Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Anger & Forgiveness

क्षमा

455 सूत्र · पृष्ठ 1 / 7

गुस्सा करना, दूसरों की गलतियों की सजा खुद को देना।
क्षमा
पाप की कालिमा को नदी समुद्र का पानी नहीं धो सकता, उसे तो पश्चाताप के आँसू ही धो सकते हैं एवं परमात्मा तक पहुँचने के लिए प्रायश्चित सबसे सरल मार्ग है।
क्षमा
प्रायश्चित से पिछले पाप के प्रति विरक्ति उत्पन्न होती है और आगे के लिए सावधानी होती है।
क्षमा
‘‘पहले पाप कर लें पीछे प्रायश्चित कर लेंगे’’ इस प्रकार जान–बूझकर किए गये पाप प्रायश्चित से नष्ट नहीं होते हैं।
क्षमा
कोई भी प्राणी तुम्हारे द्वारा तिरस्कार के योग्य नहीं है, ये तो सब स्वतन्त्र पदार्थ हैं, इनसे तेरा सम्बन्ध क्या है? अपने क्रोध–मान–माया–लोभ का तिरस्कार तेजी से करो, इन्हीं कषायों ने तुझे भटका रखा है और दुःखी कर रखा है।
क्षमा
आत्म शुद्धि पर अधिक लक्ष्य रखो। तुम्हारे क्षमादि भाव ही तुम्हारे रक्षक हैं और कोई रक्षा करने वाला नहीं है।
क्षमा
यदि तुम कल्याण व उन्नति चाहते हो तो दूसरों के कल्याण व उन्नति में ईर्ष्या मत करो प्रत्युत उनके कल्याण व उन्नति की भावना रखो क्योंकि मात्सर्य भाव स्वयं अकल्याण है, इस अशुभ प्रयोग के रहते उन्नति हो ही नहीं सकती है।
क्षमा
जहाँ तक शरण का प्रश्न है, तेरे क्षमादि परिणामों को छोड़कर अन्य कुछ भी जगत् में शरण नहीं है।
क्षमा
ईर्ष्या का दुःख प्रायः निष्फल ही जाता है अधिकतर तो जिस बात की ईर्ष्या होती है, वह ऐसी बात होगी जिस पर हमारा वश नहीं होता है।
क्षमा
ईर्ष्या और क्रोध जीवन को छोटा कर देते हैं।
क्षमा
कषाय परिणाम जहर है जो एक क्षण में सभी जप तप को नष्ट कर देता है।
क्षमा
आप सबसे लड़-झगड़ तो सकते हो किन्तु कषायों में अकेले ही जलना पड़ेगा।
क्षमा
प्रत्येक कषाय का काल ४८ मिनट होता है। अगर आप अन्तर्मुहूर्त बच गये तो विकार अपने आप शान्त हो जायेंगे।
क्षमा
जो मनुष्य अपने साथी से घृणा करता है, वह उसी मनुष्य के समान हत्यारा है जिसने सचमुच हत्या की है।
क्षमा
आगे वालों से जलिए मत और पीछे वालों पर हँसिए मत।
क्षमा
आज दुनिया का हर आदमी इसलिए दुःखी हैं कि उसका पड़ोसी क्यों सुखी है?
