Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 2

जिनागम ज्ञान- मुक्तिपथ का वायु यान।

126 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

आपके पास दो रुपये हैं तो एक से रोटी खरीदिए और दूसरे से अच्छी किताब, रोटी जीवन देगी और किताब जीने की कला देगी।
ज्ञान
पैसों से आप क्या खरीद सकते हैं और क्या नहीं खरीद सकते हैं? पैसे से आप मनोरञ्जन के साधन खरीद सकते हैं, पर खुशी नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप पुस्तकें खरीद सकते हैं, पर दिमाग नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप बिस्तर खरीद सकते हैं, पर नींद नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप साधु के उपकरण खरीद सकते हैं, पर साधुता नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप भोजन खरीद सकते हैं, पर भूख नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप मकान खरीद सकते हैं, पर घर नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप शानदार वस्तुएं खरीद सकते हैं, पर संस्कृति नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप दवाई खरीद सकते हैं, पर स्वास्थ्य नहीं खरीद सकते हैं। पैसे से आप मन्दिर खरीद सकते हैं, पर भगवत्ता नहीं खरीद सकते हैं। किन्तु स्वाध्याय के द्वारा आप वह सब खरीद सकते हैं जो-जो आपकी इच्छा है।
ज्ञान
पुस्तक का मूल्य रत्नों से भी अधिक है, क्योंकि रत्न बाहरी चमक दिखाते हैं जबकि पुस्तकें मन को उज्ज्वल करती हैं।
ज्ञान
बारह तपों में स्वाध्याय के समान तप न हुआ, न है, न होगा, जो कर्म अन्य तपस्वी करोड़ो भवों में निर्जीर्ण करता है, उसे स्वाध्यायी अन्तमुहूर्त में ही निर्जीर्ण करता है। स्वाध्याय के द्वारा भोजन करते हुए भी अनशन आदि से अनन्त गुणी विशुद्धि प्राप्त होती है, वह स्वाध्याय तप मरण के समय आराधना की सिद्धि के लिए सदा करना चाहिए, अतः श्रुत भावना से पृथक्त्व वितर्क और एकत्व वितर्क रूप शुक्ल ध्यान होते हैं, शुक्ल ध्यान से केवलज्ञान की प्राप्ति और केवलज्ञान से अन्त में मुक्ति की प्राप्ति होती है।
ज्ञान
जो साधक निरन्तर सिद्धान्तशास्त्रों का अध्ययन करता है, उस बुद्धिमान् के पूर्ण मनोगुप्ति होती है।
ज्ञान
हेय और उपादेय रूप तत्त्व के प्रकाश का इच्छुक भव्यजीव बोधि और समाधि को देने वाले तथा परमार्थ सत् वस्तुस्वरूप का कथन करने वाले पुराण और चरित्ररूप प्रथमानुयोग को अन्य तीन अनुयोगों से अधिक अध्ययन में लायें क्योंकि आँखों में पानी इसी अनुयोग से आता है।
ज्ञान
शास्त्र के प्रथमानुयोग से प्रशम, करणानुयोग से संवेग, चरणानुयोग से अनुकम्पा और द्रव्यानुयोग से आस्तिक्य सम्यक्त्व के ये चार गुण पुष्ट होते हैं।
ज्ञान
