Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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विसंवाद से बचने के लिए एकत्व आवश्यक है।
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टकराव टालिए क्योंकि टकराव ही बिखराव का कारण है।
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प्रेम कहता है आगे बढ़ो, प्रतिस्पर्धा कहती है मेरे पीछे रहो।
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दुर्बल मनुष्य, मुनि और विषधर सर्प इन तीनों की दृष्टि अत्यन्त दुःसह होती है, इसलिए तुम इन्हें असंतुष्ट नहीं करना।
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कहना मुश्किल है कि राम और कृष्ण में कौन उन्नीस है और कौन बीस है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि स्वयं बृज के चारों ओर की भूमि के लोग भी वहाँ एक दूसरे को जय राम जी से नमस्ते करते हैं।
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किसी भी संगठन में सम्मिलित होने का अर्थ है, अपने आप पर बंधन लगाना, अपनी स्वतंत्रता को सीमित करना।
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कोई कितना भी शुद्ध और उद्योगी क्यों न हो, लोग उस पर दोषारोपण कर ही देते हैं। अपने धार्मिक कार्यों में लगे हुए वनवासी मुनि के भी शत्रु, मित्र और उदासीन ये तीन पक्ष पैदा हो जाते हैं।
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भारत में दार्शनिक तो संत होते हैं और संत दार्शनिक होते हैं।
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विज्ञान ने जितनी समस्याएँ हल की हैं, उतनी ही नई समस्याएँ खड़ी कर दी हैं।
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राजा, मंत्री, वैद्य, विद्वान् तथा संन्यासी को वृद्धावस्था अलंकृत करती है तथा वेश्या, योद्धा, गायक एवं सेवक को अपमानित कराती है।
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स्त्री को पराजित करना हो तो उसकी प्रशंसा करो।
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चंचल मन वाली स्त्री, मद्यपान और जुआ, ये उन्हीं लोगों के लिए आनन्दवर्द्धक हैं, जिन्हें भाग्य-लक्ष्मी छोड़ देती है।
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निर्माल्य भोग करने वाला संतान हीन, सम्पत्ति हीन, सुख हीन होता है।
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विज्ञान मानववादी है और महावीर मानवतावादी थे, आतंकी दुर्घटनाओं, बड़ी-बड़ी बीमारियों में भी वर्तमान विज्ञान के उपकरण कारण बन रहे हैं लोगों का जीवन-अस्त व्यस्त हो रहा है, लाभ कम हानि ज्यादा हो रही है।
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एक घंटे टी.वी. देखने पर १२ घंटे आँख बन्द करना जरूरी होता है।
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उपलब्धि और आलोचना एक-दूसरे के मित्र हैं, उपलब्धियाँ बढ़ेंगी तो निश्चित ही आपकी आलोचनाएँ होंगी।
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सन्तों की इच्छाशक्ति और शासकों की कार्य शक्ति एक हो जाए तो देश की तस्वीर बदल सकती है।
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मक्खियाँ घाव चाहती हैं, राजा धन चाहता है, नीच कलह चाहते हैं, पत्नि प्रेम चाहती है, पति काम चाहता है, माता-पिता सेवा चाहते हैं, स्त्रियाँ प्रशंसा चाहती हैं, संतान स्नेह चाहती है, मित्र प्रेम चाहते हैं, श्रावक सम्पत्ति चाहते हैं और साधु शान्ति चाहते हैं।
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असली हीरे के विरोधी, कंकर-पत्थर नहीं, नकली हीरे होते हैं।
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विरोध प्रचार की कुँजी है।
