Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Anger & Forgiveness

क्षमा

455 सूत्र · पृष्ठ 5 / 7

दण्ड में उल्लास है पर शान्ति नहीं, क्षमा में शान्ति और आनन्द है, एवं यश भी मिलता है।
क्षमा
करोड़ो बार आत्मध्यान और एक बार क्रोध के समय क्षमा का बराबर फल है।
क्षमा
जैसे प्रकाश, पवन, पानी, आकाश, सभी के लिए हैं, उसी प्रकार क्षमा धर्म सबको सुखी करता है।
क्षमा
विद्युच्चर मुनि की क्षमा- उग्र तप के धारी विद्युच्चर नामक मुनिराज को चामुण्डा नामक व्यन्तरी ने घोर उपसर्ग किया, उस उपसर्ग को समता से सहनकर मोक्ष को प्राप्त हुए हैं।
क्षमा
क्रोध छोड़ने के लिए सभी लोगों को यह अवधारणा पक्की करनी चाहिए, कि मुझमें यह एक बड़ा दोष है।
क्षमा
इसका कारण या हेतु मैं स्वयं हूँ, अन्य किसी का दोष मुझे विचलित नहीं कर सकता है।
क्षमा
अत: 'हर हाल में छोड़ना है' ऐसा लक्ष्य बनाना चाहिए।
क्षमा
क्रोध को छोड़ना मुश्किल है, क्योंकि लोग लम्बे समय से पाले हुए हैं।
क्षमा
पर क्रोध छोड़ना असम्भव नहीं है, सङ्कल्प एवं अभ्यास से क्रोध पर काबू पाया जा सकता है।
क्षमा
जिस प्रकार परीक्षा पास करने, मकान बनाने, गृहस्थी चलाने, बच्चों को पढ़ाने, शादी करने आदि के लिए प्रयत्न करना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार क्रोध छोड़ने के लक्ष्य के प्रति हर पल सावधान रहना चाहिए।
क्षमा
इसके लिए रह-रह कर प्रतिज्ञा करनी होगी, कि 'क्रोध नहीं करूँगा'।
क्षमा
थोड़ा अङ्कुश लगने पर एक घण्टे, दो घण्टे या तीन घण्टे के लिए प्रयत्न करें।
क्षमा
चिलाती मुनि- चिलाती मुनि ने पूर्व अवस्था में एक कन्या को विवाह मण्डप से हरण किया, तो राजा श्रेणिक के सेनिकों ने उसका पीछा किया, अन्त में चिलाती ने उस कन्या की गर्दन काटकर फेंक दी, वह कन्या मरकर व्यन्तरी हुई, चिलाती मुनि बनकर तप करने लगे, तब व्यन्तरी ने चिलाती मुनि की आँखें फोड़ दी, उन्होंने समता पूर्वक इस उपसर्ग को सहन किया व सर्वार्थसिद्धि को प्राप्त हुये।
क्षमा
एक दिन, दो दिनों की अवधि के लिए प्रतिज्ञा कीजिए।
क्षमा
याद दिलाने वाले छोटों को पारितोषिक और बड़ों को धन्यवाद दें एवं सदैव मुस्कराते रहें।
क्षमा
उन्हें कहिए कि वे क्रोध आने पर क्रोध नहीं करने की प्रतिज्ञा को याद दिलायें।
क्षमा
विश्वास रखें क्रोध को छोड़ने के लिए अपने परिजनों, निकट सहयोगियों की मदद लीजिए।
क्षमा
धीरे-धीरे क्रोध पर विजय पाने में आप सफल हो जायेंगे।
क्षमा
प्राणायाम से, स्थान छोड़ देने से, एकान्त में जाकर क्रोध के कारण भूलने से और श्वाँस से, कषाय रूपी धुआँ को निकालने से क्रोध शान्त होता है।
क्षमा
क्रोध में जबाव नहीं देना, क्रोध के समय की फोटो सदा साथ रखना, यदि दर्पण हो तो उसें देखते रहो।
क्षमा
क्रोध के समय मौन रहना, सामने वाले ने अपराध किया है या नहीं ? यदि किया है तो ठीक गाली दे रहा है यदि नहीं किया है तो गाली देकर अपना पुण्य नष्ट कर रहा है।
क्षमा
यदि तुझे गाली देने से शान्ति मिलती है तो दे ले मेरा क्या जाता है।
क्षमा
इस प्रकार का शान्त वातावरण हो कि घर ही मन्दिर बन जाए, अज्ञानियों के समान हम व्यवहार करें तो हम में और अज्ञानियों में क्या अन्तर है?
