Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
क्षमा

क्रोधस्त्वया यदि विभो ! प्रथमं निरस्तो, ध्वस्तास्तदा वद कथं किल कर्मचैराः। प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके, नीलद्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी ॥7॥

हे भगवन ! आपने क्रोध को नौवे गुणस्थान में नष्ट कर दिया तब घातिया कर्मों को विना क्रोध के कैसे नष्ट किया अथवा समझ में आ गया क्या ठण्डी तुषार हरे भरे वनों को नष्ट नहीं कर देती है ?

O Lord! You destroyed anger at the ninth gunasthana, so how did you then destroy the destructive karmas without anger? Now it is understood — does not cold frost itself destroy green, flourishing forests?

— आराध्य सूत्र · #96

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कोई भी प्राणी तुम्हारे द्वारा तिरस्कार के योग्य नहीं है, ये तो सब स्वतन्त्र पदार्थ हैं, इनसे तेरा सम्बन्ध क्या है? अपने क्रोध–मान–माया–लोभ का तिरस्कार तेजी से करो, इन्हीं कषायों ने तुझे भटका रखा है और दुःखी कर रखा है।
क्षमा