Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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संतोष

330 सूत्र · पृष्ठ 1 / 5

वस्तु स्वरूप विचार खुशी से, सब दुःख संकट सहा करे।
संतोष
जिन्दगी छोटी है जंजाल बड़े हैं। जंजालों को छोटा करो, जिन्दगी स्वयं सुखी और लम्बी हो जाएगी।
संतोष
आकुलता ही दुःखों की जननी है।
संतोष
मनुष्य जितनी अधिक आवश्यकता पैदा करता है, उतना ही वह पराधीन हो जाता है।
संतोष
धन्य है वह जो आशा नहीं रखता क्योंकि उसे कभी निराश नहीं होना पड़ेगा।
संतोष
समस्त भय और चिंताएँ इच्छाओं का परिणाम हैं।
संतोष
सुख इन्द्रिय-विषयों में नहीं, इच्छाओं के रोकने में है।
संतोष
जीवन जीने की कला है कि आप अपने निन्यानवे रुपये में सुखी रहिए एक रुपये की कमी की चिन्ता मत करिए।
संतोष
यदि जिंदगी को नरक नहीं बनाना चाहते तो न किसी से अपेक्षा करो, न उपेक्षा पर ध्यान दो।
संतोष
'सन्तोष' से काम, क्रोध और लोभ; तीनों नष्ट हो जाते हैं।
संतोष
जिसमें शान्ति का निवास नहीं है, उसके सारे सद्गुण व्यर्थ हैं।
संतोष
शान्ति की विजय भी युद्ध की विजय से कम महत्त्व की नहीं होती है।
संतोष
जैसे बालक हर अवस्था में माँ को ही पुकारता है, ऐसे ही आप हर अवस्था में भगवान् को पुकारो। जो मन की शान्ति व संतोष पा लेता है, वही असल में जीवन जीता है, वही संग्राम विजयी है। फिर उसके पास मोटर, घर, धन-सम्पदा हो या न हो लेकिन यदि मन की शान्ति न रही तो सारे सुख-वैभव के बावजूद भी वह मनुष्य सुखहीन है।
संतोष
‘‘जैसा मैं चाहूँ वैसा हो जाये’’ यह इच्छा जब तक रहेगी, तब तक शान्ति नहीं मिल सकती। चाहे साधु बनो, चाहे गृहस्थ बनो, जब तक कामना (कुछ पाने की इच्छा) रहेगी, तब तक शान्ति नहीं मिल सकती।
संतोष
जिसको अपने में ही शान्ति मिल गई उसके लिए सारा संसार शान्तिमय है।
संतोष
स्वयं शांत रहने वालों की शान्ति को कोई भंग नहीं कर सकता है।
संतोष
मन में शान्ति चाहिए तो व्यर्थ की भाग-दौड़ और उत्तेजनाओं से बचिए।
संतोष
दूसरों को न बदल सको तो स्वयं को बदल लीजिए, शान्ति के द्वार खुल जाएँगे।
संतोष
शान्ति मानव-जीवन के लिए एक परम पावन और वांछनीय निधि है।
संतोष
जगत् की अशान्ति देखकर अपनी शान्ति भंग मत करो।
संतोष
शान्ति मानव जीवन का चरम उद्देश्य है, संसार में जितने धर्म-कर्म हम करते हैं, उन सबके पीछे यही लालसा रहती है कि हम शान्तिपूर्वक जीवन बिताएँ।
संतोष
आज व्यक्ति के पास पर्याप्त धन-दौलत, वैभव सब कुछ है, पर शान्ति नहीं है और शान्ति नहीं है तो सब कुछ पाना और न पाना बराबर है।
संतोष
संसार में जो मिलता है, वह रुचता नहीं और जो रुचता है वह मिलता नहीं इसलिए सुख मिलता नहीं और दुःख मिटता नहीं।
संतोष
सच्चा सुख बाहर से नहीं, अंदर (हृदय) से मिलता है।
संतोष
शारीरिक सुख पराधीन है परन्तु आत्मिक सुख स्वाधीन है।
संतोष
जो आपने खो दिया उसकी तरफ कभी न देखें अपितु उस तरफ देखें जो अभी यहीं आपके पास शेष बचा है, यही सुख का रहस्य है।
संतोष
जिसे सोने के लिए नींद की गोली नहीं खानी पड़ती और जागने के लिए अलार्म की जरूरत नहीं पड़ती वही सुखी है।
संतोष
