क्रोधस्त्वया यदि विभो ! प्रथमं निरस्तो, ध्वस्तास्तदा वद कथं किल कर्मचैराः। प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके, नीलद्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी ॥7॥
हे भगवन ! आपने क्रोध को नौवे गुणस्थान में नष्ट कर दिया तब घातिया कर्मों को विना क्रोध के कैसे नष्ट किया अथवा समझ में आ गया क्या ठण्डी तुषार हरे भरे वनों को नष्ट नहीं कर देती है ?
O Lord! You destroyed anger at the ninth gunasthana, so how did you then destroy the destructive karmas without anger? Now it is understood — does not cold frost itself destroy green, flourishing forests?
— आराध्य सूत्र · #96
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