Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Wealth

धन

130 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

लक्ष्मी हिंडोले की तरह चंचल है। विषयों से उत्पन्न हुआ सुख अंततः दुःखप्रद है। देह विपत्ति का घर है। अत्यधिक धन मृत्यु का प्रचुर साधन है। संसार अत्यधिक शोकपूर्ण है। स्त्रियाँ अनर्थ की जड़ हैं। फिर भी लोग इस घोर संसार में ही रत रहते हैं। आत्मा में रत नहीं होते यह आश्चर्य है।
धन
मनुष्य धन के अभाव में इतना कष्ट नहीं पाता, जितना अपने फिजूल खर्चों के कारण कष्ट पाता है।
धन
इंसान होता है प्यार करने के लिए और पैसा होता है उपयोग करने के लिए किन्तु लोग प्यार पैसों से करते और उपयोग इंसान का करते हैं।
धन
जो पुरुष न्याय की बात को समझता है और दूसरों की वस्तुओं को लेना नहीं चाहता लक्ष्मी श्रेष्ठता को जानती है और उसे ढूँढ़ती हुई उसके घर आती है।
धन
जो लोग धन उपार्जन के लिए सदा हाय-हाय करते फिरते हैं पर यश प्राप्त करने की परवाह नहीं करते उनका अस्तित्व पृथ्वी के लिए केवल भार स्वरूप है।
धन
धर्म से धन आता है, धन से धर्म नहीं होता।
धन
यदि आप लक्ष्मीपति हो तो दान करोगे लक्ष्मीदास हो तो धन की सेवा करोगे।
धन
सम्पत्ति स्वयं अपने साथ विपत्ति को लेकर आती है।
धन
सम्पत्ति स्वयं अपने साथ विपत्ति को लेकर आती है।
धन
भाग्यवान वह है जिसका धन सेवक है और भाग्यहीन वह है जो धन का सेवक है।
धन
दौलत मनुष्य को अहंकार, अय्यासी और मूढ़ता के सामने ला पटकती है।
धन
धनवान वह नहीं जिसके पास अधिक धन है बल्कि धनवान वह है जो उसका उपयोग करना जानता है।
धन
धन कमाने की अपेक्षा उसे खर्च करने का काम ज्यादा कठिन है।
धन
कुबेर भी यदि आमदनी से अधिक खर्च करेगा तो वह भी एक दिन कंगाल हो जाएगा।
धन
जो धन अत्यन्त क्लेश उठाने से और धर्म का उल्लंघन करने से अथवा शत्रु के सामने सिर झुकाने से प्राप्त होता हो, उसमें आप बल न लगाए।
धन
धन को इतना मूल्य मत दीजिए कि आप अपने स्वभाव और चरित्र को गिरवी रख बैठें।
धन
धन के उपार्जन में दुःख, उपार्जित धन की रक्षा करने में दुःख, दान में दुःख और खर्च में दुःख इस प्रकार दुःख के कारण धन को धिक्कार हो।
धन
धन, सत्ता और मान-मनुष्य से असंख्य पाप और अनर्थ कराते हैं।
धन
मैंने कुछ ऐसे भी गरीब देखे हैं जिनके पास पैसे के सिवा कुछ भी नहीं है।
धन
ऐश्वर्य पाप का बीज है, दरिद्रता पाप का फल है।
धन
आर्थिक पराधीनता ही संसार में दुःख का कारण है, मनुष्य को उससे मुक्ति पानी चाहिए।
धन
पैसे से भले ही खुशियाँ न खरीदी जा सकें, लेकिन तकलीफें जरूर कम की जा सकती हैं।
धन
जिसकी जेब में पैसा नहीं, उसकी जुबान में अच्छे शब्द होना चाहिए।
धन
रुपया छठी इन्द्रिय है, बिना इसके अन्य पाँच इन्द्रियों का पूरा उपयोग नहीं हो सकता है।
धन
पैसा बहुत जरूरी है, लेकिन इतना जरूरी भी नहीं कि उसे पाने के लिए कुछ भी किया जाए।
धन
धन यदि अच्छे मार्ग से आता है तो वह अच्छे कार्यों में ही खर्च होगा और यदि अन्यायपूर्वक कमाया गया होगा तो उसके व्यय के रास्ते भी पाप के ही होंगे।
धन
वृद्ध पुरुषों में भी जिनके पास धन है, वे तरुण हैं और जो धनहीन हैं, वे युवावस्था में ही वृद्ध हो जाते हैं।
धन
