Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
क्षमा

यद् यद् कुरुते कोऽपि, मांस्वस्थं कर्म पीड़ितं। चिकित्सित्वा स्फुटं दोषम्, स एवाकृत्रिमः सुहृत् ॥19॥

कर्म से पीड़ित मुझको कोई मेरे दोषों की चिकित्सा करके मुझे स्वस्थ करता है वह मेरा सच्चा मित्र है, उससे शत्रुता कैसी ?

One who treats my faults and restores me to health, when I am afflicted by karma, is my true friend; how can there be enmity toward him?

— आराध्य सूत्र · #107

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कोई भी प्राणी तुम्हारे द्वारा तिरस्कार के योग्य नहीं है, ये तो सब स्वतन्त्र पदार्थ हैं, इनसे तेरा सम्बन्ध क्या है? अपने क्रोध–मान–माया–लोभ का तिरस्कार तेजी से करो, इन्हीं कषायों ने तुझे भटका रखा है और दुःखी कर रखा है।
क्षमा