Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Karma

कर्म

370 सूत्र · पृष्ठ 1 / 5

यह जीव पुण्य से स्वर्ग पाता है, पाप से नरक जाता है और पुण्य-पाप दोनों से ममता छोड़कर जो अपने आत्मा का मनन करता है, वह शिवमहल में वास पाता है।
कर्म
किसी को किसी भी धार्मिक कार्य से रोकने पर आपने उसे ही नहीं रोका किन्तु अपने पुण्य आस्रव को रोका है एवं अपने पुण्य के द्वार बन्द किए हैं।
कर्म
जो चीज आपको आपसे दूर ले जा रही हो, वह 'पाप' है और जो चीज आपको आपके पास ला रही हो, वह 'पुण्य' है।
कर्म
'कुकर्म' करते समय मीठे और सुखदायी लगते हैं और कर्मफल भोगते समय दुःखदायी लगते हैं।
कर्म
पुण्य के उदय में रावण और पाप के उदय में राम मुस्कुराते हैं।
कर्म
यदि सचमुच ही तुम दुःख से डरते हो और तुम्हें दुःख अप्रिय है, तो फिर प्रकट या गुप्त किसी भी रूप में पाप कर्म मत करो।
कर्म
एक छेद भी जहाज को डुबा देता है और एक पाप भी पापी को नष्ट कर देता है।
कर्म
विगत में जो किया, उसकी फसल वर्तमान में काट रहे हो, वर्तमान में जो बोओगे, उसकी फसल भविष्य में काटोगे।
कर्म
सब प्रकार का भाग्य संकटपूर्ण होता है। सौभाग्य ईर्ष्या को लाता है और दुर्भाग्य लज्जा को।
कर्म
खोटी भावना से किया गया अच्छा कर्म भी पाप को देने वाला होता है।
कर्म
मन, वचन, कर्म से जो कर रहे हो वही ब्याज सहित वापस मिलने वाला है।
कर्म
पापोदय में हानि नहीं किन्तु पापात्मा हो जाने में आत्मगुणों की हानि है।
कर्म
पापानुबंधी पुण्य नहीं पुण्यानुबंधी पुण्य सुशील है क्योंकि वह मोक्ष का कारण होता है।
कर्म
सबमें न वह योग्यता, मिले न सबको मोक्ष। बीज सीझते सब कहाँ, जैसे ठरा मोठ ॥
कर्म
कभी पुण्योदय से शुभ निमित्त मिलते हैं कभी शुभ निमित्तों से पुण्य की उदीरणा होती है इसी तरह कभी के उदय से अशुभ निमित्त मिलते हैं, कभी अशुभ निमित्तों से पाप की उदीरणा हो जाती है, अतः शुभ निमित्त जुटाना चाहिए।
कर्म
जगत् में केवल रोने वाले ही पापी नहीं है किन्तु हँसने वाले भी पापी समझिए क्योंकि जैसे उनके अरति शोक मोहनीय पाप का उदय है, इनके भी हास्य, रति, मोहनीय पाप का उदय है, पुण्यात्मा तो वे हैं, जिनकी रुचि परमात्मा या निज शुद्धात्मा में है।
कर्म
भगवान् से न डरो तो चलेगा लेकिन कर्मों से जरूर डरो क्योंकि किए हुए कर्मों का फल तो भगवान् को भी भोगना पड़ता है।
कर्म
संक्लेशता की हानि होने पर असाता कर्म साता रूप संक्रमित हो जाता है।
कर्म
अज्ञानी कर्मों से बंधता है और ज्ञानी कर्मों से छूटता है।
कर्म
संसार में सभी प्राणियों को संयोग-वियोग, लाभ-अलाभ, सुख-दुःख तथा मान-अपमान नियम से प्राप्त होते ही हैं।
कर्म
जितना आप पाप करके कर्मों का बंधन नहीं करते उतना कर्त्ता पने से बंध करते हैं।
कर्म
आपको पाप से डर नहीं लगता और पापी कहलाने से डर लगता है, जो पाप से डरते हैं वे मुमुक्षु होते हैं, जो पापी कहलाने से डरते हैं वे मायावी दीर्घ संसारी होते हैं।
कर्म
जिसका यश:कीर्ति नाम कर्म का उदय होता है, उसके नाम को रोकने वाला कोई नहीं है। नव नारायण नव बलभद्र में सिर्फ राम-लक्ष्मण, कृष्ण बलराम का ही नाम प्रसिद्ध है। १२ चक्रवर्तियों में भरत ही प्रसिद्ध हुए, ११ रुद्रों में सिर्फ शिव ही प्रसिद्ध हुए बाकी क्यों नहीं? प्रशंसा मुक्ति नहीं बंधन है।
