Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Self-control

संयम

447 सूत्र · पृष्ठ 1 / 6

आत्म रक्षा में कभी भी आलस्य या असावधानी नहीं करना चाहिए।
संयम
इन्द्रियाँ स्विच और मन मैन स्विच है, अतः इन्द्रियों को नहीं मन को जीतो।
संयम
इन्द्रियों को काबू में रखने की एक ही युक्ति है–उनसे प्रतिकूल काम करते रहना।
संयम
जो मनुष्य अपनी इन्द्रियों को वश में रखता है, वह देवों के द्वारा भी वंदनीय है।
संयम
मनुष्य का शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है और इन्द्रियाँ इसके घोड़े हैं। इसको वश में करके साधना करने वाला चतुर एवं धीर पुरुष काबू में किए हुए घोड़ों से सारथी की भाँति सुखपूर्वक यात्रा करता है।
संयम
इन्द्रियाँ वश में न होने के कारण अर्थ को अनर्थ और अनर्थ को अर्थ समझकर अज्ञानी पुरुष बहुत बड़े सुख से हाथ धो बैठता है।
संयम
जो अधिक धन का स्वामी होकर भी इन्द्रियों पर अधिकार नहीं रखता वह इन्द्रियों को वश में न रखने के कारण ही ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है।
संयम
वास्तव में मूल चीज 'मानसिक नियंत्रण' है।
संयम
सब नियंत्रणों से बढ़कर 'आत्म नियंत्रण' श्रेष्ठ होता है।
संयम
मारना चाहते हो तो बुरी इच्छाओं को मारो, जीतना चाहते हो तो तृष्णाओं को जीतो, खाना चाहते हो तो गुस्से को खाओ, लेना चाहते हो तो प्रभु का नाम लो, बोलना चाहते हो तो मीठे वचन बोलो, छोड़ना चाहते हो तो पाप और अत्याचार को छोड़ो, पहनना चाहते हो तो नेकी का जामा पहनो, देखना चाहते हो तो अपने दुर्गुण देखो कल्याण हो जाएगा।
संयम
सुख चाहते हो तो रात में खाना नहीं, शान्ति चाहते हो तो दिन में सोना नहीं, सम्मान चाहते हो तो व्यर्थ में बोलना नहीं और निर्वाण चाहते हो तो धर्म को छोड़ना नहीं।
संयम
संसार में सबसे शक्तिशाली वही है जो आत्म निर्भर स्वाधीन है।
संयम
शरीर–बल से प्राप्त सत्ता मानव देह की तरह क्षणभंगुर रहेगी जबकि आत्मबल से प्राप्त सत्ता आत्मा की तरह अजर और अमर रहेगी।
संयम
जो सुखदायी परिस्थिति में दूसरों की सेवा करता है तथा दुःखदायी परिस्थिति में दुःखी नहीं होता अर्थात् सुख की इच्छा नहीं करता वह संसार-बन्धन से सुगमता पूर्वक मुक्त हो जाता है।
संयम
स्वतंत्र वही हो सकता है जो अपना काम स्वयं कर लेता है।
संयम
सम्पत्ति से नहीं स्वतंत्रता से व्यक्ति सम्राट् बनता है।
संयम
निज स्वतंत्रता में स्वर्ग और परतंत्रता में नरक है।
संयम
देश तो स्वतंत्र हो गया पर देह अभी परतंत्र है।
संयम
किसी की मेहरबानी माँगना अपनी आजादी बेचना है।
संयम
स्वाद और स्वार्थ की चाह ही जीवन को तबाह करती है। स्वाद आदमी के स्वास्थ्य को बिगाड़ता है और स्वार्थ परमार्थ को बिगाड़ता है। स्वाद की अग्नि आदमी के तन को जलाती है और स्वार्थ की अग्नि आदमी के मन को जलाती है।
संयम
दूसरों को अपने अनुकूल करने में या दूसरों के अपने अनुकूल होने में क्या भलाई है? अरे! अपने को अपने वश में कर लो तो सर्वसिद्धि है।
संयम
गृहस्थों के चक्र में न पड़ना तथा निरपेक्ष त्यागी रहना, पत्थर पर सोना पर चटाई न माँगना, लँगोटी न मिले तो द्रव्य मुनि ही बन जाना, पर लगोटी न माँगना, सूखी रोटी मिल जावे तो खा लेना, पर घी की इच्छा न करना आदि, आत्म निर्मलता में ही तुम्हारा कल्याण है।
संयम
आत्म शान्ति के लिए परिचय, उपकार, कषाय, विषयाभिलाषा छोड़ना होगी।
संयम
त्याग में पराधीनता नहीं सामाजिक बातों में बहुत पराधीनता है।
संयम
‘‘सुख पर में और पराधीनता में नहीं निज में और निजाधीनता में है’’ अतः ज्ञायक बनो।
