Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Knowledge & Wisdom

ज्ञान

800 सूत्र · पृष्ठ 1 / 11

निरन्तर अध्ययन से ही ज्ञान प्राप्त होता है।
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मस्तिष्क के लिए अध्ययन की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी शरीर को व्यायाम की।
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प्रकृति की अपेक्षा अध्ययन के द्वारा अधिक व्यक्ति महान् बने हैं।
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अध्ययन हमें आनंद प्रदान करता है, अलंकृत करता है और योग्यता प्रदान करता है।
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आत्म कल्याण के लिए सरस्वती से श्रेष्ठतर कोई वैद्य नहीं और उसकी साधना से बढ़कर कोई औषधि नहीं।
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स्वयं को जाने बिना, संसार का सब कुछ जानना अन्ततः घातक ही है।
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जीवन सफल करने के लिए पहले खोजिए 'मैं कौन हूँ?'
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देह की उपयोगिता तो है किन्तु देह ही अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता, समूचे व्यक्तित्व का विकास करना है तो देह के साथ आत्मा को भी जानना होगा।
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एकाग्र चित्त से पञ्च नमस्कार का जाप करना अथवा जिनेन्द्रोक्त शास्त्र का पढ़ना दोनों परम स्वाध्याय हैं।
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हम हर बार शरीर का परिचय लेते रहे, पर शरीर ने हर बार धोखा दिया, यदि हम एक बार भी आत्मा का परिचय ले लेते तो वह हमें शाश्वत धाम तक पहुँचा देता।
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जैसे दूध में घी छिपा होता है वैसे ही शरीर में आत्मा छिपी होती है।
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वास्तव में मनुष्य जन्म ही सब जन्मों का आदि तथा अन्तिम जन्म है, यदि मनुष्य परमात्म प्राप्ति कर ले तो अन्तिम जन्म भी यही है और परमात्म प्राप्ति न करे तो अनन्त जन्मों का आदि जन्म भी यही है।
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मनुष्य पर्याय मौज-मस्ती करने को नहीं मोक्ष प्राप्ति को मिली है।
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सज्जनों को अपने रूप की नहीं अपने स्वरूप की चिन्ता करनी चाहिए क्योंकि रूप तो नश्वर है किन्तु स्वरूप शाश्वत है।
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मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य अपने में देवत्व को पहचानकर उसे प्राप्त करना है।
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विज्ञान सुविधा देता है समाधि नहीं, समृद्धि देता है शान्ति नहीं, साधन देता है साधना नहीं।
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विज्ञान की आँख पदार्थ को तो देख सकती है किन्तु परमात्मा को नहीं, परमात्मा को देखने के लिए अध्यात्म की आँख चाहिए।
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शुद्ध आत्मा की प्राप्ति ही सच्ची सम्पत्ति है।
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स्वभाव केवल आच्छादित ही हो सकता है, विनष्ट नहीं हो सकता है।
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जीव का स्वभाव सिर्फ देखना-जानना है।
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जो मनुष्य प्रायश्चित्त, आयुर्वेद, ज्योतिष और धर्म निर्णय की बात शास्त्र के बिना कहता है उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।
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सोचना भूल है कि निरन्तर ज्ञानोपयोग नहीं रह सकता, रह सकता है, इतना जरूर है कि कभी कभी कम कभी ज्यादा।
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तुम कुछ बाह्य उपक्रम मत करो, बस इतना ही तो होगा की कोई तुम्हें जानेगा नहीं। सो परिचय उपक्रम में भी कोई तुम्हें जानता नहीं है बाह्य शरीर से परिचय हो जाने पर भी तुम्हें कुछ मिलता नहीं अथवा मिलता है तो विकल्पों का क्लेश/जानने वाले भी विनाशीक है, न जाना तो क्या? तुम तो तुम ही हो अपने में लीन होओ और अनंत सुखी होओ।
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व्यवहार यद्यपि निश्चय नहीं हैं तो भी व्यवहार के होते हुए ही निश्चय मिलता हैं, जैसे दूध से घी आदि प्राप्त होते हैं।
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सुवर्ण के आभूषण का उपादान सोना ही है, परन्तु ढाँचे में ढलने का निमित्त पाये बिना आभूषण नहीं बनता है उसी प्रकार व्यवहार के बिना निश्चय प्राप्त नहीं होता।
