Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Anger & Forgiveness

क्षमा

455 सूत्र · पृष्ठ 6 / 7

क्षमा शोभती उस भुजङ्ग को जिसके पास गरल है। न कि उसे जो दन्त हीन, विषहीन, विनीत सरल है ॥10॥
क्षमा
दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे। साम्य भाव रक्खूँ में उन पर ऐसी परिणति हो जावे ॥11॥
क्षमा
क्रोध तुल्य रिपु कौन जो, कर दे सर्व विनाश। हर्ष तथा आनन्द का, वह है यम का पाश ॥12॥
क्षमा
इच्छायें उसकी सभी, फलें सदा भरपूर। जिसने अपने चित्त से, कोप किया अति दूर ॥13॥
क्षमा
बैर की भावनाओं का संहार कर, मित्रता के लिये मित्रवत व्यवहारकर। चाहता है अगर तू सरल जिन्दगी, तो सरल से सरल अपना व्यवहार कर ॥14॥
क्षमा
तुम्हारी शान घट जाती कि रूतबा घट गया होता। जो गुस्से में कहा तुमने, वो हँसकर के कहा होता ॥15॥
क्षमा
जिसके हाथ मे क्षमा रूपी शस्त्र है, उसका दुर्जन क्या करेगा क्योंकि तृणहीन स्थान में गिरी अग्नि स्वयं शान्त हो जाएगी।
क्षमा
शरीर मे सामर्थ्य न होने से चिरकाल तक तपश्चरण नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं, किन्तु मन से वश में करने योग्य जो कषाय रूपी शत्रु हैं, अगर उन्हे वश मे नहीं करते हो तो ये तुम्हारी अज्ञानता है।
क्षमा
पत्थर के टूटने पर जिस प्रकार फिर नहीं जुड़ता है, उसी प्रकार जिसका बैर(क्रोध) संख्यात, असंख्यात व अनन्त भव तक रहता है वह नरक गति में जाता है, पृथ्वी की दरार के समान जिसका बैर(क्रोध) है अर्थात् छह माह से अधिक बैर रहता है वह पशु गति मे जाता है, धूल पर बनी रेखा के समान जिसका बैर(क्रोध) होता है अर्थात् पन्द्रह दिन मे जिसका बैर मिट जाता है, वह मनुष्य गति को प्राप्त होता है और जल पर फेरी हुई रेखा के समान अन्तर्मुहूर्त जिसका क्रोध होता है वह देव गति में जाता है।
क्षमा
मनुष्य का आभूषण रूप है, रूप का आभूषण गुण है, गुणों का आभूषण ज्ञान है और ज्ञान का आभूषण क्षमा है।
क्षमा
हे भगवन ! आपने क्रोध को नौवे गुणस्थान में नष्ट कर दिया तब घातिया कर्मों को विना क्रोध के कैसे नष्ट किया अथवा समझ में आ गया क्या ठण्डी तुषार हरे भरे वनों को नष्ट नहीं कर देती है ?
क्षमा
शरीर की स्थिति के लिए साधु श्रावक के यहाँ आहार लेने जाते हैं, दुष्टजन उन पर क्रोध करते हैं, हँसते हैं, प्रताड़ित करते हैं फिर भी उनके मन में कलुषता उत्पन्न नहीं होती है उसे क्षमा कहते हैं।
क्षमा
क्रोध के समान पाप व शत्रु दूसरा नहीं है, क्रोध समस्त अनर्थों का मूल है इसलिए छोड़ देना चाहिये।
क्षमा
बार-बार तपाये जाने पर भी सोना अपने दिव्य वर्ण को नहीं छोड़ता, बार-बार घिसे जाने पर भी चन्दन अपनी सुगन्ध नहीं छोड़ता, टुकड़े-टुकड़े किए जाने पर भी गन्ना अपनी मिठास नहीं छोड़ता उसी प्रकार प्राणान्त होने पर भी उत्तम पुरुष अपने क्षमा स्वभाव को नहीं छोड़ते हैं।
क्षमा
मैंने पहले विवेक पूर्वक जिस समता का अभ्यास किया है उसकी परीक्षा के लिए ये विरोधी आज उपस्थित हुये हैं, अगर समता की मर्यादा का उल्लङ्घन करके शत्रु पर क्रोध करता हूँ तो मेरे ज्ञान रूपी नेत्र का उपयोग कब होगा ?