कौन सा अनुयोग कब पढ़ना–यदि मन शङ्का शील हो तो द्रव्यानुयोग, प्रमादी हो तो चरणानुयोग, तीव्र कषाय हो तो प्रथमानुयोग और यदि मन जड़ हो गया हो तो करणानुयोग पढ़ना चाहिए, पञ्चम काल में प्रायः तीव्र कषायी लोग हैं अतः उन्हें प्रथमानुयोग पढ़कर कषाय मन्द करनी चाहिए।
विवेक
साधु का नौ का अङ्क शाश्वत है, नौ का पहाड़ा पढ़ने से घटता नहीं है, नौ दूनी अट्ठारह 1+8=9। श्रावक का आठ का अङ्क आठ का पहाड़ा पढ़ने से घटता जाता है, आठ दूनी सोलह 1+6=7।
धर्म
जिसे देखने से ऐसा प्रतीत हो मानो मूर्तिमान प्रशम गुण है, यही कायशुद्धि है, वीतराग संयम के विना मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती और वीतराग संयम की साधना उत्कृष्ट तप के द्वारा ही सम्भव है, वह उत्कृष्ट तप स्वाध्याय से सम्भव है, स्वाध्याय से ध्यान का अभ्यास करना चाहिए और ध्यान से स्वाध्याय को चरितार्थ करना चाहिए।
ध्यान
ज्ञान की आग में जलकर व्यक्ति सूरज बने या न बने, पर दीपक तो बन ही जाता है।
ज्ञान
ज्ञानी मनुष्य का लोकोत्तर आचार किसके द्वारा कहा जा सकता है? जहाँ अज्ञानी बन्ध को प्राप्त होता है वहीं ज्ञानी कर्म बन्ध से छूटता है।
कर्म
अध्ययन का दृढ़ सङ्कल्प, वाणी माधुर्य, अध्ययन में परिश्रम, विनयशीलता, निश्छलता, गुरू में आस्था और भक्ति, समय का सदुपयोग, संयम, सेवावृत्ति, उत्साह, जिज्ञासा, अनुशासन प्रियता, अनालस्यता, एवं जिस विद्या का अध्ययन किया जा रहा है उस पर विश्वास हो।
ज्ञान
अहङ्कार, उद्दण्डता, अनुशासन हीनता, आलस्य और विलासी जीवन, अनास्था, असंयम, इन्द्रियों की दासता, अध्ययन में अरुचि, असहिष्णुता, झगड़ालु स्वभाव, वाचालता, कटुवचन, गुरुओं के प्रति अनास्था, अनादर।
ज्ञान
शिष्यगण में प्रेम, उसकी उन्नति का भाव, अच्छे संस्कार देना, ज्ञान का भण्डार, पाण्डित्य, सदाचार, निर्लोभता, कर्तव्य परायणता, सुबोध पाठन शैली, सहिष्णुता, ज्ञानपिपासा, अध्ययन–अध्यापन, सतत शिष्य अभ्युदय की कामना, काव्यात्मक शैली विकसित करता हो।
ज्ञान
1.वक्ता का सभी शास्त्रों का विधिवत् अध्ययन हो, 2.श्रोताओं की मानसिकता समझे, 3.गूढ़ और गम्भीर विषय योग्यता देखकर देवे, 4.इधर-उधर की बातें न करे, 5.अधिक देर नहीं बोले, 6.प्रथमानुयोग का रस पिलाये, 7.भाषण गन्ने की तरह सरस व छोटा होना चाहिए बाँस की तरह नीरस व लम्बा नहीं होना चाहिए।
वाणी
1.मनन, 2.गहन अध्ययन, 3.ऊहापोह, 4.हेय उपादेय को समझना, 5.शास्त्रों का संग्रह करना, 6.सेवा भावी होना, 7.एकाग्रता से सुनना, 8.पठित विषय का स्मरण रखना।
ज्ञान
चौदह प्रकार के श्रोता- 1.मिट्टी, 2.चलनी, 3.भैसा, 4.हँस, 5.तोता (जितना सुना उतना याद रखना), 6.बिल्ली(चालाक), 7.बगुला(ढ़ोंगी), 8.मशक, 9.बकरा(देर से समझता है और तीव्र कामी होता है), 10.जोंक, 11.फूटे घड़े की तरह, 12.पशु (किसी के दबाव में सुनना), 13.सर्प, 14.शिला की तरह, ऐसे चौदह प्रकार के श्रोता होते हैं।