संयम
स्वाधीन कार्य शान्ति में अधिक सहायक है, सत्समागम व सेवा पराधीन है, स्वाध्याय बहुशः स्वाधीन है। ‘‘जो विषय-कषाय में बंधा है वह पराधीन है।’’
संयम
विषयों और प्रतिष्ठा में बुद्धि का न फँसना ही स्वतंत्रता है स्वतंत्र व्यक्ति ही तत्त्वतः सुखी होता है, निर्विकल्प आत्मा का अनुभव ही तुम्हारा कष्ट हरेगा।
संयम
न किसी के अभाव में जियो न किसी के प्रभाव में जियो ये जिन्दगी है आपकी, अपने स्वभाव में जियो।
संयम
माध्यस्थ भाव कषायों से बचने के लिए होता है।
संयम
अपना हित चाहते हो तो कषाय भाव से निज की रक्षा करो।
संयम
पुण्य के अभाव में असंयम का आगमन शीघ्रता से होता है।
संयम
लोकोत्तर आचार छोड़ जो लोकाचार को अपनाता है उसका निर्जरा का कारण संयम नष्ट हो जाता है।
संयम
पाँच व्रतों को संयम माना है। शौच, तप, सन्तोष, स्वाध्याय और देव का स्मरण इन पाँच को नियम माना। करण आसन को कहते हैं, श्वासोच्छ्वास की स्थिरता प्राणायाम है तथा विषयों से इन्द्रियों की निवृत्ति करना प्रत्याहार है, संसार की असारता का चिंतन समाधि है और चिंतन में मन का लगना धारणा और मन का स्थिर हो जाना ध्यान है। ये ८ प्रकार का योग मुक्ति के लिए कारण है।
संयम
व्रत का अर्थ है आत्म शोधन के निमित्त किए गये बुद्धि संगत उपायों को दृढ़तापूर्वक अपनाए रहना।
संयम
जिसके हृदय में सदा निर्मलता होती है, उसे व्रती कहते हैं।
संयम
जो नियम से नहीं बँधना चाहता, तो समझना कि वह नरक से बँध चुका है। कहता है रात्रि में नहीं खाते, पर नियम लेकर नहीं बँधेंगे।
संयम
सिद्धालय में बैठने वाला मन व इन्द्रियों को वश में न करने के कारण संसार में भटक रहा है। वन्दनीय की वंदना किए बिना स्वयं वंदनीय नहीं हो सकते।
संयम
ज्ञान, संयम, तप तभी तक हैं जब-तक विषय विष का सेवन नहीं किया है।
संयम
स्वयं पर अनुशासन करने वाला तीन लोक पर शासन करता है।
संयम
जब आप स्वयं को नहीं बदल सकते, तो दूसरे को बदलने का प्रयास सार्थक नहीं होगा।
संयम
अशुभ से निवृत्ति शुभ में प्रवृत्ति का नाम संयम है।
संयम
वैराग्य और ज्ञान के अभाव में संयम निधि लुट जाती है।
संयम
जिसे संयम में आनंद आने लगता है, उसे सुलभ से सुलभ इन्द्रिय भोग रुचिकर नहीं लगते हैं।
संयम
संयम जीवन रूपी गाड़ी का ब्रेक है।
संयम
सबसे सरल संयम यह है कि दूसरों के बारे में अशुभ सोचना छोड़ दो।
संयम
संयम का अर्थ पराधीनता नहीं स्वयं का स्वयं पर अनुशासन है, जिसने स्वयं पर शासन नहीं किया वह दूसरे पर शासन कैसे कर सकता है, यदि करता है तो हँसी का पात्र होता है।
संयम
संयम से ज्ञान के क्षयोपशम में वृद्धि होती है।
संयम
जो विषमता के आने पर समता की छतरी ओढ़ लेता है वह कर्मों के जल से भीग नहीं पाता है।
संयम
संसार कषायों को कृश करने से समाप्त होता है।
संयम
साधक की दृष्टि प्रतिक्षण कषायों को घटाने की रहती है।
संयम
आत्मसिद्धि के लिए कम बोलो, कम देखो और कम सुनो।
संयम
द्रव्य शुद्धि के बिना भावशुद्धि नहीं होती, कषायों के अभाव में भावशुद्धि होती है।
संयम
जिसने अपने आप को जीत लिया वह अपने आपका बंधु है और जिसने अपने आपको नहीं जीता वह अपने आप का शत्रु है।
संयम
महासागर पत्थर फेंकने से चंचल नहीं होता है उसी प्रकार जो साधक खिन्न हो जाये वह अभी थोड़े पानी में है।
संयम
जिस इन्द्रिय को संयमित करोगे उसमें ऋद्धि उत्पन्न हो जायेगी।
संयम
जो व्यक्ति युवावस्था में शान्त है, वही वास्तव में शान्त है। धातुओं के क्षीण हो जाने पर कौन शान्त नहीं हो जाता है ?