जब तक सांसारिक सुख लेने की वृत्ति नहीं मिटेगी, तब तक कितना ही पढ़-लिख लें, कितने ही चतुर और समझदार बन जायें, कितनी ही योग्यता का सम्पादन कर लें, कितने ही व्याख्यान दाता बन जायें, कितनी ही पुस्तकें लिख लें किन्तु परम शान्ति नहीं मिलेगी।
संतोष
संतोष गरीबों को अमीर बनाता है, असंतोष अमीरों को गरीब बनाता है।
संतोष
निःस्पृह आत्मा ही समता रूप अमृत के पाने का अधिकारी है।
संतोष
अपनी आत्मा को प्रसन्न रखो, कोई अन्य प्रसन्न हों, चाहे न हों।
संतोष
न तो यश हित का साधक है न अपयश, बल्कि इच्छा का अभाव हित का साधक है।
संतोष
संसार में सार क्या है, जिसके लिए असंतोष किया जाय असंतोष तो दरिद्रता है।
संतोष
जो सबसे बड़ा और मालिक बनना चाहेगा वह संतोष नहीं पा सकेगा।
संतोष
पर पदार्थ की उधेड़बुन में समय क्यों खोते हो? भगवान् के ज्ञान में जो झलका है वह तो होकर ही रहेगा, तुम्हारे सोचने से क्या होता है।
संतोष
आशा व तृष्णा का स्वभाव ही आकुलता उत्पन्न करना है चाहे वह धार्मिक कार्य की ही क्यों न हो अतः प्रत्येक कार्य के ज्ञाता-दृष्टा बने रहो।
संतोष
कोई भी घटना होने पर ‘‘ऐसा तो होना ही था, अनहोनी तो नहीं हुई है फिर उस सम्बन्ध में कुछ भी विकल्प करना व्यर्थ है एवं आगामी दुःख के लिए नया बंध बांधना है।’’
संतोष
दुःख में दुःखी, सुख में सुखी रहने वाला पुरुष अधम है, दुःख में भी सुखी रहने वाला मध्यम पुरुष है, दुःख सुख में समान रहने वाला उत्तम पुरुष है और दुःख सुख की कल्पना से भी रहित है वह उत्तमोत्तम है।
संतोष
विचार के अनुकूल वस्तु स्वरूप बनाने में अशान्ति है और वस्तु स्वरूप के अनुकूल विचार बनाने में शान्ति है।
संतोष
आप तभी तक श्रेष्ठ हो, तभी तक ज्येष्ठ हो, जब तक आपके मन में कुछ लेने की इच्छा नहीं हुई, इच्छा होते ही मन नीचे चला जाता है और मन के नीचे जाते ही चारित्र (आध्यात्मिक स्तर) नीचे चला जाता है।
संतोष
सच्चा सुख स्त्री आदि से नहिं संतोष से मिलता है।
संतोष
सुखमय जीवन जीने के लिए हर परिस्थिति में रहना सीखो।
संतोष
यदि पुण्योदय न हो तो शान्त भाव से समय व्यतीत करें।
संतोष
संतोष रहित मनुष्य को चक्रवर्ती, नारायण और बलभद्र की विभूति से भी तृप्ति नहीं होती है। शान्ति से बढ़कर कोई तप नहीं, संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं, लालच से बढ़ा कोई रोग नहीं और दया से बढ़कर कोई धर्म नहीं हैं।
संतोष
अज्ञानी इच्छा की पूर्ति होने से सुख मानता है और ज्ञानी इच्छा के अभाव को सुख मानता है।
संतोष
मनुष्य के मन में संतोष प्राप्त होना स्वर्ग प्राप्ति से बढ़कर है।
संतोष
दरिद्र कौन? जिसे भारी तृष्णा है और धनवान कौन? जिसे पूर्ण सन्तोष है।
संतोष
क्या किसी को अपने मन के अनुसार सब सुख प्राप्त हो सकता है? जबकि सब कुछ भाग्य के अधीन है अतः सदा संतोष धारण करना चाहिए।
संतोष
संतोष रूपी अमृत से संतुष्ट मनुष्य के लिए सदा सुख शान्ति ही है।
संतोष
रत्नों से भरी हुई सारी पृथ्वी, संसार का सारा स्वर्ण, सारे पशु और स्त्रियाँ किसी एक पुरुष को मिल जायें तो भी वे सब उसके लिए पर्याप्त नहीं होंगे, वह और भी पाना चाहेगा, ऐसा समझकर संतोष धारण करें, भोगेच्छा को दबा दें।
संतोष