ज्ञान
आरोग्य, बुद्धि, विनय, पुरुषार्थ और शास्त्र सम्बन्धी राग, ये पाँच पठन की सिद्धि करने वाले अन्तरङ्ग कारण हैं और आचार्य, पुस्तक निवास, सहायक और भोजन ये पाँच पठन की वृद्धि करने वाले बाह्य कारण हैं।
ज्ञान
चतुराई प्राप्त करने के पाँच साधन देशभ्रमण, ज्ञानियों से मित्रता, उत्तम स्त्री, राजसभा में प्रवेश, अनेक शास्त्रों का स्वाध्याय करना।
ज्ञान
स्वाध्याय अभ्यासी साधु पञ्चेन्द्रिय विजेता, संकल्प-विकल्प का त्यागी, त्रिगुप्ति युक्त, क्षण भर में अनन्त कर्मों का नाश करने वाला होता है, साधु जीवन में अन्य-अन्य कर्तव्यों के साथ स्वाध्याय का विशेष महत्त्व है।
संयम
स्वाध्याय से मन एकाग्र होता है, प्रज्ञा वृद्धि, स्वार्थ त्याग की भावना, श्रमपूर्वक अभ्यस्त विद्या ही इस लोक और परलोक के कार्यों को सिद्ध करती है।
ज्ञान
त्याग, संयम, आचार-विचार, और कर्तव्यनिष्ठा का बोध शिक्षा से ही होता है।
ज्ञान
अहिंसा और सत्य का घनिष्ठ सम्बन्ध शिक्षा के साथ है।
ज्ञान
जो नैतिकता और आध्यात्मिकता का विकास न करे, वह शिक्षा व्यर्थ है।
ज्ञान
विद्या को चोर चुरा नहीं सकता है, भाई बाँट नहीं सकता है, राजा माँग नहीं सकता हैं, वजन भी नहीं है, व्यय करने पर नित्य बढ़ती है अत: सर्व धनों में विद्या धन प्रधान है।
ज्ञान
काम के समान व्याधि नहीं, मोह के समान शत्रु नहीं, क्रोध के समान अग्नि नहीं है और ज्ञान के समान सुख नहीं है।
ज्ञान
जहाँ पर विद्वान नहीं होते हैं वहाँ पर अल्प बुद्धि भी प्रशंसनीय होता है, जिस प्रकार जहाँ पर वृक्ष नहीं होते हैं, वहाँ एरण्ड का पेड़ ही वृक्ष माना जाता है।
ज्ञान
अनेक संशयों को दूर करने वाला, परोक्ष पदार्थ को दिखाने वाला सबका नेत्र स्वरूप शास्त्र ज्ञान जिसके पास नहीं है वह अन्धा ही है।
ज्ञान
अपने को अजर-अमर समझकर विद्या और अर्थ का सञ्चय करना चाहिये, और मौत ने बाल पकड़ ही लिए हैं, ऐसा समझकर के धर्म का आचरण करना चाहिये।
धर्म
जिस प्रकार गन्ध से हीन फूल सुशोभित नहीं होते, उसी प्रकार विशाल कुल में उत्पन्न और रूप यौवन से सम्पन्न होने पर भी, विद्या से हीन व्यक्ति सुशोभित नहीं होते हैं।
ज्ञान
बुद्धिमानों का समय काव्य और शास्त्र के अध्ययन में जाता है, और मूर्खों का समय व्यसन, निद्रा और कलह में जाता है।
समय
दुर्जन की विद्या विवाद के लिए होती है, सज्जन की विद्या अज्ञान दूर करने के लिए होती है, दुर्जन का धन अहङ्कार के लिए होता है, सज्जन का धन दान के लिए होता है, दुर्जन की शक्ति दूसरों को परेशान करने के लिए होती है, सज्जन की शक्ति जीवों की रक्षा के लिए होती है।
चरित्र
विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म होता है और धर्म से सुख होता है।
