Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Discernment (Vivek)

विवेक

522 सूत्र · पृष्ठ 1 / 7

प्रकृति ने सूर्योदय, सूर्यास्त, गर्मी, बरसात, ठंड सब का समय निश्चित कर रखा है केवल मनुष्य को ही हर बात की छूट दे रखी है, कब सोना, कब जागना, क्या करना सब कुछ स्वयं मनुष्य के हाथ में है वह सब कुछ करने में स्वतंत्र है।
विवेक
दूसरों के दोषों पर ध्यान देने से स्वयं का मन गंदा होता है।
विवेक
स्वच्छ आँखों के दर्पण से ही स्वच्छ आत्मा के दर्शन सम्भव हैं।
विवेक
कैमरा नहीं, एक्स-रे की मशीन बनो, जिससे प्रत्येक प्राणी में परमात्मा दिखने लगे।
विवेक
अपने दोषों को माफ मत कीजिए और दूसरों के दोषों पर ध्यान मत दीजिए।
विवेक
हम जैसे होते हैं या हमारी दृष्टि जैसी होती है वस्तु प्रायः वैसी दिखती है पर आवश्यक नहीं वस्तु वैसी ही है।
विवेक
अपने कृत्य पर दृष्टि नहीं और दूसरे के कृत्य पर दृष्टि रखना ही सबसे बड़ी अज्ञानता है।
विवेक
उस काम को, जिसे तुम दूसरे व्यक्ति में बुरा समझते हो, स्वयं त्याग दो लेकिन दूसरों पर दोषारोपण न करो।
विवेक
दूसरे की जिन्दगी के बारे में अँगुली उठाना बहुत आसान है स्वयं की तरफ उठाना उतना ही कठिन है।
विवेक
पूजा के लिए स्नान करने से जीवघात होता है, ऐसा जो कहता है वह पसीना आदि मल को दूर करने के लिए स्नान करता हुआ लज्जित क्यों नहीं होता है?
विवेक
अज्ञानी तो बीते हुए को स्वप्न की तरह मानता है, पर ज्ञानी (विवेकी) वर्तमान को स्वप्न की तरह मानता है।
विवेक
संसार के त्याग में ‘विवेक’ काम आता है और भगवान् की प्राप्ति में ‘विश्वास’ काम आता है।
विवेक
जो अहित करने वाली चीज है वह थोड़ी देर के लिए सुंदर बनाने पर भी असुंदर है क्योंकि वह अकल्याणकारी है, सुंदर वही हो सकता है जो कल्याणकारी हो।
विवेक
भोग की इच्छा रोग है और भोग दवा है, रोग पैदा करके दवा करने (दबाने) में रुचि करना विवेकी पुरुष का कर्त्तव्य नहीं है, रोग पैदा ही न हो, इससे बढ़कर स्वास्थ्य नहीं है, अतः तत्त्वज्ञान से इच्छा को दूर करो।
विवेक
शत्रु के भी गुणों को ग्रहण करना चाहिए और गुरु के भी दुर्गुणों का त्याग करना चाहिए।
विवेक
व्यवहार दृष्टि कैमरे जैसी एवं निश्चय दृष्टि एक्स-रे जैसी होती है।
विवेक
पर्याय को दोष मत दो अपने परिणामों को दोष दो, पर्याय तो मटके के समान है उसमें अमृत भरो या जहर विवेक आपका है।
विवेक
स्वयं की बुद्धि सुखकारी, गुरु की बुद्धि विशेष, पर की बुद्धि विनाश कारी और स्त्री बुद्धि प्रपंचकारी होती है अतः अपने ज्ञानी शुभ चिन्तकों की सलाह से काम करें।
विवेक
पानी के छानने की तरह यदि अपने परिणामों को भी छान लें अर्थात् बुरे परिणाम छोड़ अच्छे परिणाम ग्रहण करें तो कल्याण निश्चित है।
विवेक
अपनी हंस दृष्टि रखो, काग दृष्टि नहीं। कौआ मोती में भी मल को देखता है परन्तु हंस पानी में भी क्षीर को देखता है, ऐसे ही भेद विज्ञानी पुरुष मल के पिण्ड में लिप्त होने पर भी भगवान् आत्मा को ही देखता है।
विवेक
संसार में रहो परन्तु संसार अर्थात् राग-द्वेष को अपने अंदर न रहने दो यही विवेक का लक्षण है। विवेक वीरता का श्रेष्ठतर भाग है।
विवेक
किसी वस्तु को स्वीकार और किसी धर्म पर विश्वास उसके गुणों के आधार पर करो। स्वयं उसको परखो जाँचो उसका सूक्ष्म विश्लेषण करो।
विवेक
मानव को बंधन दूर करने के लिए आत्मा और अनात्मा का विवेक करना चाहिए। विवेक से स्वयं को सत्-चित्त-आनंद रूप जानकर आत्मा आनंदित हो जाता है। ''शुद्ध बुद्धि ही कामधेनु है।''
विवेक
यदि बुद्धि जीवी का समाज में कोई प्रकार्य है तो यह कि मानसिक आवेगों को सब प्रकार के प्रलोभन मिलने पर भी ठंडा रखें और पक्षपात रहित निर्णय बनाये रखें।
विवेक