क्षमा
प्राणान्त उपस्थित होने पर भी आत्महित के लिए ज्ञानीजनों ने उसका क्षमा ही प्रतिकार बतलाया है।
क्षमा
कुल्हाड़ी और चन्दन में समता रखकर के ही प्राचीन मुनियों ने सिद्धि प्राप्त की है।
क्षमा
जो नरक से मुझको निकालकर स्वयं अपने को नरक में डाल रहा है तो कौन बुद्धिमान उपसर्ग आदि का प्रतिकार करेगा ?
क्षमा
अगर अपकार करने वाले पर क्रोध किया जाता है तो जीव के धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, और जीवन को नष्ट करने वाले अपकारी क्रोध के ऊपर ही क्रोध करना चाहिए।
क्षमा
कर्म से पीड़ित मुझको कोई मेरे दोषों की चिकित्सा करके मुझे स्वस्थ करता है वह मेरा सच्चा मित्र है, उससे शत्रुता कैसी ?
क्षमा
अपने पुण्य को नष्ट करके अगर कोई मेरे दोषों को नष्ट करता है उस पर भी मैं अगर क्रोध करूँ तो मेरे से अधम और कौन होगा ?
क्षमा
किसान का प्रतिशोध- किसान अपनी पत्नि को पीटना चाहता था, लेकिन वह बहुत चतुर थी, उसने अपने जीवन में ऐसा काम नहीं किया जिससे उसको कोई पीट सके, किसान ने एक दिन उसको पीटने के उद्देश्य से खेत में हल चलाते समय पत्नि को आते देख कर हल में बैल उल्टे नह दिये, उसने सोचा ऐसा देखकर पत्नि कुछ कहेगी तभी मैं उसको पीट दूँगा, लेकिन पत्नि ने चुप-चाप नास्ता दिया और घर की ओर चली गई, पूँछने पर बोली कि चाहे आप उल्टा नहो या सीधा खेत जोतना आपको है मेरा काम नास्ता देना है, पति देखता रह गया।
क्षमा
दुकानदार की क्षमा- शैतान लड़के ने दुकानदार से साड़ी की कीमत पूँछी, सौ रुपए बताया, साड़ी को बीच में से फाड़ दिया और पूछा आधी साड़ी कितने की ? दुकानदार ने कहा पचास रुपये की, इस प्रकार साड़ी के टुकड़े-टुकड़े कर कहा यह साड़ी हमारे काम की नहीं है और साड़ी की कीमत दिये विना जाने लगा तो दुकानदार ने कहा साड़ी तो पुनः बन सकती है, किन्तु जीवन बिगड़ गया तो फिर नहीं बनेगा तो उसने चरणों में गिरकर क्षमा मांगी।
क्षमा
चिरोञ्जाबाई का क्रोध- चिरोञ्जाबाई की ननद से कोई गलती हो गई, यह देखकर बाईजी को बहुत गुस्सा आया, उन्होंने उनका शिर पकड़ कर दीवाल से दे मारा लेकिन पीछे हाथ लगा लिया कहीं शिर में चोट न लग जाए।
क्षमा
महावीरस्वामी पर उपसर्ग- महावीर भगवान् दीक्षा के बाद विहार करते हुये उज्जयिनी नगरी पँहुचे और वृक्ष के नीचे बैठकर तप करने लगे, वहाँ के लोगों ने समझा कि ये यहाँ की भूमि पर अधिकार करने आयें है, इसलिये लोगों ने उन पर घोर उपसर्ग किया, लेकिन उन्होंने अपने क्षमा भाव को नहीं त्यागा और केवलज्ञान को प्राप्त किया।
क्षमा
गाँधी जी को गाली-एक अंग्रेज गाँधी जी से बहुत चिढ़ता था, उसने एक कागज में गाँधी जी के लिए गालियाँ लिखीं और गाँधी जी की टेबल पर रखकर चला गया, गाँधी जी ने जब खोला तो गुस्सा न करके, उसका पिन निकाल कर डिब्बे में रख लिया, और कागज को रद्दी की टोकरी में डाल दिया।