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प्रजातंत्र का अर्थ है कि उसमें निम्न से निम्न और उच्च से उच्च मानव को प्रगति का समान अवसर मिले।
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शान्ति कायम रखने का सर्वाधिक प्रभावशाली तरीका युद्ध के लिए तैयार रहना है।
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ये आठ कभी दूसरों का दुःख नहीं समझते–१. राजा, २. वेश्या, ३. यमराज, ४. अग्नि, ५. छोटा बच्चा, ६. चोर, ७. भिखारी, ८. कर वसूल करने वाला।
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स्त्री शक्ति पर और पुरुष सौन्दर्य पर विश्वास करता है।
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शीतकाल में अग्नि, दूध का भोजन, राजा से सम्मान, इष्ट का दर्शन अमृत है।
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बड़े से बड़े नुकसान होने पर जो पीड़ा नहीं होती, उससे अधिक पीड़ा अधीनस्थ के द्वारा आज्ञा उल्लंघन करने पर होती है।
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यदि गुणी व्यक्ति लज्जाशील हो तो दुष्ट कहते हैं कि यह मूर्ख है, व्रतादि में रूचि रखता तो दंभी है, शुद्धता के लिए ढोंग, शूर हो तो निर्दय, प्रिय भाषी हो तो दीन, तेजस्वी हो तो गर्व युक्त, वक्ता हो तो बकवासी, स्थिर हो तो शक्तिहीन इस प्रकार गुणी व्यक्तियों का वह कौन सा गुण है जिसमें दुष्ट कुछ दोष नहीं निकालते हैं।
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राजा दुर्मन्त्र से नष्ट हो जाता है, साधु परिग्रह से, पुत्र अधिक लालन से, व्रती अध्ययन न करने से, कुल कुपुत्र से, शील दुष्टों के संसर्ग से, मित्रता प्रेम के अभाव से, समृद्धि अनीति से, स्नेह प्रवास में रहने से, स्त्री गर्व से, कृषि छोड़ देने से तथा धन प्रमाद से नष्ट हो जाता है।
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मना करने की छह विधियाँ हैं– १.मौन, २.समय का विलंब करना, ३.चले जाना, ४.जमीन की ओर देखना, ५.भृकुटी चढ़ाना, ६.अन्य प्रकार से बात करना है।
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ये पाँच जीते हुए भी मरे के समान हैं– १. दरिद्र, २. रोगी, ३. मूर्ख, ४. प्रवासी तथा ५. पराई नौकरी करने वाला।
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एक बुद्धिमान पुरुष की प्रशंसा उसकी अनुपस्थिति में कीजिए किन्तु स्त्री की प्रशंसा उसके मुख पर कीजिए।
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जगत् में जो धूर्त अथवा भद्र लोग हैं, उनका माप और कुछ नहीं केवल उनकी आँखें ही हैं।
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श्रेष्ठ पुरुषों के मनोरथों को पूर्ण करने में श्रेष्ठ पुरुष ही समर्थ होते हैं।
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जहाँ अपूज्यों की पूजा होती है तथा पूज्यों का अपमान होता है, वहाँ दुर्भिक्ष, मरण तथा भय तीन कार्य होते हैं।
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सलाह का कदाचित् ही स्वागत होता है, जिन्हें इसकी अधिकतम आवश्यकता होती है, वे ही इसे सबसे कम पसन्द करते हैं।
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प्रत्येक व्यक्ति एवं वस्तु का अपने स्थान पर महत्त्व है एवं कार्य के योग्य स्थान पर ही कार्य की सिद्धि होती है।
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व्यक्तिगत स्वतंत्रता वहीं तक दी जा सकती है जहाँ तक दूसरों की स्वतंत्रता में बाधा न पड़े।
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विचार और कार्य की स्वतंत्रता ही जीवन उन्नति और कुशल क्षेम का एक मात्र साधन है।
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ओखली–मूसल को स्वर्ग भी ले जाओ तो वहाँ भी वे धान ही कूटेंगे।