समय कैसा है, मित्र कौन-कौन हैं, देश कैसा है, क्या आमदनी है, क्या खर्च है, मैं कौन हूँ, मेरी शक्ति कितनी है, इन बातों पर मनुष्य को बार-बार विचार करना चाहिए।
विवेक
जब कोई मनुष्य किसी दूसरे के दोषों पर अँगुली उठाता है तो उसे ध्यान रखना चाहिए कि शेष तीन अँगुलियाँ उसी की ओर संकेत कर रही होती हैं।
विवेक
पराधीनता का सुख और अज्ञानी का वैराग्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
विवेक
स्वभाव, रुचि, अभ्यास, संगति, सम्प्रदाय और विवेक बुद्धि ये न्यूनाधिक विकास के कारण हैं क्योंकि सबको ये सब चीजें एक सी हृदयंगम नहीं होती हैं।
विवेक
श्रद्धा का अर्थ अंध विश्वास नहीं है, किसी ग्रन्थ में कुछ लिखा हुआ या किसी व्यक्ति का कुछ कहा हुआ अपने अनुभव बिना सच मानना श्रद्धा नहीं है।
विवेक
यह बुद्धि ही है जो इन्द्रियों को इधर-उधर भटकने से रोकती है उन्हें बुराई से दूर रखती है और शुभ कर्म की ओर प्रेरित करती है।
विवेक
गुप्तचरों और दूतों को चाहिए कि वे साधु-सन्तों का वेश धारण करें और खोजकर सच्चा भेद निकाल लें किन्तु चाहे कुछ भी हो जाए, वे अपना भेद न बतावें।
विवेक
कार्य सिद्धि होने तक अपनी बात गुप्त रखें।
विवेक
जो कार्य प्रज्ञा कर सकती है वह कार्य तलवार नहीं कर सकती है।
विवेक
बुद्धिमान वह नहीं जो बहुत सी बातें जानता है अपितु वह है जो काम की बातें अधिक जानता है।
विवेक
बुद्धिजीवी समस्याओं को हल करते हैं जबकि मेधावी समस्याओं को पैदा ही नहीं होने देते हैं। बुद्धिमान वह है जो बुद्धिमत्ता से ज्यादा खुशी को पसंद करता है।
विवेक
दुष्कर्म करने की अपेक्षा दुष्कृत को स्वीकार करने में अधिक बुद्धिमत्ता है।
विवेक
बुराई से बुराई पैदा होती है इसलिए आग से भी बढ़कर बुराई से डरना चाहिए।
विवेक
किसी वस्तु के दोष का ध्यान न करते हुए विद्वान् उनके गुणों को ग्रहण कर लेते हैं जैसे भौंरा काँटे वाले पौधे का भी उपयोग कर लेता है।
विवेक
वास्तविक विद्वान् वही है जो दूसरों में गुणों को खोजता है एवं अवगुणों को नहीं देखता है।
विवेक
विवेकशील कीचड़ में पड़ें रत्न को भी ग्रहण कर लेते हैं।
विवेक
पराक्रम का प्रमुख अंग विवेक है।
विवेक
विवेकी मनुष्य को पाकर गुण सुंदरता को प्राप्त होते हैं जैसे सोने में जड़ा हुआ रत्न अत्यन्त सुशोभित होता है।
विवेक
उपासना के द्वारा विवेक उत्पन्न होता है विवेकी होने से क्षणिक वस्तुओं में शोक और आनंद दोनों नहीं होते हैं।
विवेक
कोपाग्नि, दुर्भाव, ईर्ष्या और प्रतिशोध विवेक को नष्ट कर देते हैं।
विवेक
न्याय से कमाओ, विवेक से खर्च करो।
विवेक
विवेकहीन व्यक्ति के सारे गुण व्यर्थ हैं।
विवेक
बिना विवेक के वीरता महासागर की लहरों में डोंगी-सी डूब जाती है।
विवेक
किसी भी व्यक्ति को नाराज किए बिना अपनी बात कह देने की काबलियत ही व्यावहारिकता है। अधिक बलवान तो वही होते हैं जिनके पास बुद्धि बल होता है, जिनमें केवल शारीरिक बल होता है उन्हें बलवान नहीं माना जाता है।
विवेक
जिनके ऊपर दोषारोपण करने से योग और क्षेम में बाधा आती हो उन लोगों को देवता की भाँति सदा प्रसन्न रखना चाहिए।
विवेक
श्रेष्ठ घोड़ों को कोड़े की छाया ही काफी होती है, कोड़ा नहीं, कोड़े मारने की जरूरत तो खच्चरों को होती है, घोड़े तो कोड़े की छाया में ही चल पड़ते हैं।
विवेक
यह संसार उन लोगों के लिए सिद्ध है जो अवसर देखकर काम करते हैं।
विवेक
जो बिना कहे समझे वह देवता, जो कहने पर समझे वह मनुष्य, जो कहने पर भी न समझे वह जानवर के समान है।
विवेक
दुनिया आपके अनुसार नहीं चलेगी आपको दुनिया के अनुसार चलना होगा अतः यदि संसार में सुखी रहना है तो समन्वय करना सीख लें।
विवेक
विवेकी पुरुष को अपने मन में यह विचार करना चाहिए कि मैं कहाँ हूँ, कहाँ जाऊँगा? मैं कौन हूँ? यहाँ क्यों आया हूँ? और किसलिए? किसका शोक करूँ?
