Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
क्षमा

यः श्वभ्रान्मां समाकृष्य, क्षिपत्यात्मानमस्तधीः। वधबन्धनिमित्तेऽपि, कस्तस्मै विप्रियं चरेत् ॥16॥

जो नरक से मुझको निकालकर स्वयं अपने को नरक में डाल रहा है तो कौन बुद्धिमान उपसर्ग आदि का प्रतिकार करेगा ?

One who pulls me out of hell while casting himself into it — what wise person would retaliate against him for the afflictions he causes?

— आराध्य सूत्र · #104

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कोई भी प्राणी तुम्हारे द्वारा तिरस्कार के योग्य नहीं है, ये तो सब स्वतन्त्र पदार्थ हैं, इनसे तेरा सम्बन्ध क्या है? अपने क्रोध–मान–माया–लोभ का तिरस्कार तेजी से करो, इन्हीं कषायों ने तुझे भटका रखा है और दुःखी कर रखा है।
क्षमा