क्षमा
बनारसीदास जी ने रास्ते में पेशाब करदी चौकीदार ने दो-तीन थप्पड़ मार दिये अगले दिन उन्होंने नौकर की ईमानदारी की प्रशंसा करके उसका वेतन बढ़वा दिया।
क्षमा
पार्श्वनाथ जी- कमठ का जीव पूर्व अवस्था में पार्श्वनाथ का भाई था, लेकिन क्षमा के अभाव में दस भव तक घोर उपसर्ग करता रहा, किन्तु पार्श्वनाथ जी ने क्षमा को नहीं छोड़ा और केवलज्ञान को प्राप्त किया था।
क्षमा
ईसामसीह को शूली- जब निरपराध ईसामसीह को लोगों ने शूली पर चढ़ाया तब उन्होंने कहा कि हे भगवन् ! ये अज्ञानि प्राणी नहीं समझते कि हम क्या कर रहे हैं और इसका फल क्या होगा? हे भगवन् ! इनका अपराध क्षमा हो।
क्षमा
सौ बार गङ्गा स्नान- एक व्यक्ति का प्रतिदिन गङ्गा स्नान करने का नियम था, उसके क्षमा भाव और त्यागादि की बहुत चर्चा थी, उस नगर के पहलवान ने उस व्यक्ति की परीक्षा लेनी चाही, पहलवान का घर गङ्गा के रास्ते में था, व्यक्ति गङ्गा स्नान करके लौट रहा था, तब पहलवान ने उसके ऊपर पान का पीक थूक दिया, व्यक्ति विना कुछ कहे गङ्गा स्नान करने चला गया, पुन स्नान करके लौटा तो फिर थूक दिया, यह क्रम सौ बार चला, एक सौ एक वी बार व्यक्ति स्नान करके लौटा तब पहलवान उसके चरणों में गिरकर रोने लगा, अपनी गलती की क्षमा माँगी, व्यक्ति ने कहा ! भाई मैं तो आपका उपकार मानता हूँ, कि प्रतिदिन एक बार स्नान करता था आज आपकी वजह से एक सौ एक बार स्नान का अवसर मिला, अभी तक तन धोया था अब क्रोध न आने से मन भी धुल गया है।
क्षमा
उद्दण्ड बालक पर क्षमा-एक सेठ ने पाठशाला खुलवाई, उसमें एक बालक बहुत उद्दण्ड था, प्रतिदिन विद्यालय में कुछ न कुछ तोड़-फोड़ करता रहता था, शिक्षक ने सेठ जी से कहा, कि मैं इस बालक को नहीं पढ़ाऊँगा, सेठजी उस बालक को घरले गये, वह ऊधम करता सेठजी शान्ति से सहन कर लेते, काँच, प्लास्टिक मिट्टी आदि के बर्तनों को तोड़ता सेठजी कुछ न कहते, एक दिन सेठजी की घड़ी फोड़ दी तब भी सेठजी ने कुछ नहीं कहा, अबकी बार बालक को स्वयं पश्चात्ताप हुआ सेठजी से क्षमा माँगी आगे चलकर वह बहुत बड़ा विद्वान बन गया था।
क्षमा
पण्डित टोडरमल जी की क्षमा- किसी शरारती ने पण्डितजी के पास एक पागल व्यक्ति लाकर खड़ा कर दिया और कहा कि ये आपके साढू भाई आये हैं, पण्डितजी उसे देखकर कुपित नहीं हुये बल्कि उन्होंने स्वीकार कर लिया, अपने पास रख लिया एक दिन उस व्यक्ति ने देखा कि पण्डितजी उसकी अच्छी सेवाकर रहे हैं वास्तव में ये इनके साढू हैं क्या ? पण्डितजी से पूछा तो उन्होंने कहा कि हाँ, एक माँ की दो बेटियां थीं एक साता और दूसरी असाता उनमें से हमारी शादी साता से हो गई और इनकी शादी असाता से हो गई इसलिऐये हमारे साढू ही तो हैं।
क्षमा