क्षमा
पृथ्वी अपने हृदय विदीर्ण करने वालों को ठण्डा पानी व हरी-भरी फसल देती है, वृक्ष पत्थर मारने वालों को छाया व फलादि देता है, मनुष्य को भी दुर्व्यवहार करने वालों को क्षमा प्रदान करना चाहिए।
क्षमा
अजनबी व्यक्ति ने आचार्य विद्यासागरजी से अटपटा प्रश्न किया-What is your busines. आचार्य श्री ने शान्ति से उत्तर दिया- Busy nes is my busines. अर्थात् धर्म ध्यान में व्यस्त रहना ही हमारा व्यापार है।
क्षमा
झगड़े मिटाने के चार उपाय- सहिष्णुता का विकास, समग्रता का चिन्तन, विनोदप्रियता और मौन।
क्षमा
मासोपवास करो, सत्य का विस्तार करो, ध्यान करो, बाहर वन में निवास करो, ब्रह्मचर्य धारण करो और भिक्षावृत्ति से भोजन करो परन्तु यह सब करने वाला यदि क्रोध करता है तो सब निरर्थक है।
क्षमा
क्रोध करने का मतलब दूसरों की गलतियों की सजा खुद को देना है।
क्षमा
पत्नि ने गुस्से में कहा मैं मायके जा रही हूँ, पति ने मुस्करा कर कहा मैं भी ससुराल घूम आऊँगा और पप्पू भी ननिहाल हो आयेगा। इस प्रकार की विनोदप्रियता से गुस्सा शान्त हो जाता है।
क्षमा
गाली बेरंग चिट्ठी है उसे लेंगे नहीं तो देने वाले के पास ही पहुँच जायेगी, अत: गाली नहीं गीत गाओ।
क्षमा
पहले महिलाएँ कपड़े धोती थीं तो कपड़े पीटने में कषाय निकल जाती थी, आज वांशिग मशीन है तो कषाय पति व बच्चों पर निकलती है।
क्षमा
सत्पुरूषों की शत्रुता तभी तक चलती है, जब तक शत्रु नम्र न हो जाए।
क्षमा
क्रोध आता है तो दरवाजे को भी लात मार देते हैं, क्षमा माँगते समय कहते है वह तो अजीव है उससे क्या क्षमा मांगना।
क्षमा
क्षमा तीन प्रकार की होती है स्वार्थ वश, मजबूरी वश और वास्तविक। स्वार्थ वश क्षमा- ग्राहक अनेक चीजों को देखने के बाद भी नहीं खरीदता है तो भी दुकानदार उसे क्षमा कर देता है ऐसा मानकर कि आज न सही फिर कभी खरीदने आयेगा। मजबूरी वश क्षमा- घमण्डी पहलवान रोड से जा रहा था, छत से दूसरे पहलवान ने ईंट फेक कर मारी, वह सोचता है आज किसकी मौत मण्डरा रही है, हाथ में ईंट लेकर ऊपर जाता है देखता है, वहाँ तो कोई महा पहलवान अभ्यास कर रहा है, उसे देखकर पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी, कहा ! भाई साहब आपकी ईंट वापस करने आया हूँ। वास्तविक क्षमा- दुष्टों ने नाव में बैठकर साधु को परेशान किया लोगों ने कहा आपके पास शक्ति है आप नाव को पलट दो, साधु ने कहा हम नाव पलटने की जगह बुद्धि पलटते हैं।
क्षमा
श्रावक बनूँ या श्रमण-दर्शक ने पूँछा था गृहस्थ बनूं या साधु? जब तक साधु बनने की क्षमता नहीं है तब तक पति पत्नि में समन्वय करने की कला होनी चाहिए, एक व्यक्ति ने पत्नि से कहा लालटेन जला लाओ, पत्नि दिन में बारह बजे लालटेन जलाकर आंगन में ले आयी, उसने नहीं पूँछा कि दिन में लालटेन की क्या आवश्यकता है? भोजन करने बैठे, भोजन में नमक नहीं था शान्ति से भोजन करके आ गये, गृहस्थी में इस तरह रहो और बाद में साधू बनकर समता की साधना करो, प्रश्न का उत्तर मिल गया।
क्षमा
गजकुमार मुनि-कौन जल रहा था ? गजकुमार मुनि के उपसर्ग की वार्ता सुनकर एक सज्जन बोल उठे, कैसी बिडम्बना है, गजकुमार मुनि का शिर जल रहा था और उनका ससुर हँस रहा था, देखो संसार की दशा, तब एक ने कहा भाई ! मुनिराज तो समता रुपी अमृत का पान कर रहे थे, अपूर्व आनन्दप्राप्त कर रहे थे, अरे ! कषाय की भट्टी में तो उनका ससुर जल रहा था, मुनि का शरीर जल रहा था आत्मा हँस रही थी, ससुर की आत्मा जल रही थी, शरीर हँस रहा था, देखो यह स्वभाव दृष्टि का बल है।
क्षमा
