जैसे कुश्ती लड़ने से बल बढ़ता है वैसे ही परिस्थितियों से लड़ने से अर्थात् शान्ति से आत्मबल बढ़ता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
किसी भी कार्य को तन-मन-धन और सर्वस्व लगाकर भी किया हो तब भी वह पर है, उसे छोड़ना ही होगा, आत्म स्वरूप में उपयोग रमाये बिना असन्तोष नष्ट न होगा अतः जो मार्ग जान चुके हो, उस पर प्रवृत्ति करने में विलम्ब मत करो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
पत्थर पर कितनी टाँकियों की चोट लगती है, यदि टाँकियों की चोट सहले तो पूज्य मूर्ति बन जाती है यदि टाँकी की चोट न सह सके और भग्न हो जावे तो वह पत्थर भी किसी काम का नहीं रहता इसी प्रकार नाना विपदाओं का सहन हो जावे तो आत्मा महात्मा बन जाता है, यदि न सह सके तो संसारी बन जाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
भगवान् भवातीत बनने का उपदेश तो दे सकते हैं, भवातीत बना नहीं सकते हैं, बनना स्वयं को पड़ेगा। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अगर आप को ३३ करोड़ देवी-देवताओं पर भरोसा है लेकिन स्वयं पर नहीं तो आपको मुक्ति नहीं मिल सकती है अतः स्वयं पर भरोसा रखें, अडिग रहें और मजबूत बनें। पुरुषार्थ 0 – भेजें
असावधानी विनाश को शीघ्र बुलाती है। सावधान रहो, जीवन महल के किसी भी दरवाजे से काम-क्रोध रूपी किसी भी चोर को अन्दर न घुसने दो और सावधानी के साथ जो पहले से घुसे बैठे हों, उन्हें दृढ़ता और शूरता के साथ निकालने की प्राणपन से चेष्टा करते रहो, सावधानी ही साधना है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
प्रमाद से बढ़कर इस संसार में मनुष्यों के लिए दूसरी कोई मृत्यु नहीं। प्रमादी मनुष्य को सारे अर्थ सब ओर से त्याग देते हैं और अनर्थ बिना बुलाये ही उसके पास चले आते हैं और ध्यान रहे आलस का अभाव अमर बनाने वाला है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो मनुष्य निश्चय करके कार्य प्रारम्भ करता है, कार्य के मध्य में रुकता नहीं है, समय को नष्ट नहीं करता है और स्वयं के वश में रहता है, उसी को पंडित कहा जाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो अपने कल्याण की बात है, उसे आज ही कर, वृद्ध होकर क्या करेगा? क्योंकि वृद्धावस्था में तो अपने अंग भी भार हो जाते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
कर्म भावना प्रधान उत्साह ही सच्चा उत्साह है, फल भावना-प्रधान उत्साह तो लोभ का ही एक छुपा रूप है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिसने प्रथम बाल्यावस्था में विद्या का अर्जन नहीं किया, द्वितीय युवावस्था में धन का अर्जन नहीं किया और तृतीय प्रौढ़ अवस्था में तप का अर्जन नहीं किया, वह चतुर्थ वृद्धावस्था में क्या करेगा? जीवन को कल्याण मय और सुन्दर बनाने से ही मृत्यु भी शुभ बन सकती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो युवा पुरुष सब बातों में दूसरों का सहारा चाहते हैं, जो सदा एक न एक नया अगुआ ढूँढ़ा करते हैं और उनके अनुयायी बना करते है, वे आत्म संस्कार के कार्य में उन्नति नहीं कर सकते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जीवन में दो व्यक्ति असफल होते हैं, एक वो जो सोचता है पर करता नहीं, एक वो जो करता है पर सोचता नहीं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
ऐसा कोई काम मत करो जिससे स्वयं के या दूसरे के परिणाम खराब हो। जो खतरों से डरते हैं, जिन्हें कष्ट सहने में भय लगता है, जिन्हें कठोर परिश्रम करना नहीं आता, उन्हें अपने जीवन को उन्नतिशील बनाने की कल्पना नहीं करना चाहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
