Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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संगति

452 सूत्र · पृष्ठ 1 / 7

यदि आत्म कल्याण करना है तो बुरी आदत और भीड़ से मुक्त होना होगा।
संगति
संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति
अपने सेवक से बहुत हिलमिल न जाओ, शुरू में यह मेलजोल बड़ा सुखद लगता है किन्तु अंत में तिरस्कार को जन्म देता है।
संगति
जो ज्ञानियों के साथ चलता है वह अवश्य ज्ञानी हो जाता है।
संगति
बुद्धिमान को उत्तम और अधम व्यक्तियों से विरोध नहीं करना चाहिए।
संगति
जो मनुष्य हँसी उड़ाने वालों को शिक्षा देता है वह स्वयं अपमानित होता है। दुर्जनों को चेतावनी देने वाला अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारता है।
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जब एक सम्बन्धी जिसका सम्बन्ध तुमसे टूट गया हो और तुम्हारे पास किसी प्रयोजन के कारण वापस आता है तो तुम उसे सतर्कता के साथ स्वीकार करो।
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गाय घास खाकर दूध देती है और साँप दूध पीकर जहर उगलता है बस सज्जन और दुर्जन में यही अंतर होता है।
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सज्जनों का स्वभाव सूपा जैसा गुण ग्रहण का होता है जबकि दुर्जनों का स्वभाव चलनी जैसा दोष ग्रहण का होता है।
संगति
जो कोई रिश्ते न होने पर भी रिश्ता निभाते हैं, बस दुनिया में वो ही दिल को छू जाते हैं।
संगति
छोटी-छोटी बातें दिल में रखने से बड़े-बड़े रिश्ते कमजोर हो जाते हैं।
संगति
रिश्तों की खूब सूरती एक-दूसरे की बात बर्दाश्त करने में है, खुद जैसे इंसान की तलाश करोगे तो अकेले रह जाओगे।
संगति
माँ-बाप का नहीं किन्तु अच्छे मित्रों का चुनाव तो करना ही चाहिए।
संगति
जो विभिन्न महापुरुषों के चिंतन के साथ रहते हैं वे समझो कि उन्हीं के साथ रहते हैं।
संगति
मूर्खों की तारीफ सुनने की अपेक्षा बुद्धिमानों की डाँट सुनना अच्छा है।
संगति
चिंतारूपी गुप्तरोग से पीड़ित मनुष्य के लिए मित्र उत्कृष्ट औषध है क्योंकि उसके लिए युक्त अयुक्त सब कुछ कह दिया जाता है।
संगति
चिंतारूपी गुप्तरोग से पीड़ित मनुष्य के लिए मित्र उत्कृष्ट औषध है क्योंकि उसके लिए युक्त अयुक्त सब कुछ कह दिया जाता है।
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मूर्ख दोस्तों के साथ बैठकर मुस्कुराने की अपेक्षा सन्त के सामने रोना अच्छा है।
संगति
हँसते हुए लोगों की संगत इत्र की दुकान जैसी है, कुछ न खरीदो फिर भी रूह महका देती है।
संगति
सौ वर्ष जीने के लिए अपने चारों और जवान और हँसमुख मित्रों का समूह रखो।
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ज्यादा से ज्यादा लोगों की सुनें लेकिन बात उन्हीं लोगों से करे जिनकी सोच आपकी सोच से मिलती है।
संगति
मित्रता का सम्बन्ध आँख और हाथ के रिश्ते जैसा है, हाथ को चोट लगती है तो आँख आँसू बहाती है और आँख रोती है तो हाथ आँसू, पोंछते हैं।
संगति
दूर से ही आगे बढ़कर मिलना, हृदय के अनुकूल स्पष्ट अर्थ वाली वाणी और सत्कारपूर्वक कुछ देना-इन तीन बातों से मित्र बनते हैं।
संगति
मनुष्य को अपनी ओर खींचने वाला यदि जगत् में कोई असली चुम्बक है तो वह केवल प्रेम है।
संगति
किसी को अपना दुश्मन मत बनाइये, नहीं तो उसके बीस रिश्तेदार भी आपके दुश्मन बन जाएँगे।
संगति
जीवन एक पुष्प है और प्रेम उसका पराग।
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जीवन के फूल प्रेम की धूप का स्पर्श पाकर ही खिलते हैं।
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यदि आप लोगों का दिल जीतना चाहते हैं तो उनसे उत्साह से मिलें।
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दोषी को दोषी मत समझो अन्यथा सद्भावना का नाश हो जायेगा।
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दोस्ती खुशी को दुगना करके और दुःख को बाँटकर प्रसन्नता बढ़ाती है तथा मुसीबत कम करती है।
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द्वेष बुद्धि को हम द्वेष से नहीं मिटा सकते, प्रेम की शक्ति ही उसे मिटा सकती है।
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वह मित्र निन्द्य है जो अपने मित्र के धन धान्य और कलत्र (स्त्री) की रक्षा करने में विश्वास घात करता है।
संगति
पड़ोसी से दोस्ती रखें, रिश्तेदारी नहीं।
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प्रशंसा वह हथियार है जिससे शत्रु को भी मित्र बनाया जा सकता है।
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तप, दान, व्रत, शील, संयम आदि के धारण करने की ओर जो प्रेरित करे वही तीनों लोकों में परम मित्र है और जो इन कार्यों में विघ्न करता है तथा हिंसा, असंयम और प्रमाद आदि को प्रेरित करता वह परम शत्रु है।
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मित्र को भूलना आसान है किन्तु शत्रु को भूलना कठिन है।
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सच्चे मित्र के सामने दुःख आधा और हर्ष दोगुना प्रतीत होता है।
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मित्र उन्हें बनाओ जो उम्र, धन, धर्म, विचार और व्यवहार में समान हों।
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सबके साथ हिल-मिलकर रहिए, पता नहीं इस दुनिया में कब, कौन, किसके काम आ जाए।
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मित्रों को पारितोषिक देने से भी अच्छा, शीघ्रता के साथ बैरियों को शांत कर लेना चाहिए।