पैसे से भोजन खरीदा जा सकता है, लेकिन भूख नहीं, पैसे से हँसी खरीदी जा सकती है मगर खुशी नहीं, पैसे से बिस्तर मिल सकते हैं नींद नहीं, किताबें मिल सकती है मगर ज्ञान नहीं, घड़ी मिल सकती है मगर समय नहीं, साथी मिल सकता है मगर दोस्त नहीं, चमक-दमक मिल सकती है मगर खूबसूरती नहीं, मकान मिल सकता है मगर घर नहीं, दवा मिल सकती है मगर सेहत नहीं, अँगूठी मिल सकती है मगर जीवन साथी नहीं, इसलिए पैसों को ज्यादा महत्त्व न दें, उसका अहंकार न करें, पर स्वाध्याय से आप जो चाहे वह सब मिल सकता है।
धन
जिस व्यक्ति को उसके इर्द-गिर्द की जनता चाहती है, वह सच्चा धनी है।
धन
समय और धन की बचत जीवन के कठिन समय को बर्दाश्त करने की वह कुंजी है जिससे बहुत सी मुश्किलें आसान हो जाती हैं।
धन
मनुष्य जो कमाता है वो नहीं, बल्कि जो बचाता है वह उसे धनी बनाता है।
धन
कर्जे में डूबा कोई भी व्यक्ति मानसिक शान्ति का दावा नहीं कर सकता है। आप एक बार कर्ज लेंगे, परन्तु कर्ज बार-बार आपकी चेतना पर हावी हो जाएगा और आप महसूस करेंगे कि आप अपने ही मालिक नहीं रहे हैं।
धन
लक्ष्मी के पाते ही मनुष्य कठोर हो जाता है।
धन
जो आमदनी से अधिक खर्च करता है, शक्ति रहित होकर कलह करता है, रोगी होकर सब कुछ खाता है, पुत्र रहित होकर धन संग्रह करता है, खोटी संगति करता है वह मनुष्य शीघ्र नष्ट होता है।
धन
कर्ज लेना कष्ट लेना है।
धन
उधार लेकर खाना उस प्रकार है जैसे घास जलाकर ठंडी दूर करना, किंचित् दुःख दूर करता है बाद में दुःख का ही कारण है।
धन
कर्ज लेने की आदत गरीबी को निमंत्रण देती है।
धन
कर्ज लेने की आदत से बचो, यदि लेना ही पड़े तो समय पर चुकाओ। कर्ज लेना भी भिक्षावृत्ति के समान है।
धन
ऋण पत्थर की चट्टान से भी भारी होता है।
धन
कर्ज को दोस्ती की कैंची कहते हैं।
धन
आपत्ति के लिए धन की रक्षा करें, धन के द्वारा स्त्री की रक्षा करें और स्त्री एवं धन दोनों के द्वारा सदा अपनी रक्षा करें।
धन
सम्पत्ति होने पर तृष्णा से, व्यवस्था से, भय से सदैव आकुलित होता है और विपत्ति आने पर घबड़ाकर दुःखी होता है।
धन
धन, शक्ति और दक्षता केवल जीवन के साधन है खुद जीवन नहीं।
धन
आप सही का चुनाव कर अमीर नहीं बन सकते लेकिन आप अमीर है तो लोग आपको सही अवश्य कहेंगे।
धन
कमाएँ नीति से, दान करें प्रीति से, खर्च करें रीति से।
धन
कमाने में पाप मत करो क्योंकि इस धरा का इस धरा पर सब धरा रह जायेगा।
धन
वंश परम्परा, भाग्य, पुरुषार्थ और मित्र का सहयोग इन चार कारणों से धन की प्राप्ति होती है।
धन
पैसा आपका सेवक है यदि आप उसका उपयोग जानते हैं किन्तु वह आपका स्वामी है यदि आप उसका उपयोग करना नहीं जानते हैं।
धन
ऐश्वर्य मूर्खों को नष्ट कर देता है और बुद्धिमानों को संकटग्रस्त कर देता है।
धन
एक साथ ही लक्ष्मी और विवेक का वरदान प्रायः मनुष्यों को कम ही मिलता है।
धन
छल-छिद्र द्वारा संचित किया हुआ धन ऐसा ही है जैसे कि मिट्टी के कच्चे घड़े में पानी भरकर रखना है।
धन
संसार में मनुष्य की दरिद्रता ही मृत्यु है और धन ही आयु है।
धन