लात का जबाव लात से-लात का जबाव लात से गधा ही देता है, आप गधे तो नहीं है न ? भौंकने का जबाव भौंककर कुत्ता ही देता है, आप कुत्ते तो नहीं है न ? क्रोध का जबाव क्रोध से क्रोधी ही देता है, आप क्रोधी तो नहीं है न ? घृणा का जबाव प्रेम से सन्त ही देता है, आप सन्त के अनुयायी है न ? तो फिर गुस्सा क्यों करते हैं ? सामने वाला गुस्सा करे तो आप चुप रहें, क्रोधी वक्ता बने तो आप श्रोता बनें, थोड़ी देर में अपने आप शान्त हो जायेगा, दरअसल क्रोध तात्कालिक पागलपन है, बच्चा गलती करता है तो आप उसे क्षमा कर देते हैं, क्योंकि नादान है अरे भाई ! क्रोध करने वाले भी तो नादान हैं अतः उन्हे भी क्षमा कर देना चाहिए।
क्षमा
आप हाइवे पर सही तरफ कार चलाते हैं, कोई उल्टी तरफ से आकर टकरा जाता है तो भी दोनों का नुकसान होता है अतः टकराव को हर हाल में टालिए।
क्षमा
स्फटिक और पानी पर पदार्थ के संयोग से कुछ देर के लिए स्वभाव छोड़ देते है, उसी तरह आत्मा है अशुभ निमित्तों से कुछ देर के लिए अपना स्वभाव छोड़ देती है।
क्षमा
महावीरस्वामी ने दुश्मन को नहीं दुश्मनी मिटाने को कहा है।
क्षमा
पानी कितना ही गर्म क्यों न हो जाय पर अन्त में ठण्डा होना ही पड़ता है।
क्षमा
क्षमा करने के लिए शक्ति चाहिए, क्रोध तो कमजोरी की निशानी है, क्रोधी स्वभाव से यहीं नरक व क्षमा भाव से स्वर्ग बनता है।
क्षमा
मित्रों से नहीं शत्रुओं से माफी माँगना चाहिए।
क्षमा
जैसे चौराहे पर घर है तो धूल व शोर आदि के अनेक उपद्रव होंगे, उसी प्रकार संसार में हैं तो प्रतिकूलताएँ तो होंगी ही, अतः सहन करना चाहिए व क्षमा करना चाहिए।
क्षमा
गाली लेने-देने की वस्तु नहीं है अथवा गाली नहीं लेंगे तो किसके पास रहेगी ?
क्षमा
गाली सुनकर लोगों को गुस्सा आता है, पर अगर कोई पूँछे की आपको गाली कहाँ लगी, तो आप क्या उत्तर देंगे ? तथा सोचना चाहिए की मेरे पाप का उदय है, अन्यथा मुझे ही गाली क्यों दी दूसरो को क्यों नहीं दी ?
क्षमा
अभी तक मैंने जो साधना या अध्ययन किया है, सामने वाला गाली देकर मेरी परीक्षा कर रहा है, परीक्षा सौभाग्य से होती है अतः इस परीक्षा में मुझे उत्तीर्ण होना है।
क्षमा
हानि में लाभ देखें तो क्रोध नहीं होगा।
क्षमा
विजय क्रोध की नहीं क्षमा की होती है।
क्षमा
शीतल जल की स्थिति अधिक और गर्म जल की कम होती है, इसी प्रकार क्षमा देर तक रह सकती है क्रोध ज्यादा देर तक नहीं रह सकता है।
क्षमा
ठण्डा लोहा गरम लोहे को काटता है उसी प्रकार क्षमावान क्रोधी पर विजय प्राप्त करता है।
क्षमा
कोई पदार्थ इष्ट अनिष्ट नहीं तो गाली को अनिष्ट क्यों मानते हो।
क्षमा
असम्भव नाम को अलग कर दो, क्रोध को प्रयत्न पूर्वक जीतो।
क्षमा
पृथ्वी का नाम क्षमा है, वह मनुष्य के सारे अपराध क्षमा करती है, उसी प्रकार आत्मा का स्वभाव क्षमा है, उसे भी सभी के अपराध क्षमा करना चाहिए।
क्षमा
शिष्य और शीशी में डांट जरूरी है, पर बैर जरूरी नहीं है।
क्षमा
जैसे मेहमानों का तिरस्कार करने पर दोबारा नहीं आते हैं उसी प्रकार कषायों का तिरस्कार करने से वापस नहीं आती हैं।
क्षमा
गाँधी जी कहते थे कि जीवन में सफल बनना है, तो एक शत्रु अपने पास रखो, जिससे की आप हमेशा सावधान रहें।
क्षमा
कषायी को स्वयं के और दूसरों के अहित की चिन्ता नहीं होती, अतः कषाय से बचें।
क्षमा
बहुत से लोग ऐसे पाये जाते हैं कि वैसे तो मेरा स्वभाव एक दम शान्त है पर कोई छेड़ दे तो मुझसे शान्त नहीं रहा जाता, पर ऐसी शान्ति किस काम की जो क्रोध के निमित्त मिलने पर काम न आये ?