अभी तक गरजती थी-पण्डित गोपालदास जी की धर्मपत्नी ने उनका अनेक बार अपमान किया किन्तु पं. जी ने समता नहीं त्यागी, एक रात्रि को पण्डितजी घर आये, पत्नी ने दरवाजे नहीं खोले, कुछ देर बाद गुस्से में उठी और जनवरी माह की ठण्ड में छत से ही एक घड़ा ठण्डा पानी पण्डितजी के ऊपर डाल दिया, पण्डितजी बोले, हे देवि अभी तक तो तू गरजती थी, पर बरसी आज ही है।
क्षमा
सर्प की क्षमा-एक सर्प ने मुनिराज से नियम ले लिया कि अब हम किसी को नहीं काटेगें, लोग उसको सताने लगे, वह महाराज के पास नियम वापिस करने गया तब महाराज ने कहा तुम्हे काटना छुड़ाया है फुड्ढारना नहीं।
क्षमा
द्रोपदि की क्षमा- महाभारत के समय द्रोपदि के पाँचों बेटों को अश्वत्थामा ने मार डाला द्रोपदि शोक सागर में मग्न थी तभी अर्जुन अश्वत्थामा को युद्ध से पकड़ कर द्रोपदि के सामने खड़े कर देते हैं, भीम बोले इसके टुकड़े-टुकड़े करके कौओं को खिला दो तब द्रोपदि ने कहा इसकी माँ को भी इतना ही कष्ट होगा जितना मुझे हो रहा है, इसलिए इसको छोड़ दो।
क्षमा
गुरूजी ने कौरव-पाण्डव को क्रोध त्याग का पाठ याद करने को दिया, सबने याद करके सुना दिया युधिष्ठिर को याद नहीं हुआ, चार-पाँच दिन बाद गुरुजी ने पूँछा पाठ याद हो गया ? युधिष्ठिर ने कहा नहीं, गुरुजी ने पिटाई कर दी, जब क्रोध नहीं आया तब बोले अब याद हो गया, युधिष्ठिर ने सोचा यह पाठ आचरण में लाने का है, रटने का नहीं है।
क्षमा
अभिनन्दन आदि पाँच सौ मुनियों की क्षमा- दण्डक राजा ने कारण जाने विना रानी के कहने से मुनियों को पाखण्डी जानकर घानी में पेल दिया, लेकिन मुनियों ने क्षमा भाव धारण कर आत्म कल्याण किया था।
क्षमा
तुंकारी की क्षमा- राजा की लड़की को कोई तू करके नहीं बोल सकता था, उसका घर में तो निर्वाह हो गया, लेकिन उसकी ऐसी तीव्र कषाय देखकर कोई शादी करने को तैयार नहीं होता था, बड़ी मुश्किल से एक राजकुमार को तैयार किया कि आप मेरी लड़की से कभी तू करके नहीं पुकारना, शादी हो गयी। अचानक एक दिन उस लड़के ने भूल से तू बोल दिया वह इतनी कुपित हुयी कि घर छोड़कर चली गयी। जङ्गल में अकेली जा रही थी भीलों ने उसे पकड़ लिया बहुत कष्ट दिया, शील से गिराने की कोशिश की लेकिन वह अपने में अडिग रहीं, अन्त में भीलों ने उसे एक कपड़ा रङ्गने वाले को बेच दी, वहाँ भी भयङ्कर कष्ट उठाने पड़े वह तुंकारी के माथे से खून निकालता और कपड़े रङ्गता था लेकिन थोड़ी देरमें जड़ी बूटी लगाकर घाव भर देता था। ऐसे कष्टों को सहन करने से अब जीवन में क्षमा गुण आ गया। एक नगर में श्मशान घाट पर मुनि तप कर रहे थे, एक तन्त्र वादी वहाँ आया और उसने मुर्दे इकट्रे किये चूल्हा बनाया, उसे ये नजर नहीं आया कि ये मुनिराज ध्यान मग्न हैं, उसने आग लगाकर कढ़ाही रखी मुनि सहन करते रहे, लेकिन बीचमें शरीर वेदना से हिल