निर्धनता मनुष्य में चिंता उत्पन्न करती है, दूसरों से अपमान कराती है शत्रुता उत्पन्न करती है, मित्रों से घृणा का पात्र बनाती है और आत्मीय जनों से विरोध कराती है, निर्धन व्यक्ति की घर छोड़कर वन जाने की इच्छा होती है, उसे स्त्री से भी अपमान सहना पड़ता है, हृदय स्थित शोकाग्नि एक बार ही जला नहीं डालती अपितु संतप्त करती रहती है।
धन
सत्यानाशनी दरिद्रता इस जन्म के सुखों की तो शत्रु है ही, पर साथ ही साथ दूसरे जन्म के सुखोपभोग की भी घातक है।
धन
उस एक अभिशाप के नीचे, जिसे लोग 'दरिद्रता' कहते हैं, हजार तरह की आपत्तियाँ और उपद्रव छिपे हुए हैं।
धन
विश्व में दरिद्रता के समान कोई कष्ट नहीं है।
धन
श्रद्धा, शील, लज्जा, संकोच, श्रुत (ज्ञान), त्याग और बुद्धि ये सात धन जिस स्त्री या पुरुष के पास है वही वास्तविक धनी है उसी का जीवन सफल है।
धन
भगवन् मुझे सम्पत्ति के साथ सद्बुद्धि भी देना जिससे मैं कुँए के पानी की भाँति उसका सदुपयोग कर सकूँ।
धन
फालतू सम्पत्ति केवल फालतू वस्तुएँ ही खरीद सकती है।
धन
छोटे-छोटे खर्चों से सावधान रहिये एक छोटा-सा छेद बड़े जहाज को डुबा सकता है।
धन
पैसा ही सबकुछ नहीं अन्यथा तीर्थंकर क्यों त्याग करते, वे जानते थे कि पैसे से भोजन खरीद सकते है भूख नहीं, पुस्तक खरीद सकते ज्ञान नहीं, सुविधाएँ खरीद सकते हैं सुख नहीं, मंदिर बना सकते भगवत्ता नहीं खरीद सकते हैं।
धन
किसी गरीब को सिर्फ दौलत देकर अमीर नहीं बना सकते उसे जीवन जीने की कला सिखानी होगी। घर देखकर लोग क्या कहेंगे यह न सोचें?
धन
पैसा जेब में हो दिमाग में नहीं, दिमाग में पैसा रखोगे तो दिमाग होगा सातवें आसमान पर और तुम होंगे, सातवें नरक में और पैसा जेब में होगा तो दुनिया होगी तुम्हारी जेब में और तुम होंगे दुनिया की जेब में।
धन
सम्पत्ति समाज की समस्त शक्तियों की उपज है।
धन
सम्पत्ति छल-कपट से नहीं लाभान्तराय के क्षयोपशम से मिलती है।
धन
जो धन पाप रहित निष्कलंक रूप से प्राप्त किया जाता है, उससे धर्म, काम और आनन्द का स्रोत बह निकलता है।
धन
जिस आदमी ने अपने पास ढेर सारी सम्पत्ति जमा कर रखी है, पर उपयोग में नहीं लाता, उसमें और मुर्दे में कोई अंतर नहीं है क्योंकि वह लक्ष्मी से कोई परोपकार नहीं करना।
धन
गुलाम बनाने का सरल तरीका कर्ज से लाद दो।
धन
धन बुरा नहीं, धन की आकांक्षा बुरी होती है।
धन
लोगों की जितनी बुद्धियाँ भ्रष्ट हुई हैं, हो रही हैं और भविष्य में होगीं, वे सब श्री (लक्ष्मी) और श्रीमती के कारण हुई हैं।
धन
पैसा कमाने में पाप है और पैसा गमाने में भी पाप होता है।
धन
आर्थिक शिक्षा–अमीर कैसे बनना? इसकी शिक्षा वह नहीं दे सकता जो खुद अमीर नहीं है और किसी ने पैसा कमा भी लिया हो तो उस पैसे को कैसे निवेश करना कि अमीरी बनी रहे।
धन
शास्त्रज्ञान, चारित्र और शान्त भाव नामक परम दुर्लभ धन जिनके पास है, वे मनुष्य धनी कहे गये हैं, शेष निर्धन माने गये हैं।
धन
नीरोगता, विद्वत्ता, सज्जनों के साथ मित्रता, महान् कुल में जन्म और स्वाधीनता ये धन के विना भी मनुष्यों का ऐश्वर्य कहलाता है।
धन
धन का उपार्जन उस प्रकार करना चाहिए जिस प्रकार धर्म नष्ट न हो और सुख भी क्षीण न हो, परस्पर सापेक्ष रहने वाले धर्म और सुख की सेवा करनी चाहिए, अर्थात् गृहस्थ को धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थ का परस्पर विरोध न करते हुए पालन करना चाहिए।
धन