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तत्त्वदर्शी बनकर स्व-पर कल्याण में तत्पर रहना ही मनुष्य जन्म का सार है।
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हे देव! मुझे अनंत दर्शन नहीं आत्म दर्शन की चाह है। धन, वैभव और कीर्ति आदि से अपने को बड़ा मत समझो, वे तो पर वस्तु हैं, अपने को बड़ा समझो अपनी वस्तु अर्थात् दर्शन, ज्ञान और चारित्र की स्वच्छता या वृद्धि से।
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शास्त्र सभा में जो शब्द निकलते हैं, वैसे शब्द यदि एकान्त में अपने लिए निकल जायें तब तो ज्ञानी है अन्यथा ग्रामोफोन है।
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ज्ञान से बड़ा आनंद संसार में अन्य कोई नहीं है। ‘‘खुशी पर से मिलती है, आनंद निज से प्राप्त होता है।’’
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परिणामों की विशुद्धि केवल मंत्र जाप से नहीं, स्वाध्याय से भी होती है।
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अध्यात्म शास्त्र यानि गूढ़ विद्या, रहस्यमयी ज्ञान, आत्म बोध, भेदविज्ञान वह है जिसके सुनते ही भाव बदल जाये, आचरण में आते ही रहन-सहन बदल जाये।
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ज्ञान एंटीना के समान है चारित्र टेलीविजन के समान है एंटीना तरंगें पकड़ता है, टेलीविजन चित्र दिखाता है। ऐसे ही जिनवाणी की तरंगों को पकड़ना ज्ञान का विषय है, परन्तु जिनवाणी में प्रसारित वर्गणाओं का दृश्य चारित्र ही प्रकट करता है।
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ज्ञान से सम्मान मिलता है, सेवा से प्रशंसा प्राप्त होती है, चारित्र से पूज्यता प्राप्त होती है।
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कलिकाल में मन को वश में करने का उपाय शास्त्र का अध्ययन ही है।
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विद्या सभी का भूषण है।
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आगमज्ञान के अभाव में तत्त्वोपदेश नहीं करना चाहिए।
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बिना ज्ञान के विशुद्धि नहीं आती और बिना विशुद्धि के चरित्र नहीं पलता है।
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स्वाध्याय ही प्रगति का द्वार है।
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जिससे तत्त्व का बोध हो, चित्त का निरोध हो, आत्मा का शोध हो, हित की प्राप्ति अहित का निषेध भी हो उसको जिनशासन में सम्यग्ज्ञान कहा है।
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आगम के अनुसार चल न पाना कमजोरी है पर बोल भी न पाना अच्छा नहीं है।
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जब इन्द्रियों के भोग शान्त होने लगते हैं तब ज्ञान का सुख प्रारम्भ होता है।
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जिनवाणी विराजमान करने वाली चौकी पर बैठने से ज्ञानावरणीय कर्म का बंध होता है क्योंकि वह चौकी शास्त्र पीठ है, उसकी असादना जिनवाणी की असादना है।
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शिष्ट शिक्षा ही शिष्य को विशिष्ट बनाती है।
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विद्वत्ता, विद्या और विद्वान् की कद्र विद्वान् ही करते हैं मूर्खों के बीच विद्वान् की दशा वैसी ही होती है जैसे अंधों के बीच किसी सुन्दरी की और नास्तिकों के बीच किसी धर्म ग्रन्थ की होती है। पुस्तकों के ज्ञान में तुम चतुर हो, फिर भी तुम्हें चाहिए कि तुम अनुभव जन्य ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुसार व्यवहार करो।
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बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी अपने वर्तमान दुःखों के लिए रोया नहीं करते हैं, अपितु वर्तमान में दुःख के कारण पापों को रोका करते हैं।
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इस शरीर में रहते हुए ही हम आत्मा को जान लेते हैं तो ठीक है, यदि उसे नहीं जाना तो बड़ी हानि है जो उसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं।
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स्वयं को ज्ञान और विनय से नित्य शुद्ध करें, ऐसा करने पर मरण होने पर पश्चाताप नहीं होगा।
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ज्ञान रहित योग से भी मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता है, अतः मुमुक्षु को ज्ञान व योग दोनों का दृढ़ अभ्यास करना चाहिए।
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जैसे बसंत ऋतु में वृक्षों की सुन्दरता तथा शोभा आदि गुण बढ़ जाते हैं, वैसे ही तत्त्व को जान लेने वाले मनुष्य में बल, बुद्धि और तेज आदि गुण बढ़ जाते हैं।