जो सन्तोष रूपी अमृत पीने से शान्त व तृप्त हो जाते हैं, वे आत्मा में रमण करने वाले महात्मा ही परमपद को प्राप्त होते हैं।
संतोष
वास्तव में जिसे किसी प्रकार की आशा नहीं है, वही सुख से सोता है, आशा का न होना ही परम सुख है।
संतोष
जो आशा के दास हैं, वे सम्पूर्ण लोक के दास हैं तथा आशा जिनकी दासी है, सम्पूर्ण लोक उनका दास बन जाता है।
संतोष
तृष्णावान का मन धन सम्पत्ति में और मूर्ख का मन काम सुख में रमता है पर जो सज्जन है वह ज्ञान द्वारा भोग इच्छा को जीतकर शान्ति में रमता है।
संतोष
परमानन्द में लीन दो ही तो चिन्तारहित हैं–अज्ञानी बालक और गुणों के परे पहुँचा हुआ संन्यासी।
संतोष
'तृष्णा' सबसे बढ़कर पापिष्ठ तथा नित्य उद्वेग करने वाली बताई गई है, उसके द्वारा प्रायः अधर्म ही होता है, वह अत्यन्त भयंकर पाप रूपी गड्ढे में डालने वाली है, जहाँ-जहाँ 'तृष्णा' है वहाँ-वहाँ संसार है।
संतोष
जब तक मनुष्य तृष्णा से युक्त रहता है, तब तक समृद्धिशाली होने पर भी दरिद्र ही रहता है। 'तृष्णा' दुश्चरित्र स्त्री के समान मनुष्य को अनुचित कामों में प्रेरित करती है।
संतोष
यदि तुम्हारी इच्छाएँ अनंत होंगी, तो तुम्हारी चिंताएँ व भय भी अनंत होंगे।
संतोष
जो कुछ मिले उसी में संतोष रखना तथा दूसरों से ईर्ष्या न करना ही शान्ति की कुंजी है और शान्ति जैसा आनंद कहीं नहीं है।
संतोष
अपनी आवश्यकताएँ कम करके आप वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकते हैं।
संतोष
आपके पास जो कुछ है उसका मजा उठाएँ, उसके स्वाद को यह कहकर खराब न करें कि मेरे पास वह नहीं है। आनंद निज के सुधार में है 'पर' में नहीं।
संतोष
परिस्थितियों व वातावरण के अनुरूप अपने आपको ढालने (बदलने) वाला ही सुखी होता है। सुख के लिए अपने से हीन गरीबों को देखकर जियें।
संतोष
अपेक्षा ही मनोव्यथा की जड़ है अतः किसी से भी अपेक्षा न रखें।
संतोष
जो उपलब्ध है उसकी श्रेष्ठता न समझी जाये तो अभाव ही दिखेगा।
संतोष
किसी से भी बहुत ज्यादा उम्मीद और आशा मत पाल लेना वरना जब उम्मीद पूरी नहीं होगी तब बहुत कष्ट होगा।
संतोष
योग्यता और परिस्थिति को ध्यान में न रखकर महत्त्वाकांक्षाएँ गढ़ने वाला दुःखी रहता और उपहास सहता है।
संतोष
जब हम दिन की शुरूआत करते हैं तब लगता है कि पैसा ही जीवन है, लेकिन जब शाम को लौटकर घर आते हैं तब लगता है कि शान्ति ही जीवन है।
संतोष
हद से ज्यादा मात्रा में रखे जाने पर मोर पंख भी गाड़ी की धुरी को तोड़ डालते हैं।
संतोष
सादगी मनुष्य का अमूल्य पहनावा है।
संतोष
महात्मा तो केवल वह है जिसकी कोई माँग नहीं है।
संतोष
राजकीय ठाठ-बाट की अपेक्षा सज्जनता की निर्धनता में अधिक मिठास है।
संतोष
मनचाहा सुख किसे मिलता है क्योंकि सुख भाग्य के अधीन है इसलिए संतोष का आश्रय लेना चाहिए, जो संतोष से उत्पन्न अमृत को पीकर भोग तृष्णा को छोड़ते हैं वे गृहस्थ मुनि तुल्य होते हैं।
संतोष
अपनी स्त्री, भोजन और धन इन तीनों में संतोष करना चाहिए परन्तु स्वाध्याय, तप और दान इन तीनों में संतोष नहीं करना चाहिए।
संतोष
अगर आप संतुष्ट हैं तो आजाद रहेंगे क्योंकि आजादी ही संतुष्टि का फल है।
संतोष
अगर आप संतुष्ट हैं तो आपकी गिनती दुनिया के सबसे अमीर लोगों में होगी।
संतोष