यद् यद् कुरुते कोऽपि, मांस्वस्थं कर्म पीड़ितं। चिकित्सित्वा स्फुटं दोषम्, स एवाकृत्रिमः सुहृत् ॥19॥
कर्म से पीड़ित मुझको कोई मेरे दोषों की चिकित्सा करके मुझे स्वस्थ करता है वह मेरा सच्चा मित्र है, उससे शत्रुता कैसी ?
One who treats my faults and restores me to health, when I am afflicted by karma, is my true friend; how can there be enmity toward him?
— आराध्य सूत्र · #107
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