कर्म
अज्ञान से किए पाप सम्यग्ज्ञान से नष्ट हो जाते हैं, पर ज्ञानी बनकर किए पाप वज्रलेप के समान होते हैं। सातिशय (पुण्यानुबंधी) पुण्य वही जो पुण्य का बंध कराये।
कर्म
सभी को पापों का ज्ञान होता है पर पापों से बचने का ज्ञान सबको नहीं होता है।
कर्म
निकट भव्य जीव को पाप का जो पश्चाताप से शोक होता है वह शोक किसी को नहीं होता है।
कर्म
जो भाग्य में है वह भागकर ही आएगा, जो भाग्य में नहीं वह आकर भी भाग जाएगा।
कर्म
जितनी तीव्रता से पापास्रव किया है उतनी ही विशुद्धि से निर्जरा भी करनी पड़ेगी।
कर्म
मायाचारी से कार्य सिद्धि नहीं होती, पुण्य से होती है।
कर्म
यदि मनुष्य यथा शक्ति धर्म कार्य को करते हुए भी उसमें सफलता न पा सके तो भी उसे उसका पुण्य अवश्य प्राप्त होता है।
कर्म
वस्तु में न बंध है न मोक्ष है, लेकिन पर वस्तु बंध मोक्ष का कारण अवश्य है।
कर्म
बाहरी पापाचरण के त्याग, विशुद्धि के परिणामों की निर्मलता के मुख्य कारण हैं।
कर्म
परिणामों में जितनी विशुद्धि होती है उतना पुण्य होता है।
कर्म
असाता कर्म को साता में बदलने का एक मात्र उपाय वीतराग देव, शास्त्र, गुरु की शरण है।
कर्म
सुख से जीना है तो अपने पुण्य के अनुसार आचरण करो, अन्यथा दुःख मिलना प्रारम्भ हो जायेगा। हीन भावना के कारण संक्लेशता बढ़ती है।
कर्म
जीवन का निर्वाह पिता या गुरु के नाम पर नहीं होता, स्वयं के पुण्य-पाप से होता है, कोई किसी को सुखी-दुःखी नहीं करता, अपितु स्वयं का पुण्य-पाप सुखी-दुःखी करता है।
कर्म
एक छेद भी जहाज को डुबा देता है और एक पाप भी पापी को नष्ट कर देता है।
कर्म
पाप करने वाला मनुष्य अपने पाप को कह देने से, पश्चाताप करने से, तपस्या से, अध्ययन से और आपत्ति काल में दान देने से अपने पाप से मुक्त हो जाता है।
कर्म
अन्य क्षेत्र में किया गया पाप पुण्य क्षेत्र में नष्ट हो जायेगा किन्तु पुण्य क्षेत्र में किया हुआ पाप तो वज्र लेप के समान स्थायी हो जायेगा अर्थात् उसका फल भोगना ही पड़ता है।
कर्म
अत्यन्त उत्कृष्ट पुण्य और पापों का फल तीन वर्षों में, तीन मास में तीन पक्षों में अथवा तीन दिन में यहीं मिल जाता है।
कर्म
सब प्रकार का भाग्य संकटपूर्ण होता है, सौभाग्य ईर्ष्या को लाता है और दुर्भाग्य लज्जा को।
कर्म
जो भारतवर्ष में जन्म लेकर पुण्य कर्मों से विमुख होता है वह अमृत का कलश छोड़कर विष का पात्र अपनाता है।
कर्म
पाप का फल पेड़ा नहीं पीड़ा है।
कर्म
पाप का परिवार-पिता-लोभ, माता-हिंसा, भाई-झूठ, बहन-चिंता, पुत्र-परिग्रह, पुत्री-माया, मूल मुखिया क्रोध है।
कर्म
पाप का बोध परिवर्तन लाता है।
कर्म
आज भूखे पेट वाले ज्यादा पाप नहीं करते बल्कि भरे पेट वाले ज्यादा पाप करते हैं।
कर्म
पाप पहले तो बहुत मजा देता है, फिर जिंदगी भर सजा देता है।
कर्म
छिपकर किया गया पाप जीवन भर काँटे की तरह चुभता रहता है।
कर्म
कषाय करने वाला व्यक्ति अपना पुण्य क्षीण करता है व पाप बाँधता है।
कर्म
जीवन भर कोई व्यक्ति पाप नहीं करता किन्तु क्षण भर का पाप जीवन बर्बाद करता है।