गया, कढ़ाही गिर गई उसने सोचा यहाँ कोई भूत आ गया, डर कर भाग गया। मुनि वहीं पड़े रहे, प्रातः काल एक सेठ उस ओर अपने कार्य से आया मुनि की ऐसी अवस्था देख घबराया, अपने घर ले गया इलाज किया, वैद्य ने लाक्षादि तैल लगाने को कहा और वह तुङ्कारी के यहाँ मिलेगा लेने गया भाग्य से सात घड़े तैल के सेठ से फूट गये लेकिन उसने क्रोध नहीं किया, सेठ ने उससे इसका राज पूँछा तब तुङ्कारी ने अपनी सारी कहानी बतायी।
क्षमा
आचार्य शान्तिसागर जी पर उपसर्ग- एक बार धौलपुर नगर में आचार्य श्री का सङ्घ आया तो आचार्य श्री को भावी दुर्घटना का पूर्वाभास हो गया था, अतः उन्होंने पूरे सङ्घ को अन्दर सामायिक करने का आदेश दिया, उपसर्ग करने वाले आये और बाहर ही घेर कर बैठ गये, जैन बन्धुओं ने राजा से शिकायत की तो राजा ने दुष्टों को गिरफ्तार करके कहा की आचार्य महाराज जो सजा कहेंगे वही सजा इन्हें दी जाएगी, महाराज ने तीन बार वचन लिया कि 'जो हम कहेंगे वही सजा दोगे'? राजा ने कहा कि जो आप कहेंगे वही सजा दी जाएगी, तब आचार्य श्री ने कहा कि इन्हें छोड़ दो, तब वे उपसर्ग करने वाले महाराज के चरणों में गिर कर क्षमा माँगने लगे, महाराज ने कहा हम अपराधी को नहीं अपराध को समाप्त करते हैं, अपराधियों ने प्रण किया कि ऐसी गलती अब हम कभी नहीं करेंगे।
क्षमा
दुर्जन, क्रूर, कुमार्ग रतों पर-दुर्जन- जयद्रथ ने कषाय के वश पाण्डवों को लोह मयी गर्म आभूषण पहनाये पर पाण्डवों ने क्षमा धारण की और तीन पाण्डव मोक्ष पधारे और दो सर्वार्थसिद्धि गये। क्रूर- स्यालनी ने सुकोशल मुनि को खाया मुनि ने क्षमा धारण की और सर्वार्थसिद्धि गये। कुमार्गरत- भगवान् आदिनाथ के समय चार हजार मुनि भ्रष्ट हो गये, पर आदिनाथ भगवान् ने मौन नहीं तोड़ा और समता रस के स्वादी बने रहे।
क्षमा
क्रोधी व्यक्ति कमठ के मठ में पहुँचता है और बैर का विकास करता है, संसार की लम्बी यात्रा करता है और क्षमावान पार्श्वनाथ के पार्श्व में विराजता है चिर, विश्राम और अपूर्व आनन्द पाता है।
क्षमा
मान पत्र को सब हर्ष से लेते हैं और क्रोध पत्र को कोई नहीं लेना चाहता है जबकि दोनों कषायों के भेद ही हैं।
क्षमा
प्राणी कर्मों से कम कषायों से ज्यादा दुःखी होता है, अतः सुखी होने के लिए कषाय नहीं करनी चाहिए।
क्षमा
निमित्त मिलने पर भी जो क्रोधादि नहीं करता है, वह गुणों में अधिक होने से गुणियों का भी गुरू है।
क्षमा
क्रोध प्रीति का, मान विनय का, माया मित्रता का और लोभ सबका विनाश कर देता है।
क्षमा
मौन पूर्वक दुर्व्यवहार सहने से विरोधी का हृदय परिवर्तित हो जाता हैं।
क्षमा
गाली आवत एक है, जावत होत अनेक। जो गाली फेरे नहीं, रहे एक की एक।।
क्षमा
मौन द्वारा क्रोध के क्षणों को टालकर शान्ति के क्षणों में समस्या का सही समाधान खोजा जा सकता है।