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मित्र वही है, जो आपत्ति ग्रस्त की सहायता करता है और बंधु वह है जो पथ भ्रष्ट की सहायता करता है।
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आलसी, बकवादी, अहंकारी, लोभी, व्यसनी, मूर्ख एवं असन्तोषी से मित्रता न करें।
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उत्सव में, कष्ट आने पर, अकाल में, शत्रु संकट में, राज्यद्वार पर और शमशान तक जो साथ देता है वहीं बंधु है।
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मित्र के तीन लक्षण हैं—अहित से हटाना, हित में लगाना और मुसीबत में साथ न छोड़ना।
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सच्चा मित्र वह है जो दर्पण के समान तुम्हारे दोषों को तुम्हें दर्शाए। जो तुम्हारे दोषों को गुण बताए वह तो चापलूस है।
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मित्रों के बिना कोई भी जीना पसंद नहीं करेगा, चाहे उसके पास शेष सब अच्छी वस्तुएँ क्यों न हों।
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दोस्ती न करो तो चलेगा लेकिन दुश्मनी भूलकर भी न करना।
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मित्रों की संख्या नहीं गुणवत्ता देखो।
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बुरे मित्रों से बचना ठीक है किन्तु अच्छे मित्रों के संग रहना उससे अच्छा है।
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बनाना ही है तो पुल बनाइए, दीवारें खड़ी करेंगे तो अकेले ही रह जायेंगे।
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अगर आप किसी व्यक्ति की उसके सबसे खराब दिनों में मदद करेंगे तो वह जीवन भर के लिए आपका मित्र बन जाएगा।
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मित्रों को एकान्त में ही बुरा कहो, सबके सामने उनकी प्रशंसा करो।
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आपका अपना व्यवहार ही शत्रु-मित्र बनाने का उत्तरदायी है।
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मित्र सैकड़ों भी कम हैं और शत्रु एक भी अधिक है।
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विदेश में विद्या और घर में पत्नी मित्र होती है रोगी का मित्र औषधि और मृतक का पर लोक में मित्र धर्म ही है।
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मिलने पर मित्र का सम्मान करो, पीठ पीछे उसकी प्रशंसा करो और आवश्यकता पड़ने पर उसकी सहायता करो।
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यदि दृढ़ मित्रता चाहते हो तो मित्र से बहस न करो, उससे उधार लेना-देना व उसकी स्त्री से बात करना छोड़ दो।
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जो मित्रता में से आदर निकाल देता है, वह मित्रता का सबसे बड़ा आभूषण उतार देता है।
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विवेकी मित्र ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है।
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मित्र पाने का एक ही मार्ग है—स्वयं किसी का मित्र बन जाना।
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दोस्त बनाने का 'रॉ' मटीरियल है मुस्कान, बिना कुछ खर्च किए केवल प्रसन्नता देकर आप ढेर सारे दोस्त पा लेते हैं जो आपकी जीत के लिए आपको प्रोत्साहन रूपी रसायन देते हैं।
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स्वाभाविक मित्र भाग्य से ही मिलता है इसलिए सच्चे मित्र को कभी नहीं खोना चाहिए, सच्चा मित्र सबसे बड़ा जीवन रक्षक है।
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जिसके दुर्व्यवहार से मन फट गया हो, उसके साथ मैत्री नहीं करनी चाहिए।
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सच्ची मित्रता का अर्थ प्रेम व्यवहार नहीं, अपितु आपसी हितैषी भाव हैं।
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मूर्ख, दुर्जन, चण्डाल और पतित पुरुषों के साथ मैत्री न करें।
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जीवन में मित्रता से बढ़कर कोई बहुमूल्य वस्तु संचित करने योग्य नहीं है।
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जो कहना न माने, वह अपना कैसा? और जो सच हो जाए, वह सपना कैसा ?
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धन हो या न हो किन्तु अच्छे मित्र सदा होना चाहिए।
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शैक्ष्य काल और बाल्यकाल में माता-पिता, दीक्षा में गुरु, पर लोक में धर्म काम आता है किन्तु मित्र सदा सहायक होते हैं।
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सूर्य कहाँ और कमल कहाँ, मेघ कहाँ और प्रमुदित मयूर कहाँ, चन्द्रमा कहाँ और समुद्र वृद्धि कहाँ? ठीक है दूरी के कारण सत्पुरुषों की मित्रता टूटती नहीं है।
संगति
संसार में कोई किसी का शत्रु-मित्र नहीं, जीव के अशुभ भाव शत्रु और शुभ भाव मित्र हैं।
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मधुर वाणी और मधुर व्यवहार से शत्रु भी मित्र बन जाते हैं।
संगति
रिश्ता दिल से होना चाहिए शब्दों से नहीं और नाराजगी शब्दों में होना चाहिए, दिल में नहीं।
संगति
तुम दुनिया में सबसे जीत सकते हो सिवाय उस इंसान के जो आपकी खुशी के लिए जानबूझकर हार जाता है।
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