते हो तो वाणी संयम रखना आवश्यक है।
वाणी
शब्दों की सीमा है पर स्वभाव की सीमा नहीं है।
वाणी
वाक्शक्ति निःसन्देह एक बड़ा वरदान है क्योंकि वह अन्य वरदानों का अंश नहीं, अपितु स्वतंत्र वरदान है।
वाणी
सन्त लोगों का धर्म है–'अहिंसा' परन्तु योग्य पुरुषों का धर्म है 'परनिन्दा' से परहेज करना।
वाणी
बोलने और प्रश्न करने से पहले सोचें कि परिणाम क्या होगा?
वाणी
वे ही शब्द अनुराग से सुनो जो परिणाम की निर्मलता के लिए आवश्यक है।
वाणी
किसी के सम्बन्ध में किसी को कुछ समाचार आदि कहने में सबके हित का ध्यान रखना मनुष्य जीवन में ऊँचे उठने का एक मन्त्र है।
वाणी
बुद्धिमान वे हैं जो बोलने से पहले सोचते हैं, मूर्ख बोलते पहले सोचते बाद में हैं।
वाणी
किसी को दुबारा बुलाने के लिए 'आना' शब्द का प्रयोग करने के स्थान पर 'आइये' शब्द का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि आना में 'आ' के साथ 'ना' शब्द लगा हुआ है जो नहीं का सूचक है, ऐसे ही 'भोजन करो न' के स्थान पर 'भोजन कीजिए', 'बैठो न' के स्थान पर 'बैठिये' आदि शब्द बोले।
वाणी
कितना भी दुःखद विषय क्यों न हो उसकी चर्चा करते समय कठोर भाषा का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
वाणी
पशु न बोलने से कष्ट उठाता है और मनुष्य बोलने से क्योंकि बोलने की कला नहीं जानता, कहाँ क्या बोलना?
वाणी
समाज का नेता पवित्र जिह्वा वाला और हजारों का पालन पोषण करने वाला होना चाहिए।
वाणी
जो सदाचारी, विनयवान, विवेकवान, विद्वान्, पवित्र, तत्त्वों का ज्ञाता, क्रोध-लोभ रहित, बुद्धिमान, सब दर्शनों-मतों के सारभूतज्ञान का ज्ञाता, संसार से भयभीत है, मर्यादा से युक्त है वही श्रेष्ठ वक्ता है।
वाणी
जो बोलता कम और सुनता ज्यादा है उसका जीवन स्वर्ग बनने से कोई नहीं रोक सकता है।
वाणी
स्त्री की मधुरवाणी से परिवार में स्नेह की सरिता बह निकलती है।
वाणी
अपनों से तो सभी प्रेम से बोलते हैं पर जो परायों से भी अपनेपन से बोले वह संत पुरुषों की भाषा है।
वाणी
हमेशा अपनी वाणी मधुर, कोमल तथा नम्र रखें।
वाणी
माफ करना, धन्यवाद, कृपया ये शब्द जितने अधिक प्रयोग करेंगे जीवन उतना ही आनंदित होगा।
वाणी
बिना पूछे सलाह देने से सब सम्मान समाप्त हो जाता है।
वाणी
मुख से चाहे कोई कितनी ही धर्म-कर्म की बातें करे, पर उसकी चुगल खोर जिह्वा उसके हृदय की नीचता को प्रकट कर ही देती है।
वाणी
यदि तुम दूसरों की चुगली करोगे तो वह तुम्हारे दोषों को खोजकर प्रकट कर देगा।
वाणी
जिनकी दृष्टि विस्तृत है तथा जिनके विचार बड़े-बड़े प्रश्नों के हल करने में लगे रहते हैं, ऐसे लोग विकथा का एक शब्द भी अपने मुख से नहीं निकालते हैं।
वाणी
कुलीन मनुष्य के मुख से यदि फूहड़ और निकम्मी बातें निकलेंगी तो लोग उसके जन्म के विषय तक में शंका करने लगेंगे।
वाणी
हास-परिहास में भी कटुवचन मनुष्य के मन में लग जाते हैं इसलिए सुपात्र पुरुष अपने वैरियों के साथ भी असभ्यता से नहीं बोलते हैं।
वाणी
शीघ्रता में आकर जो तुमने सुना और माना है उसे कहने मत लगो।
वाणी
शीघ्रता में आकर जो तुमने सुना और माना है उसे कहने मत लगो।
वाणी
जो सिर्फ काम की बात करते हैं, वे ही सफल होते हैं।
वाणी
वह गुरु, पिता और मित्र निन्दनीय है जो अपने शिष्य, पुत्र और मित्र के दोषों की निन्दा बहुतों के सामने करता है और उसे नैतिक शिक्षा नहीं देता है।
वाणी
हँसी खतरनाक नहीं, उसके पीछे छुपा व्यंग्य खतरनाक है।
वाणी