क्षमा
कषाय जितनी तीव्र होती है व्यक्ति उतने जल्दी विचलित होता है।
क्षमा
मासोपवासी मुनि कंस बना– राजा उग्रसेन धर्मात्मा पुरूष थे, एक दिन उनके नगर में एक मासोपवासी मुनिराज का आगमन हुआ, राजा ने नगर में घोषणा करा दी कि मुनि का आहार राज महल में होगा, कोई साधु का पड़गाहन न करे, जब साधु चर्या को आये तब राजा के यहाँ पहली बार दासी का उपद्रव हो गया, साधु वापस चले गये और एक माह का पुनः उपवास ले लिया, पुनः साधु आये तो राजा ने वही घोषणा करायी, दूसरी बार नगर में हाथी का उपद्रव हो गया, पड़गाहन नहीं हो सका, साधु ने पुनः एक माह का उपवास किया, तीसरी बार साधु आये, तो उस समय नगर में आग लग गयी, इस प्रकार चार माह के उपवास हो गये। साधु बगीचे में ध्यान कर रहे थे, वहाँ से लोग निकले और चर्चा करने लगे कि ये राजा कितना दुष्ट है न स्वयं आहार देता है और न ही दूसरों को देने देता है। ये शब्द सुनकर साधु की कषाय भड़क गयी, निदान कर लिया कि अगले भव में मैं इसका बेटा बनूँ, मुनिराज संक्लेश परिणामों से मरे और उसी राजा की रानी के गर्भ में आये, तब रानी को ये भाव हुआ कि राजा के पेट को चीर कर खून पी लूँ, वे मुनि कंस बने और पिता को कारागार में डालकर यातनाएँ दीं।
क्षमा
जो व्यक्ति कषाय रूपी शत्रुओं को जीतता है, दूसरों के दुर्वचन सहन करता है, अन्य साधर्मी के द्वारा किये गये अनादर और देव आदि द्वारा किये गये उपसर्गों को सहता है उसकी बहुत निर्जरा होती है।
क्षमा
अगर क्रोधादिक क्षीण हो गए हैं, तो तपस्या के द्वारा खेदखिन्न होने की आवश्यकता नहीं है और अगर क्रोधादिक हैं तो केवल तपस्या से कल्याण नहींहोगा।
क्षमा
क्षमा का अर्थ है भूलों पर ध्यान न देना।
क्षमा
अन्धे के हाथ में लेम्प- किसी ने अन्धे को धक्का मार दिया, उसका घड़ा फूट गया, फिर भी उसी को डाँटते हैं, क्यों अन्धे हो दिखता नहीं ? अन्धे ने जबाब दिया जी नहीं दिखता, दूसरे दिन अन्धा हाथ में लेम्प लेकर पानी भरने जा रहा था, वही व्यक्ति उसको फिर मिला, पूछा ! आप कल कह रहे थे, हम अन्धे हैं फिर आपने लेम्प क्यों ले रखा है ? उसने जबाब दिया आप जैसे आँखों वालों को राह दिखाने के लिये, सज्जन पुरूषों का कितना भी नुकसान हो जाये वे क्रोधित नहीं होते हैं।
क्षमा
क्षमा का अर्थ है गुणों की ओर दृष्टि रखना एवं सबकी आत्मा को समान समझना।
क्षमा
भटके हुए को शाम तक इष्टमार्ग पर लौटने का अवसर ही क्षमा है।
क्षमा
अन्तः करण की उदारता का नाम क्षमा है।
क्षमा
सामाजिक क्षमा- समाज के दबाव वश अपराधी को क्षमा करना।
क्षमा
पारिवारिक क्षमा- परिवार में सन्तुलन और शान्ति बनाने के लिए अपराध को क्षमा करना।
क्षमा
कौटुम्बिक क्षमा- पारिवारिक सम्बन्ध बिगड़ न जाए, अतः सम्बन्ध कायम रखने के लिए क्षमा करना।
क्षमा