कर्म
पुण्य या पुण्य क्रिया हेय नहीं है, उसके फल में तल्लीन हो जाना हेय है।
कर्म
जिस पुण्य के आवेग में जीव धर्म कार्य को भूल जाये, अहिंसा को भूल जाये, धर्मात्माओं की अवहेलना करने लग जाये, पुण्य क्रिया को भूल जाये वह पुण्य सर्वथा हेय है।
कर्म
अज्ञान से किया पाप सम्यग्ज्ञान से छूट जाता है परन्तु ज्ञान से जानकर किया पाप वज्रलेप हो जाता है।
कर्म
आप उस पाप से बचिए जिसके कारण आप अनजाने भय से घिरे रहते हैं।
कर्म
शुभ कार्य को जल्दी और अशुभ कार्य को देरी से करने वाला सुख पाता है।
कर्म
मात्र पुण्योदय से लाभ नहीं होता है किन्तु पुण्यात्मा बनने में लाभ है।
कर्म
जो दर्शन-ज्ञान-चारित्र का पालन किए बिना दूसरे का भोजन करता है वह अगले भव में पशु के रूप में भार ढोने वाला होता है।
कर्म
स्वयं का पाप स्वयं के लिए घातक है। बहाने बाजी कार्य को पीछे धकेलती है।
कर्म
चक्रवर्ती का बेटा चक्रवर्ती नहीं होता क्योंकि सभी का अपना-अपना पुण्य होता है, अतः आप अपने बेटों की चिन्ता मत करो, वे अपना कर्म साथ में लाये हैं।
कर्म
अपना किया और अपना दिया ही काम आता है, दूसरे का किया और दिया हुआ अपने काम नहीं आता है।
कर्म
चक्रवर्ती का बेटा चक्रवर्ती नहीं होता क्योंकि सभी का अपना-अपना पुण्य होता है, अतः आप अपने बेटों की चिन्ता मत करो, वे अपना कर्म साथ में लाये हैं।
कर्म
जो जिस वस्तु, व्यक्ति आदि का दुरुपयोग करता है, उसको उससे वंचित होने का दुःख भोगना ही पड़ता है।
कर्म
अपने गुरु के प्रति अपने प्रभु के प्रति अपने पति के प्रति यदि अशुभ परिणाम हो रहे हों तो बस समझ लेना कि मेरी खोटी गति का बंध हो गया है व मेरे तीव्र पाप कर्म का उदय चल रहा है।
कर्म
मायाचारी करने वाला मनुष्य मरने के बाद नियम से तिर्यंच गति में उत्पन्न होता है।
कर्म
भवितव्यता जिस पदार्थ को नहीं चाहती, उसे तुम अत्यन्त चेष्टा करने पर भी नहीं रख सकते और जो वस्तुएँ तुम्हारी हैं, तुम्हारे भाग्य में हैं, उन्हें तुम इधर उधर फेंक भी दो, फिर भी वे तुम्हारे पास से नहीं जावेंगी।
कर्म
वर्तमान की परिणति से भविष्य की गति बनती है।
कर्म
दूसरों का बुरा करने वाले का स्वयं बुरा होता है।
कर्म
हर बुराई का अन्त बुरा होता है।
कर्म
लोग साधुओं को छोड़ने पैदल नहीं जाते पर कर्मोदय में या डॉक्टर के कहने पर सब पैदल चलने को मजबूर होते हैं।
कर्म
पीड़ा पाप का परिणाम है।
कर्म
एक पुण्य ही महाबन्धु है, एक पाप ही महाशत्रु है, असंतोष ही बड़ा रोग है और धैर्य ही सब प्रयोजन सिद्ध करने वाला है।
कर्म
पृथ्वी पर अत्यन्त बुद्धिमान मनुष्य तीन में से एक को अवश्य प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं-अल्प आयु वाला या दरिद्र अथवा सन्तान हीन होता है।
कर्म
दूसरों के लिए गड्ढा खोदने से पहले स्वयं उसमें उतरना पड़ता है।
कर्म
डूबता है तो पानी को दोष देता है, गिरता है तो पत्थर को दोष देता है, इंसान भी बड़ा अजीब है कुछ नहीं कर पाता तो किस्मत को दोष देता है।
कर्म
लक्ष्मी उद्योग के अनुसार, कीर्ति दानानुसार, विद्या अभ्यास अनुसार, बुद्धि कर्मानुसार होती है।
कर्म