क्षमा
ईर्ष्या करने वाले, घृणा करने वाले, असंतोषी, क्रोधी, सदा शंकित रहने वाले और दूसरों के भाग्य पर निर्वाह करने वाले सदा दुःखी ही रहते हैं।
क्षमा
किसी के भी गुणों में दोष ढूँढना, ईर्ष्या, निन्दा करना नरक गति की तैयारी करना है।
क्षमा
ईर्ष्या करके मनुष्य उसका तो कुछ बिगाड़ नहीं सकता, पर अपनी निद्रा, सुख, पुण्य, सन्तोष अवश्य खो देता है। ‘‘स्वयं को उपदेश देने वाला उन्नति करता है।’’
क्षमा
दुष्टा ईर्ष्या दरिद्रतारूपी दानवी को बुलाती है और मनुष्य को नरक के द्वार तक ले जाती है।
क्षमा
ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है, ईर्ष्या से अपना ही महत्त्व कम होता है।
क्षमा
ईर्ष्या करने वाले का सबसे बड़ा शत्रु उसकी ईर्ष्या ही है।
क्षमा
हत्यारे की कुल्हाड़ी की तुलना में ईर्ष्या की धार दो गुनी तेज होती है।
क्षमा
जैसे जंग लगने से लोहा खराब हो जाता है, वैसे ही ईर्ष्या से मनुष्य नष्ट हो जाता है।
क्षमा
ईर्ष्या जीत लो तो राग स्वयं दिशाओं में भाग जाता है।
क्षमा
अपनी प्रशंसा करना, पूज्य पुरुषों में दोष निकालने का स्वभाव होना, बहुत काल तक वैर धारण करना ये तीव्र कषायी जीव के चिह्न हैं।
क्षमा
ईर्ष्या की आग को बुझा दीजिए नहीं तो यह आपको जलाकर राख कर देगी।
क्षमा
स्त्रियाँ सिर्फ ईर्ष्या से दुःखी होती हैं।
क्षमा
घृणा से घृणा को नष्ट नहीं किया जा सकता है, घृणा को दूर करने के लिए स्नेह की आवश्यकता होती है।
क्षमा
घृणा व द्वेष से ग्रसित व्यक्ति दूसरों को सुख नहीं पहुँचा सकता है।
क्षमा
ईर्ष्या अपनी हीनता के बोध से जन्म लेती है और ईर्ष्या उस हीनता को दूर नहीं करती सिर्फ दबाती है। ईर्ष्या रखने वाले मनुष्य को इतना दुःख अपनी असफलता पर नहीं होता जितना दुःख दूसरे की सफलता देखकर होता है।
क्षमा
जिस आदमी के भीतर घृणा है उसके लिए सारा जगत् शत्रु हो जाता है और जिसके अंदर प्रेम है उसके लिए सारा जगत् मित्र हो जाता है।
क्षमा
क्रोध से सब काम वैसे नहीं बनते, जैसे शान्ति से बनते हैं।
क्षमा
क्रोध में किसी को कुछ बक दो तो अन्तःकरण की अदालत में स्वयं न्यायाधीश बनकर, स्वयं को खड़ा कर स्वयं को प्रायश्चित्त दो।
क्षमा
जब तुम्हारी आत्मा अहंकार और क्रोध से मोहित होने को हो, तब मस्तक में उनका स्मरण रखो, जो लापरवाही और असावधानी से नष्ट हो गये हैं।
क्षमा
जिस कषाय भाव से वर्तमान की शान्ति भंग हो रही है उससे भविष्य में सुख कैसे मिल सकता है। 'गुस्सा' करना दूसरे की गलतियों की सजा खुद को देना है।
क्षमा
अपनी हजारों गलतियों के बाद भी हम अपने आपको प्यार करते हैं फिर किसी की एक गलती पर हम उससे नफरत क्यों करते हैं?
क्षमा
जो काम प्रेम से हो सकता है वह क्रोधावेश या द्वेष से नहीं होता है।
क्षमा
शान्त होना संत होने से भी ज्यादा कठिन है।
क्षमा
अगर किसी की गलती से अपना कुछ नुकसान हो जाए तो जान-बूझकर उसका नुकसान करने का विचार मन में मत लाओ।
क्षमा
तीव्र कामी-क्रोधी-ईर्ष्यालु जीव को रोग ज्यादा घेरते हैं, एक समय सीमा के बाद उसके ज्ञान का क्षयोपशम नष्ट हो जाता है।
क्षमा
जो मनुष्य बदला लेना चाहता है वह अपने घाव को ताजा बनाये रखता है।
क्षमा
नफरत को हजार मौके दो कि वो प्रेम में परिवर्तित हो जाये लेकिन प्रेम को एक भी मौका मत दो कि वो नफरत में बदल जाये।
क्षमा
एक छोटी-सी लड़ाई से हम अपना प्यार खत्म कर लेते हैं, इससे तो अच्छा है कि प्यार से हम अपनी छोटी सी लड़ाई ही खत्म कर दें।
क्षमा
वो दुश्मन बनकर मुझे जीतने निकले थे, मोहब्बत कर लेते तो मैं खुद ही हार जाता।
क्षमा
आलोचना, क्रोध, निंदा जैसे जहर को पीना सीखो।
क्षमा
जो लोग दोषों से सर्वथा रहित नहीं है, वे स्वयं पर तो नहीं बिगड़ते फिर वे अपनी निन्दा करने वालों पर क्यों क्रुद्ध होते हैं ?