विनम्रता
जिन शास्त्र द्वारा प्रत्यक्षादि प्रमाणों से पदार्थों को जानने वाले के नियम से मोह कर्म का क्षय हो जाता है, इसलिए शास्त्र का सम्यक् प्रकार से अध्ययन करना चाहिये।
कर्म
जैसे गधा चन्दन के भार को ढोता हैं पर चन्दन का ज्ञाता नहीं होता, उसी प्रकार शब्द ज्ञानी भी बहुत शास्त्रों का ज्ञाता होता हैं पर आत्मा का ज्ञाता नहीं होता है।
ज्ञान
जिसके द्वारा विषयों के राग से विरक्त हो, रत्नत्रय से राग किया जाए, मित्रता बढ़े, उसे जिनशासन में ज्ञान माना है।
ज्ञान
दूसरों को ठगने के लिए मैंने वैराग्य धारण किया, दूसरों के मनोरञ्जन के लिए धर्मोपदेश दिया, शास्त्रार्थ के लिए विद्याध्ययन किया, हे भगवन्! हास्यकारी कितनी बातें मैं आपको बताऊँ? अर्थात् मैं बहुत दोषों का भण्डार हूँ।
विनम्रता
हे भगवन! चन्दन, चन्द्रकिरण, गङ्गा का जल और मोतियों की माला भी उतनी शीतल नहीं हैं जितने शीतल समता रूपी जल से युक्त आपके वचन हैं।
भक्ति
विद्या माता की तरह रक्षा करती है, पिता की तरह हित में लगाती है, स्त्री की तरह खेद को दूर करके रमाती है, लक्ष्मी को बढ़ाती है, दिशाओं में कीर्ति का विस्तार करती है और कल्पवृक्ष की तरह क्या-क्या सिद्ध नहीं करती है?
ज्ञान
सुखिया स्वभावी को विद्या कहाँ से मिल सकती है और विद्यार्थी को सुख कहाँ से मिल सकता है, सुखिया स्वभावी विद्या को छोड़ देता है और विद्यार्थी सुख छोड़ देता है।
पुरुषार्थ
पुस्तक की विद्या और दूसरे को दिया हुआ धन समय आने पर काम में नहीं आता है अत:विद्या को कण्ठस्थ करना चाहिए और धन को पास में रखना चाहिए।
ज्ञान
विद्वत्ता से वंश का पता चलता है, वैभव प्राप्त होता है सज्जन लोग सेवा करते हैं, सभा में सदस्यता प्राप्त होती है, ज्यादा क्या कहें? विद्वान् सर्वत्र पूजा जाता है।
ज्ञान
विद्वत्ता और राजापना बराबर नहीं हो सकते क्योंकि राजा तो अपने देश में ही पूजा जाता है किन्तु विद्वान् तो सर्वत्र पूजे जातें हैं।
ज्ञान
राजा की पूजा अपने देश में होती है, मुखिया की पूजा अपने गाँव में होती है, मूर्ख अपने घर में ही पूजा जाता है किन्तु विद्वान की सर्वत्र पूजा होती है।
ज्ञान
जिनके पास विद्या, तप, दान, ज्ञान, ब्रह्मचर्य, गुण और धर्म नहीं है वे मनुष्य लोक में पृथ्वी पर भार स्वरूप मनुष्य के रूप में पशु के समान विचरण कर रहे हैं।
चरित्र
विद्या मनुष्यों का सुन्दर रूप है, ढका हुआ गुप्त धन है, विद्या भोगों को, यश को, सुख को करने वाली है विद्या गुरुओं की भी गुरु है, विद्या विदेश में बन्धु के समान है, विद्या देवता के समान रक्षक है, राजाओं के द्वारा विद्या की पूजा की जाती है धन की नहीं अत: जो विद्या से रहित है वह पशु के समान है।
ज्ञान