हे मानव! दुःखी मत हो, यदि तकदीर बदलनी है तो अपनी तरकीब बदलो खुशहाली आपके चारों ओर बरसेगी। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो पहले निश्चित करके फिर कार्य का आरम्भ करता है, कार्य के बीच में नहीं रुकता, समय को व्यर्थ नहीं जाने देता और चित्त को वश में रखता है वही पण्डित (ज्ञानी) कहलाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
कलम चलाने से नहीं कदम बढ़ाने से मंजिल मिलती है, अतः कलम पर नहीं कदम पर भरोसा रखो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जब तक साधक को अपनी स्थिति पर असन्तोष नहीं होता, तब तक उसकी उन्नति नहीं होती है। साधक वह होता है, जो चौबीसों घण्टे साधना करता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो साधना सुगम दिखे उसको करना शुरू कर दें तो जो कठिन दिखती है वह सुगम हो जायेगी और जो समझ में नहीं आती वह समझ में आने लग जायेगी। पुरुषार्थ 0 – भेजें
''नाच न जाने आँगन टेढ़ा'', नाचना सीखो आँगन को टेढ़ा मत कहो, त्याग करना सीखो काल को दोष मत दो, टेढ़े आँगन में भी व्यक्ति नाचा जा सकता है, जो परमात्म भाव से भरा है वह पंचम काल में भी भावलिंगी मुनि बन सकता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो विपत्तियों के दिनों में भी मुस्कुराना जानता है वह विपत्ति को भी विपत्ति में डाल देता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
कार्यशैली हमेशा उत्तम होनी चाहिए आपका हर कार्य परफेक्ट होना चाहिए, कार्य को पूजा समझ कर करें यही जीवन प्रबंधन की कला है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
गलतियाँ हों पर एक गलती दुबारा न हो, गलतियाँ उन्हीं से होती हैं, जो कुछ करने की कोशिश करते हैं, गिरते भी वही हैं जो चलते हैं, गलती से सबक लो, गलती से गिरो भी तो बॉल की तरह उछलो न कि मिट्टी के लौंदे की तरह गिरकर चिपको, यही उन्नति का राज है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो व्यक्ति शक्ति न होते हुए भी मन से हार नहीं मानता है उसको दुनिया की कोई भी ताकत हरा नहीं सकती है किन्तु हर हार से सीख ली जायें। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो व्यक्ति स्वभाव से धैर्यवान है, वह महान् विपत्ति के समय भी अधीर नहीं होता, संकट के समय धैर्य धारण करना मानो आधी लड़ाई जीत लेना है, अपने धैर्य के बिना और कोई संकट से मनुष्य का उद्धार नहीं कर सकता, सज्जनों का धन तो धैर्य ही है जिसके पास धैर्य है, वह जो भी इच्छा करता है उसे प्राप्त कर सकता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जब तालाब भरता है तो मछलियाँ चींटियों को खाती हैं और जब तालाब खाली होता है तो चींटियाँ मछलियों को खाती हैं। मौका सबको मिलता है बस अपनी बारी का इंतजार करो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जीवन में कोई विपत्ति आये तो कोई आपत्ति मत कीजिए, उसका धैर्यपूर्वक सामना कीजिए, दूध फटने पर वे ही लोग उदास होते हैं, जिन्हें रसगुल्ले बनाने नहीं आते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
दुःख सभी को होता है, पर दुःख को दुःख मानकर भी जो उसे सहने की शक्ति रखते हैं, उनके लिए दुःख भी सुख हो जाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
मुसीबतें टूट पड़ें, हाल बेहाल हो जाए, तो भी जो लोग निश्चय से डिगते नहीं और धीरज रखकर चलते हैं वे ही सच्चे धैर्यशाली हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
संसार में आधे से अधिक सक्षम लोग तो इसलिए असफल हो जाते हैं क्योंकि समय पर उनमें साहस का संचार नहीं हो पाता और वे भयभीत हो उठते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
विपदाओं के समूह बाढ़ की लहरों के समान आया करते हैं, धीर पुरुष उन्हें चट्टान की तरह सहता रहे, तो वह धीरे-धीरे आप ही चले जाते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें