ग्रामो नास्ति कुतः सीमा, भार्या नास्ति कुतः सुतः। प्रज्ञा नास्ति कुतो विद्या, धर्मो नास्ति कुतः सुखं।।
जहाँ ग्राम ही नहीं है तो उसकी सीमा कहाँ से होगी, स्त्री ही नहीं है तो पुत्र कहाँ से होगा, बुद्धि ही नहीं है तो विद्या कहाँ से होगी और धर्म ही नहीं है तो सुख कहाँ से प्राप्त होगा?
Where there is no village, whence its boundary? Where there is no wife, whence a son? Where there is no intellect, whence learning? And where there is no dharma, whence happiness?
— आराध्य सूत्र · कण्ठाभरण श्लोक · #12
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