Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
क्षमा

यः शमः प्राक् समभ्यस्तो, विवेकज्ञानपूर्वकः। तस्मै तेऽद्य परीक्षार्थम्, प्रत्यनीकाः सुमुत्थिताः ॥12॥ यदि प्रशम मर्यादां भित्वा रुष्यामि शत्रवे। उपयोगः कदास्य स्यात्, तदा मे ज्ञानचक्षुषा ॥13॥

मैंने पहले विवेक पूर्वक जिस समता का अभ्यास किया है उसकी परीक्षा के लिए ये विरोधी आज उपस्थित हुये हैं, अगर समता की मर्यादा का उल्लङ्घन करके शत्रु पर क्रोध करता हूँ तो मेरे ज्ञान रूपी नेत्र का उपयोग कब होगा ?

These adversaries have appeared today to test the equanimity I earlier practised with discernment; if I break the bounds of that equanimity and rage at the enemy, then when will my eye of knowledge ever be put to use?

— आराध्य सूत्र · #101

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कोई भी प्राणी तुम्हारे द्वारा तिरस्कार के योग्य नहीं है, ये तो सब स्वतन्त्र पदार्थ हैं, इनसे तेरा सम्बन्ध क्या है? अपने क्रोध–मान–माया–लोभ का तिरस्कार तेजी से करो, इन्हीं कषायों ने तुझे भटका रखा है और दुःखी कर रखा है।
क्षमा