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जो दूसरों को जानता है, वह विद्वान् है और जो स्वयं को जानता है वह बुद्धिमान है।
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विद्या लाभ विद्यालय के ऊपर नहीं, बल्कि मुख्यतः छात्र के ऊपर निर्भर करता है।
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अशुद्ध हृदय लेकर अपनी पुस्तकों या अपने शिक्षकों के पास मत जाइए शुद्ध हृदय लेकर उनके पास जाइए, तभी आपको जो कुछ आप चाहते हैं वह प्राप्त होगा।
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अनुभव बीस वर्ष में सिखाता है, विद्वत्ता एक वर्ष में उससे अधिक सिखा देती है।
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अभीष्ट फल की प्राप्ति हो या न हो विद्वान् पुरुष उसके लिए शोक नहीं करता है।
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विद्वान् की संसार में प्रशंसा होती है, विद्वान् सारे भूमंडल का गौरव है, विद्या से सभी कुछ मिल जाता है और विद्या की सभी जगह पूजा होती है।
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बुद्धिमान, प्रज्ञावान, बहुश्रुत तथा बहुत बातों का विचार करने वाले रोते नहीं हैं, आदमियों का यही परम शरण स्थान है कि पण्डित शोक को जीत लेते हैं।
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विद्वानों का मनोरंजन करने वाली शास्त्र ज्ञान गरिमा मूर्खों का मनोरंजन नहीं कर सकती, मोतियों में छेद करने वाली सलाई पाषाणों के छेदन में काम नहीं आ सकती है।
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महान् लोग खेल में भी ऐसा शब्द नहीं कहते कि जिससे चैतन्य शील व्यक्ति उपदेश न ले सकें लेकिन बुद्धिमत्ता के सौ अध्याय भी नादान के सामने पढ़ें तो उनके कानों को खेल ही लगते हैं।
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जो व्यक्ति मूर्खों के सामने विद्वान् लगने की कामना करते हैं, वे विद्वानों के सामने मूर्ख लगते हैं।
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सब जगह पुरुष ही पंडित नहीं होता, जिस-तिस विषय में विचक्षण स्त्रियाँ भी पंडिता होती हैं।
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ज्ञानी श्मशान में रहकर भी सिद्धों की बस्ती का जीवन जीता है और अज्ञानी बस्ती में रहकर भी गिद्धों की आसक्ति का जीवन जीता है।
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प्रतिभावान वह है जिसमें समझदारी व कार्यशक्ति विशेष है।
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रात-रात भर प्रार्थना करने की अपेक्षा एक घंटा भी दूसरों को ज्ञान देने में खर्च करना ज्यादा अच्छा है। ज्ञानवान् को जगत् में कोई झंझट नहीं रह जाती है।
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यदि किसी वस्तु की आवश्यकता है तो वह है व्यावहारिक ज्ञान की।
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जिसके पास ज्ञान है वही सच्चा धनवान है।
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ज्ञानी पद ग्रहण करते समय रोता है और अज्ञानी पद ग्रहण करते समय हँसता है क्योंकि पद आपद का आस्पद (स्थान) है।
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जन्म के बाद मृत्यु, उत्थान के बाद पतन, संयोग के बाद वियोग, संचय के बाद क्षय निश्चित है। यह समझ कर ज्ञानी हर्ष व शोक के वशीभूत नहीं होते हैं।
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ज्ञानी वह है जो वर्तमान को ठीक से पढ़ सके और परिस्थिति के अनुसार चल सके।
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ज्ञानी प्रशंसा से फूलते नहीं हैं और निंदा से कूलते नहीं हैं।
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स्थितियाँ गतिशील हैं उन्हें लेकर चिन्तित होना ज्ञानी को शोभा नहीं देता है।
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भूल मालूम होते ही उसे तुरन्त सुधारना ही ज्ञानी का लक्षण है।
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दो ज्ञानियों के मिलने से रहस्य खुलते हैं और दो अज्ञानी के मिलने से विसंवाद के द्वार खुलते हैं।
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कमाते हैं सिर से पर सिर को भोजन कराने अर्थात् स्वाध्याय की कभी सोचते ही नहीं है।
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बुद्धिमान लोगों के सामने उपदेशपूर्ण व्याख्यान देना जीवित पौधों को पानी देने के समान है।
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जिसका जन्म गुरु सेवा में, मन समीचीन ध्यान की चिन्ता में और धन का उपयोग सत्पात्र दान में जाता है वह पंडित है।
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