क्षमा
बदला लेने में क्या मजा, मजा तो तब है जब सामने वाले को बदल डालो।
क्षमा
बदला लेने में साहस नहीं, बल्कि उसे सहन करने में साहस है।
क्षमा
शान्ति की परीक्षा क्रोध का निमित्त मिलने पर होती है प्रिय विषय साधन मिल जाने पर तो सभी शांत बन जाते हैं।
क्षमा
ऊपरी शान्ति से भी क्रोध की पुष्टि होती है।
क्षमा
बदला लेने में साहस नहीं, बल्कि उसे सहन करने में साहस है।
क्षमा
शान्ति की परीक्षा क्रोध का निमित्त मिलने पर होती है प्रिय विषय साधन मिल जाने पर तो सभी शांत बन जाते हैं।
क्षमा
ऊपरी शान्ति से भी क्रोध की पुष्टि होती है।
क्षमा
विश्वास पूर्वक अपराध करते जाओ हम तुम्हारा सब कुछ सहन कर लेंगे, विश्वास रखो कि गुणों से भरे हृदय में दोष नहीं समाते हैं।
क्षमा
चोर से जैसी सावधानी बरतते हो वैसी ही क्रोध से भी बरतो।
क्षमा
जिस राजा में कानों को अप्रिय लगने वाले वचनों को सहन करने की क्षमता है, पृथ्वी निरन्तर उसकी छत्रछाया में रहेगी।
क्षमा
अपने साथ की गई बुराई बालू पर और की गई भलाई पत्थर पर लिखना चाहिए।
क्षमा
जीवन में गुरु, पण्डित, मित्र, पुत्र, पिता-माता, पत्नि और पड़ोसी से कभी वैर नहीं करना चाहिए, इनसे वैर करने वाले को सदैव दुःख ही दुःख मिलता है।
क्षमा
किसी भी क्रोधी व्यक्ति के आगे न आवें।
क्षमा
वैश्यों का क्रोध मीठे वचनों से शान्त हो जाता है।
क्षमा
शत्रु का लोहा गरम भले ही हो जाए पर हथौड़ा तो ठंडा रहकर ही काम दे सकता है।
क्षमा
अपेक्षा की उपेक्षा ही क्रोध का कारण है।
क्षमा
क्रोध को प्रेम से विजय करें, बुराई को भलाई से विजय करें, लोभ को उदारता से विजय करें, असत्य को सत्य से विजय करें।
क्षमा
जो क्रोध पर नियंत्रण रखते हैं वे ही स्वर्ग के सच्चे अधिकारी होते हैं।
क्षमा
क्रोध मस्तिष्क के दीप को बुझा देता है अतः महत्त्वपूर्ण परीक्षा में हमेशा शांत व स्थिर होना चाहिए।
क्षमा
वह मनुष्य वास्तव में बुद्धिमान है जो क्रोधावस्था में भी गलत बात मुख से नहीं निकालता है।
क्षमा
जो जितना असन्तुष्ट होगा उसके अंदर उसी मात्रा में क्रोध होगा।
क्षमा
क्रोध इंसान को शैतान, दोस्त को दुश्मन, अपने को पराया बना देता है।
क्षमा
क्रोध मनुष्य को अंधा बना देता है, ईर्ष्या अंधा ही नहीं, बहरा भी बना देती है।
क्षमा
क्रोध जब भी आता है तो विवेक की आँखों को बन्द करके आता है, समझदारी के दरवाजे में बेहोशी की चटकनी लगा करके आता है।
क्षमा
क्रोध मुसीबत में डाल देता है और अहंकार मुसीबत से बाहर नहीं आने देता।
क्षमा
ज्यादा गरम होने पर दिमाग और मशीन दोनों बंद हो जाते हैं।
क्षमा
क्रोधी व्यक्ति का मुँह खुला रहता है, पर दिमाग बंद हो जाता है।
क्षमा
कामना, वासना ही नहीं क्रोध भी पशुता का द्वार है।
क्षमा