क्षमा
जिसकी हम प्रशंसा करें और उसे क्रोध आवे ऐसा कैसे हो सकता है ? प्रशंसा सुनकर तो लोगों को मान आता है, क्रोध नहीं। क्षमा का धारी तो वह है जिसे गाली सुनकर भी क्रोध न आये, जो गाली सुनकर चाँटा मारे वह काय की विकृति है। जो गाली सुनकर गाली देवे वह वचन की विकृति है। जो गाली सुनकर मन में खेद लावे वह मन की विकृति है।
क्षमा
भोजन छोड़ेंगे लेकिन अशुभ विचार नही छोड़ेंगे तो क्षमा धर्म नहीं आएगा।
क्षमा
हर कार्य के लिए मुहूर्त देखते हो, लेकिन क्रोध के लिए नहीं इसलिए अनिष्ट होता है।
क्षमा
जब क्रोध में हो तो दस बार सोचो, जब अधिक क्रोध में हो तो हज़ार बार सोचो।
क्षमा
क्रोध ज्ञानी के हृदय में झाँक सकता है पर निवास तो मूर्खों के हृदय में रहता है।
क्षमा
कुत्ते को लाठी मारो तो लाठी चबाता है, उसे मूल शत्रु की पहचान नहीं, बन्दर को चिढ़ाओ तो वह भी चिढ़ाता है, उसी प्रकार यदि हम पर कोई क्रोध करे और हम भी करें, तो हम पशु से भी गये-बीते हुए।
क्षमा
रामचंद्र जी वन में क्रोध नहीं सकारात्मक विचार करते हैं कि कैकई माता धन्य हैं जिसके निमित्त से अनेक तीर्थों के और अनेक साधुओं के दर्शन हुए।
क्षमा
खाली कुंए से वाल्टी खाली आती है, उसी प्रकार आत्मा कषाय से खाली हो तो भेजी हुई गाली व्यर्थ जायेगी।
क्षमा
काम और क्रोध को छोड़े विना कोई भी रिद्धि-सिद्धि को प्राप्त नहीं होता है।
क्षमा
जो लोक में पुण्यवान हैं जिनके दोनों लोक सुधरना है उन्हीं को क्षमा गुण प्रकट होता है।
क्षमा
खोद-खाद धरती सहे, काट कूट वनराय। कुटिल वचन साधु सहे, और से सहा न जाय ॥5॥
क्षमा
गाली सुन मन खेद न आनो, गुण को औगुण कहे अयानो।
क्षमा
काले भुजङ्ग मन के सदृश जब क्रोध का हो अवतरण, तो जीभ में टाँके लगा मैं मौन की लेलूँ शरण। मुझ पर चलाये जो दनादन क्रोध रञ्जित गोलियाँ, उत्तम क्षमा से नाथ मैं भरदूँ उसकी झोलियाँ ॥6॥
क्षमा
जो तुझको काँटा बोये, ताहि बोये तू फूल। क्षमावान सज्जन पुरूष, कभी न बोयें शूल ॥7॥
क्षमा
एक व्यक्ति के क्रोध से कभी न झगड़ा होय। आपस में जब दो भिड़ें तब निश्चित झगड़ा होय ॥8॥
क्षमा
मारना है गर किसी को मार दो अहसान से, क्या मिलेगा गर किसी को मार दोगे जान से। जान से मारा गया बापस कभी आता नहीं, एहसान का मारा गया फिर सर उठा सकता नहीं ॥9॥
क्षमा