राष्ट्रीय क्षमा- देश के उत्थान के लिए महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के अपराध क्षमा करना।
क्षमा
व्यवहारिक क्षमा- लोक व्यवहार के लिए क्षमा करना, जैसे किसी ने आपको धक्का मार दिया, आपने कहा दिखता नहीं, उसने क्षमा माँग ली, आप चुप हो गये, यह व्यवहारिक क्षमा है।
क्षमा
किसी ने निमन्त्रण दिया आप नही पहुँचे, वह मिला थोड़ा क्रोध का अभिनय किया, क्षमा मांग ली।
क्षमा
मैं सब जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें, मेरी सभी से मित्रता है किसी से भी बैर नहीं है।
क्षमा
बेटे ने पिता जी से पूँछा, आज क्या है? पिताजी बोले क्षमावाणी है, पिता जी यह क्या होता है ? बेटा ! जो क्रोध करता है, वह नरक जाता है। बेटे ने पापा की जेब से चुपके से पाँच रूपये निकाल लिये। पिता क्रोधित होकर पूँछने लगे, किसने निकाले ? बेटा ने कहा पापा आपकी क्षमावाणी बड़ी सस्ती है, पाँच रुपये में बिक गयी। ''हम को सीख लेना चाहिए कि पैसों की नहीं धर्म की कीमत है।''
क्षमा
राजा मधु की क्षमा- शत्रुघ्न को मथुरा का राज लेने के लिये राजामधु से घमासान युद्ध करना पड़ा, जब मधु का शरीर वाणों से जर-जर हो गया, तो हाथी पर बैठे-बैठे सब परिग्रह का त्याग कर मुनि बन गए, शत्रुघ्न को मालूम हुआ तो क्षमा माँगी, नमस्कार किया, राजा ने कृतज्ञता ज्ञापित की कि आपने बहुत उपकार किया कल्याण का अवसर दिया।
क्षमा
नाम अशान्ति सागर- एक व्यक्ति अपनी स्त्री से बार-बार कहता है मैं दीक्षा ले लूँगा, लेकिन लोग उसे लौटा लाते, इस बार किसी ने नहीं रोका, दीक्षा ले ली, नाम शान्तिसागर हो गया, किसी लड़के ने नाम पूँछा, बता दिया, दो-तीन बार पूँछने आया तो गुस्से में बोले अब नहीं आना, नहीं तो पीटूँगा, उसने नाम बदल दिया शान्ति नहीं अशान्ति सागर हैं आप।
क्षमा
एक सज्जन ने स्वाध्याय का नियम ले लिया, दीवाली की सफाई में चौका, लेम्प, शास्त्र कहीं रख कर भूल गया, नहीं मिलने पर, डण्डा उठाकर सबको पीटना शुरू कर दिया, अतः स्वाध्याय ऐसा करें कि शास्त्र कहीं शस्त्र न बनें।
क्षमा
वज्रकर्ण का नियम- एक बार वज्रकर्ण ने मुनि महाराज से नियम लिया कि मैं देव-शास्त्र-गुरु के अलावा किसी को नमस्कार नहीं करूँगा, जब वह अपने स्वामी सिंहोदर के सामने जाता था तो अपनी अङ्गूठी में मुनिसुव्रतनाथ भगवान् के चित्र को नमस्कार करता था, एक बार किसी ने सिंहोदर राजा से शिकायत कर दी, कि वज्रकर्ण आपको नमस्कार नहीं करता है, तो सिंहोदर ने आदेश दे दिया कि ! वज्रकर्ण का सर्वस्व हरण करके बन्दी बना लो, इसी समय राम-लक्ष्मण-सीता वहाँ पहुँचते हैं, लक्ष्मण को भोजन के लिए आया जानकर वज्रकर्ण ने तीनों को स्वादिष्ट भोजन कराया, रामचन्द्रजी लक्ष्मण से कहते हैं ! 'ऐसा भोजन तो कोई अपने जमाई को भी नहीं करायेगा', अतः इस धर्मात्मा की विपत्ति दूर करना चाहिए, लक्ष्मण जाकर सिंहोदर को बन्दी बना लाते हैं, वज्रकर्ण से पूँछते हैं कि इसको क्या सजा दी जाय ? तब वज्रकर्ण कहता है की ये हमारे स्वामी हैं, इनको क्षमा कर दीजिये, सिंहोदर ने क्षमा से प्रभावित होकर आधा राज्य वज्रकर्ण को दे दिया।