विवेक
स्वयं को न बदलने वाला कभी आनंदित नहीं हो सकता, सदा संतप्त व दुःखी रहता है तथा वह स्वर्ग में भी नरक निर्मित कर देता है।
विवेक
बल से कम बुद्धि से ज्यादा काम लेने वाला विवेकी माना जाता है।
विवेक
जब सुखी जीव भी अपना सुख और ज्ञान नहीं दे सकते हैं तब जिनके पास सुख नहीं है वे हमें सुखी कैसे कर सकते हैं।
विवेक
कॅरियर निर्धारण में दूरदर्शी सोच, संयम, स्वयं की रुचि, प्रभुता, योग्यता, हुनर हर पहलु का सही मिश्रण होना चाहिए।
विवेक
कोई भी कार्य हो क्रय-विक्रय, किसी तरह की सेवा, घर का कोई कार्य या रिश्ता सभी जगह जरूरत का सही आँकलन अत्यन्त आवश्यक है।
विवेक
मूर्खों की संख्या हमेशा ज्यादा होती है। हमें क्या मूर्खों की परवाह करनी चाहिए या समझदारों का अनुसरण करना चाहिए?
विवेक
प्रश्न ऐसा न पूछें, जिसका कोई उत्तर ही न हो।
विवेक
अधिक लोगों के द्वारा लिया गया निर्णय सभी के लिए सही हो जरूरी नहीं।
विवेक
अगर निर्णय सही है तो आप सफल कहलायेंगे और अगर गलत हुआ तो आप अच्छे मार्गदर्शक बनेंगे, निर्णय उचित समय में लिए जाने चाहिए, विलम्ब करने से विफलता की संभावना अधिक रहती है।
विवेक
सकरी गली से आते हुए साँड को देखकर राजा का स्वामित्व जताये बिना रास्ता छोड़
विवेक
नकल करना है तो फिल्म एक्टर की चेष्टाओं की नहीं मूल नायक की करो।
विवेक
'ओल्ड इज गोल्ड' यह नियम हर जगह लागू नहीं होता, जिस दवा की डेट निकल गयी है, वह अभक्ष्य है, हर पुराना विचार सही हो जरूरी नहीं है।
विवेक
देव-अदेव, पात्र-अपात्र, शुभ-अशुभ, गुण-अवगुण और शास्त्र आदि के विषय में जो विचार है वह विवेक कहलाता है, विवेक के बिना सब व्यर्थ है।
विवेक
चमकते काँच के पीछे कहीं मूल्यवान रत्नों को न्यौछावर तो नहीं कर रहे हो ?
विवेक
ईर्ष्या, लोभ, काम, क्रोध आदि का कोई भी वेग हो, आप उस वेग में तात्कालिक कोई भी निर्णय मत लेना क्योंकि आवेग में विवेक खो जाता है और आवेग में लिया गया निर्णय कभी भी यथार्थ नहीं होता। कार्य दिख रहा है कारण खोजो।
विवेक
किसी भी रोते या मुस्कुराते को देखकर प्रभावित मत होना क्योंकि ज्ञानी कार्य को नहीं कारण को देखता है, अश्रुपात देखकर न्यायालय में न्याय नहीं दिया जाता, हेतु देखकर न्याय दिया जाता है, अश्रु देखकर निर्णय मत करना, चेहरा और भाव भी देखना जरूरी है।
विवेक
जहाँ बुद्धि के प्रयोग की आवश्यकता है वहाँ बल का प्रयोग करना व्यर्थ है।
विवेक
बुद्धि क्षीण होने लग जाये तो भी विवेक को क्षीण मत होने देना।
विवेक
बुद्धिमान व्यक्ति धन के नाश को, मनस्ताप को, पत्नी के दोषों को प्रकट न करें।
विवेक
बुद्धिमान को उपाय के साथ-साथ कार्य की हानि को भी सोच लेना चाहिए।
विवेक
अन्दर जब विषय कषाय की आँधी चलती है तब विवेक की आँख बन्द हो जाती है।
विवेक