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प्रायः स्वामियों का अपने आश्रितों के प्रति आदरभाव अपने प्रयोजन के लिए और अस्थिर होता है।
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कलह से मनुष्य के घर, कुवाक्य बोलने से मित्रता, कुकर्म से मनुष्य का यश नष्ट हो जाता है, प्रमाद से पढ़ा सुना हुआ श्रुत नष्ट हो जाता है।
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जो परिहास का उत्तर नहीं दे सकता, वह हँसता हुआ कम से कम रस तो ले सकता है।
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प्रिय व्यक्ति का दर्शन अमृत है।
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मनुष्य केवल रोटी से जीवित नहीं रहता अपितु विश्वास, प्रशंसा व सहानुभूति भी आवश्यक है।
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विशाखा नक्षत्र के उपरांत वर्षा काल, प्रसव के उपरांत नारी का यौवन, प्रणाम करने के उपरान्त सत्पुरुषों का क्रोध और याचना करने के बाद मनुष्य का गौरव समाप्त हो जाता है।
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अत्यन्त चमकता हुआ भी जुगनू अग्नि नहीं होता है।
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कोई भी वस्तु इतनी अच्छी नहीं होती जितनी पहले प्रतीत होती है।
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जिसका स्थान लिया जाता है उसका उत्तरदायित्व भी लिया जाता है।
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जैसे छोटा अंकुश भी हाथियों पर गिरकर उन्हें कष्ट देता है, वैसे ही बड़ों के ऊपर थोड़ा क्लेश पड़ना भी बहुत कष्टकर होता है।
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स्त्री का चारित्र और पुरुष का भाग्य किसी के द्वारा नहीं जाना जाता है।
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चाहता तो है हर रोज सुबह आपको अनमोल खजाना भेजूँ पर मेरे दामन में दुआओं के अलावा कुछ भी नहीं है, सलामत रहें आप और आपकी मुस्कुराहट, खुशी से बीतें दिन हर सुहानी रात हो, जहाँ बढ़ें कदम खुशियों की वर्षात हो।
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यहाँ पर व्यक्ति काले-गोरे का भेद करता है, किन्तु मरने के बाद राख तो सबकी एक जैसी ही होती है।
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वृद्धावस्था रूप को, चिन्ता सब सुखों को एवं शक्ति को, दुर्जन की सेवा विशाल अभिमान को, याचना गौरव को, अपने आपकी प्रशंसा गुणों को और लक्ष्मी दया को नष्ट करती है।
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अज्ञानी मनुष्यों का जीवन शून्य है, बन्धुहीन मनुष्यों की दिशाएँ शून्य हैं, पुत्ररहित का घर शून्य है और दरिद्रता सर्व गुणों से शून्य होती है।
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सौभाग्य को ठुकरा देना भी दुर्भाग्य है।
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समस्याएं जीवन का अभिन्न अङ्ग हैं- कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना ही दुष्ट क्यों न हो, उसके सभी दरवाजे बन्द कभी नहीं होते, अर्थात् एक न एक गुण प्रत्येक व्यक्ति में होता है।
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दुःखी होने के दस उपाय- 1.समय पर काम नही करना, 2.पूर्व सुखों का स्मरण करना, 3.अपनी बात को ही सत्य बताना, 4.देर से सोना-उठना, 5.हमेशा स्वयं के लिये सोचना, 6.लेन-देन का हिसाब न रखना, 7.किसी पर विश्वास न करना, 8.निष्प्रयोजन झूठ बोलना, 9.विना मांगे सलाह देना, 10.किसी के लिए कुछ नहीं करना।
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समस्त शास्त्रों में पाँच प्राणी जीवित रहते हुए भी मृत कहे जाते हैं, 1.दरिद्र, 2.बीमार, 3.मूर्ख, 4.परदेश में गमन करने वाला और 5.नित्य नौकरी करने वाला।