द्रौपदी ने हँसी में कहा था—अंधों के अंधे होते हैं परिणाम स्वरूप महाभारत हुआ।
वाणी
हँसकर बोलने से गंभीर बात भी प्रभावशाली नहीं हो पाती है।
वाणी
मजाक चतुराई से किया गया अपमान है।
वाणी
प्रत्येक व्यक्ति की बात सुनो पर किसी से कुछ मत कहो, प्रत्येक व्यक्ति द्वारा निंदा सुन लो पर अपना निर्णय सुरक्षित रखो।
वाणी
मौन प्रार्थनाएँ परमात्मा तक जल्दी पहुँचती हैं क्योंकि वह मुक्त होती हैं, शब्दों के बोझ से।
वाणी
मधुर बोलना कला है मौन रहना महाकला है।
वाणी
आदमी बोलकर ज्यादा फँसता है।
वाणी
मौन आगमन सम्बन्धी विघ्नों को हरने वाला है, मित्रता को करने वाला है, रत्नत्रय का सम्मान करने वाला है, समय पर अज्ञान हरने वाला है।
वाणी
राजा, अधिक विद्वान्, अधिक तपस्वी, बहु संख्या में उपस्थित मूर्ख, शत्रु तथा गुरुओं को उत्तर नहीं देना चाहिए, उनकी भर्त्सना को चुपचाप सुन लेना चाहिए।
वाणी
मौन बुद्धिमान और मित्र बनाता है।
वाणी
मौन आत्मशक्ति के विकास का अच्छा निमित्त है, दूसरों से बोलने में समय बिताने से मुझ एकाकी को क्या मिलेगा?
वाणी
मनुष्य जितना बोलकर अपना काम बिगाड़ता है उतना मौन से कभी नहीं।
वाणी
मौन के वृक्ष पर शान्ति के फल लगते हैं।
वाणी
क्रोध को जीतने में मौन जितना सहायक होता है, उतनी अन्य कोई भी वस्तु नहीं।
वाणी
वाणी का वर्चस्व चाँदी है किन्तु मौन सोना है।
वाणी
ज्ञानियों की सभा में मौन अज्ञानियों का आभूषण है।
वाणी
जो सही जीवन जीता है और सही है; उसके मौन में दूसरे के शब्दों से अधिक शक्ति होती है।
वाणी
मौन समस्त विवादों को समाप्त कर देता है।
वाणी
मौन रहने वाला ही मौज में रह पाता है।
वाणी
यदि आप चुप रहेंगे तो आपको पछताना नहीं पड़ेगा।
वाणी
व्यक्ति भाषा के द्वारा दूसरों से और मौन के माध्यम से स्वयं से संपर्क स्थापित करता है।
वाणी
हमारे पवित्रतम विचारों का मंदिर मौन है।
वाणी
शब्द दूसरों से जोड़ते हैं और मौन स्वयं से जोड़ता है।
वाणी
शब्द संवाद-विसंवाद उत्पन्न करते हैं किन्तु मौन स्वयं का स्वाद उत्पन्न करता है।
वाणी
शब्द हीरे-मोती से भी ज्यादा अमूल्य हैं, आवश्यकता पड़ने पर ही बोलें अन्यथा मौन रहें।
वाणी
जब तुम्हें कषाय की तीव्रता हो, तब तुम मौन ले लो क्योंकि उस समय निकले वचन दूसरों के अहित और क्लेश करने वाले होंगे जिससे तुम्हें पछताना होगा।
वाणी
बोलना आकुलता की जननी है किन्तु मौन परमार्थ का मित्र है।
वाणी
अपने राज दूसरों को बताने से आप बर्बाद हो जायेंगे।
वाणी
अनुभव कहता है खामोशियाँ बेहतर हैं क्योंकि लोग शब्दों से रूठते बहुत हैं।
वाणी
मौन रहने से अथवा सत्यवचन बोलने से वचन सिद्धि होती है।
वाणी
जहाँ विचारों का सम्मान न हो और सत्य अप्रिय लगे वहाँ मौन रहना अच्छा है।
वाणी
मौन से वृद्धावस्था में आनंद एवं सम्मान का जीवन बीतता है।
वाणी
मौर्ख्य के कारण नूपुर पैरों में रखा जाता है और चुप रहने के कारण हार हृदय पर सुशोभित होता है।
वाणी
मौन के फल से इस जन्म में सुखी परभव में नर मोक्ष पाता है नारी पुरुषत्व पाती है। यदि वृद्धों को सुखपूर्वक जीना है अथवा शान्तिपूर्वक मरना है तो मौन रहना चाहिए। मौन और एकान्त आत्मा के सर्वोत्तम मित्र हैं।
वाणी
तिरस्कार दिखाने का सबसे अच्छा ढंग है-मौन।
वाणी
मौन निद्रा के सदृश है, यह ज्ञान में नई स्फूर्ति पैदा करता है।
वाणी
अधिक बोलना मूर्खों का गुण होता है।
वाणी
मूर्ख कभी भी प्रिय नहीं बोलता और स्पष्ट वक्ता कभी धूर्त नहीं होता है।
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