न्यूनता रहित, अधिकता रहित, जैसा का तैसा, विपरीतता रहित, सन्देह रहित जानने को गणधर देव सम्यग्ज्ञान कहते हैं। जैसे आगम में 36 इंच लम्बा 24 इञ्च चौड़ा पानी का छन्ना, जिसे दोहरा करने पर सूर्य की किरणे न दिखे ऐसा होना चाहिए, अगर इकहरा से तिहरा से कटे-फटे छेद वाले छन्ने से पानी छाना तो सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र नहीं है।
ज्ञान
मद को चढ़ाने वाले कोदों को खाकर, मत्त हुये पुरुष की तरह, मोह से ढका ज्ञान स्वभाव को प्राप्त नहीं होता है, ज्ञान का सागर मोह की ओट में दिखाई नहीं देता है।
अनासक्ति
श्रुत का पार नहीं है, समय अल्प और बुद्धि मंद है, अत: वह अवश्य सीखना चाहिये जिससे जन्म, जरा और मरण का नाश हो जाए।
ज्ञान
शास्त्र में कहे हुए एक पद या अक्षर का भी जो श्रद्धान नहीं करता है, शेष का श्रद्धान करते हुए भी वह मिथ्यादृष्टि है।
धर्म
जिनेन्द्र भगवान् के वचन विषय सुख का विरेचन करने के लिए, जरा–मरण रुपी व्याधि का क्षय करने के लिए एवं समस्त दुखों का नाश करने के लिए अमृत के समान हैं।
भक्ति
यद्यपि भव-भव में आराधित निर्मलज्ञान को भूल जाते हैं, फिर भी वह सकलवस्तु विषयी केवलज्ञान को प्रकट कर देता है।
ज्ञान
गरजने वाले मेघ और ज्यादा बोलने वाले वक्ता सुलभ हैं, किन्तु दयालु वक्ता और जल वाले मेघ दुर्लभ हैं।
वाणी
जो समस्त शास्त्रों के रहस्य का ज्ञाता है, लोक स्थिति को जानता है, जिसे किसी प्रकार की आशा नहीं है, प्रतिभावान है, मन्द कषायी है, प्रश्न पूँछने के पहले ही जिसने उत्तर देख लिया है, प्राय: प्रश्नों को सहन करने वाला है, प्रभुत्व सम्पन्न है, दूसरों का मन हरने वाला है, पर की निन्दा नहीं करता है, गण में प्रमुख है, गुणों का भंडार है, स्पष्ट और मिष्ट भाषी है ऐसा वक्ता होता है।
वाणी
सामान्य शास्त्र की अपेक्षा विशेष शास्त्र बलवान होता है, विशेष रहित सामान्य गधे के सींग के समान अभाव रूप होता है, जैसे आदिनाथ जी का आहार सामान्य से एक साल में, विशेष रूप से तेरह माह सात दिन के बाद हुआ था।
ज्ञान
उपदेश मूर्खों के क्रोध की शान्ति के लिए नहीं होता किन्तु क्रोध की वृद्धि के लिए होता है अत: उनको उपदेश न दें, जैसे सर्प को दूध पिलाओ तो विष ही बढ़ता है, निर्विष नहीं होता।
संगति
भगवान् (सुदर्शन केवली) ने सन्मार्ग की प्रवृत्ति के लिए धर्म तत्त्वादि समस्त पदार्थों का दिव्यध्वनि के द्वारा गणधरों को उपदेश दिया। अर्थात् सामान्य केवली के भी गणधर होते हैं, गन्धकुटी में भी मानस्तम्भ होता है।
धर्म
आयु, धन, घर के दोष, मन्त्र, व्यभिचार, औषध, दान, सम्मान-अपमान, ये नौ बातें अवश्य ही गुप्त रखें।
विवेक
'या विद्या सा विमुक्तये' विद्या वह है जो मुक्ति को प्राप्त कराये, किन्तु 'सा विद्या या भुक्तये' आज कल विद्या वह हो गई है जो भुक्ति अर्थात् सांसारिक सुख प्राप्त कराए।
ज्ञान