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पागल, प्रेमी और कवि इनकी कल्पनाएं एक सी होती है।
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स्त्रियाँ, राजा और लतायें, जो भी साथ में होता है उसी से लिपट जाते हैं।
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बुद्धिमान की प्रशंसा उसकी अनुपस्थिति में करना चाहिए पर स्त्री की उसके सामने करना चाहिए।
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अधिक दुःख- लोक में निर्धन दुःखी उससे ज्यादा कर्जदार इन दोनों से ज्यादा रोगी इससे ज्यादा जिसकी स्त्री दुष्ट है वह दुःखी है।
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चार चीजें छोटी नहीं- 1.घाव, 2.कर्जा, 3.कषाय, 4.अग्नि इनको कभी छोटा न समझें।
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सात बातें अच्छी नहीं लगती- 1.कञ्जूस को दान देने वाला, 2.लोभी को याचना करने वाला, 3.चोर को उजाला, 4.मूर्ख को उपदेश देने वाला, 5.कर्जदार को साहूकार, 6.रूपवान को बुढ़ापा, 7.व्याभिचारिणी को पति अच्छा नहीं लगता है।
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साधारण व्यक्ति से राजा, राजा से व्यन्तर, व्यन्तर से ज्योतिषी, ज्योतिषी से भवनवासी,
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समाज के कार्यों से अशान्ति का अनुभव होता है।
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जीवन शैली के चार भेद- 1. कुछ लोग अकेले में रहते हैं, अकेले में जीते हैं, 2. कुछ लोग अकेले में रहते हैं पर भीड़ में जीते हैं, 3. कुछ लोग भीड़ में रहते हैं पर अकेले में जीते हैं, 4. कुछ लोग भीड़ में रहते हैं और भीड़ में ही जीते हैं।
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मुनि अपने घर में रहते हैं और गृहस्थ बाहर भटकते हैं, पर कहते उल्टा हैं कि मुनि गृहत्यागी हैं, गृहस्थ घर में रहते हैं।
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नाम निक्षेप- नाम है अशोक और दिन भर शोक करता रहता है।
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कामदेव का रूप किशोर अवस्था में सुन्दर होता है किन्तु तीर्थङ्कर का रूप वृद्धावस्था में भी सुन्दर होता है।
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प्रथम पृथ्वी, एक लाख अस्सी हजार योजन मोटी है, उनमें खर भाग सोलह हजार योजन, पङ्कभाग चौरासी हजार योजन, अब्बहुल भाग अस्सी हजार योजन मोटा है। द्वितीय पृथ्वी बत्तीस हजार योजन, तृतीय पृथ्वी अठ्ठाईस हजार योजन, चतुर्थ पृथ्वी चौबीस हजार योजन, पञ्चम पृथ्वी बीस हजार योजन, षष्टम पृथ्वी सोलह हजार योजन, सप्तम पृथ्वी आठ हजार योजन, इनके सब ओर बीस-बीस हजार योजन मोटे वातवलय हैं।
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श्रेणिबद्ध, पुष्पप्रकीर्णक, इन्द्रकबिल सभी पृथ्वियों के बिलों की संख्या कुल चौरासी लाख है।
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कहीं ऐसा भी मिलता है कि भरत-ऐरावत क्षेत्र का प्रथम चक्रवर्ती ही वृषभाचल पर प्रशस्ति लिखता है अन्य चक्रवर्ती नहीं।
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मध्यलोक का वर्णन- पहले सुषमासुषमा काल में शरीर की अवगाहना तीन कोष, दूसरे सुषमा काल में दो कोष, तीसरे काल में एक कोष की अवगाहना, चौथे काल में पाँच सौ धनुष, आयु भी इसी क्रम से तीन पल्य, दो पल्य व एक पल्य, एक कोटि वर्ष पूर्व उत्कृष्ट आयु होती है।
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जम्बूद्वीप को आदि लेकर स्वयम्भूरमण तक एक नाम वाले असंख्यात द्वीप समुद्र हैं, क्योंकि शब्द संख्यात हैं और द्वीप-समुद्र असंख्यात हैं।
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