संयम
इच्छा पूर्ति में नहीं अपितु संयम में शान्ति मिलती है।
संयम
इन्द्रिय संयम न रखना आपत्तियों का मार्ग है और इन्द्रिय विजय सुखों का मार्ग है। दोनों में जो इष्ट हो वह करना चाहिए।
संयम
अपने कल्याण के इच्छुक व्यक्ति को स्वेच्छाचारी नहीं होना चाहिए।
संयम
जिसने इन्द्रिय समूह को वश में कर लिया है, वह मनुष्य जहाँ निवास करता है वही तीर्थ बन जाता है।
संयम
मान को त्याग कर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोध को त्याग कर शोक नहीं करता है, काम को त्याग कर अर्थवान होता है, लोभ को त्याग कर सुखी होता है।
संयम
जिन लोगों ने इन्द्रियों के समस्त भोगों को त्याग दिया है और जो तपस्वी जीवन व्यतीत करते हैं, धर्म शास्त्र उनकी महिमा को अन्य समस्त बातों से अधिक उत्कृष्ट बताते हैं।
संयम
बुद्धिमान व्यक्ति वासना को शान्ति से वश में करता है, द्वेष तिरस्कार को प्रेम से जीतता है और अपकार के बदले में उपकार करता है।
संयम
मन के विकार में हम मददगार न हों तो आखिर हमारी जीत ही है।
संयम
जिस प्रकार स्विच ऑन करने पर लोहे के तारों में तुरन्त विद्युत प्रवाहित होने लगती है उसी प्रकार हमारे जीवन में वासनाओं की स्थिति है। भोगसम्बन्धी चर्चा, वार्ता, क्रिया, स्मरण, दर्शन, चिन्तन आदि से वासनाएँ सक्रिय हो जाती हैं।
संयम
सुख प्राप्ति की इच्छा रखने वालों को संयम का जीवन व्यतीत करना चाहिए।
संयम
संयम के चार रूप हैं–मन का संयम, वचन का संयम, देह का संयम और उपाधि सामग्री का संयम।
संयम
जो अपने ऊपर शासन नहीं करेगा वह सदैव दूसरों का सेवक रहेगा।
संयम
सर्व शक्तिमान वही है जो आत्म संयमी है।
संयम
असंयमी व्यक्ति जानवरों से भी गया बीता है। जानवर भी भोजन और वासनापूर्ति में कुछ संयम रखते हैं किन्तु इंसान बुद्धिमान होकर भी आहार-विहार में बड़े असंयमी होते हैं जिससे वे बीमार पड़ते हैं, संयम एक ऐसा अंकुश है जो हमें विवेक और सत्य के पथ पर आरूढ़ रखता है।
संयम
सब संयम का मूल 'जुबान और जननेन्द्रिय' को नियंत्रण में रखना है।
संयम
आत्म संयम की रक्षा अपने खजाने के समान ही करो क्योंकि उससे बढ़कर इस जीवन में और कोई निधि नहीं है।
संयम
उसी की बुद्धि ठीक अथवा स्थिर रह सकती है, जिसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हों। भोग भोगने से नहीं रोकने से शान्त होते हैं।
संयम
जितना भोग करना बुरा नहीं है, उतना वर्जित भोग का चिन्तन करना बुरा है।
संयम
व्रत से विकास व वासना से विनाश होता है।
संयम