क्षमा
बाली ने रावण को गृहस्थ अवस्था में क्षमा किया और मुनि अवस्था में कैलाश पर्वत पर भी क्षमा किया था।
क्षमा
धवल सेठ ने श्रीपाल जी को समुद्र में गिरा दिया, उनकी पत्नी रयणमञ्जूषा से बलात्कार करना चाहा, श्रीपाल जी को भाण्ड सिद्ध करने की भी कोशिश की, फाँसी लगने की नौवत आ गयी, इसके बाद भी राजा से कहा कि ये हमारे धर्म पिता हैं, इन्हें फाँसी पर न चढ़ाया जाये और धर्मात्मा श्रीपाल जी ने पाँच सौ लोगों के साथ धवलसेठ का निमन्त्रण किया, अपने हाथ से पड्डा झुलाते हुए खीर-पुड़ी का भोजन कराने लगे, सेठ को अत्यधिक पश्चात्ताप व आत्मग्लानी हुयी और हृदयाघात से मरण को प्राप्त हो गया था।
क्षमा
दस लक्षण पर्व के तत्काल बाद मनाया जाने वाला क्षमावाणी पर्व एक ऐसा महापर्व है जिसमें हम बैरभाव को छोड़कर एक दूसरे से क्षमा याचना करते हैं, इसे क्षमापना भी कहते हैं, मन के मैल को धो डालने वाला यह पर्व आज मात्र शिष्टाचार बन कर रह गया है, यह बात नहीं कि इसे हम बड़े उत्साह से न मनाते हों, आज न हम इससे उदास हुये हैं तथा मात्र उत्साह से ही नही, अति उत्साह से मनाते हैं, इस अवसर पर सारे भारत वर्ष में लाखों रूपयों के कार्ड छपाये जाते हैं, उन्हें चित्रित सुन्दर लिफाफों में रखकर हम इष्ट मित्रों को भेजते हैं, लोगों से गले लगकर मिलते हैं, क्षमा याचना भी करते हैं, पर यह सब यन्त्रवत् चलता है, हमारे चेहरे पर मुस्कान भी होती है पर बनावटी, हमारी असलियत न मालूम कहाँ खो गयी है? क्षमा याचना जो कि बिल्कुल व्यक्तिगत चीज थी, वह आज बजारू बन गयी है, वास्तविक क्षमावाणी तो यह होना चाहिए कि अपनी गलतियों का उल्लेख करते हुए विनय पूर्वक आमने-सामने या पत्र द्वारा शुद्ध हृदय से क्षमा याचना करें एवं पवित्र भाव से दूसरों को क्षमा करें अर्थात् क्षमा भाव धारण करें, इस प्रकार जब हमारा हृदय दश धर्मों की आराधना से क्षमा भाव से आकण्ठ आपूरित हो उठे और वाणी में भी छलकने लगे, तब वस्तुतः क्षमावाणी होती है।
क्षमा
अग्नि में चार कषाय- क्रोध के कारण जला देती है, मान के कारण ऊपर जाती है, माया के कारण राख में छिपी रहती है, लोभ के कारण ईधन से तृप्त नहीं होती है।
क्षमा
वचनों की शक्ति- गुस्सा आने पर शान्तस्वभावोऽहम्, शान्तस्वभावोऽहम्, शान्तस्वभावोऽहं ऐसा चिन्तन करने से गुस्सा शान्त हो जाता है।
क्षमा
कषाय करने से नरक निगोद के छाले पड़ते हैं, जैसे रेत मथने से मक्खन नहीं निकलता उल्टा हाथों में छाले पड़ते है।
क्षमा