विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं, प्रच्छन्नं गुप्तं धनं, विद्याभोगकरी यश: सुख करी, विद्या गुरूणां गुरू:। विद्या बन्धुजनो विदेशगमने, विद्यापरादेवता, विद्याराजसुपूजते न च धनं, विद्याविहीन: पशु:।।
विद्या मनुष्यों का सुन्दर रूप है, ढका हुआ गुप्त धन है, विद्या भोगों को, यश को, सुख को करने वाली है विद्या गुरुओं की भी गुरु है, विद्या विदेश में बन्धु के समान है, विद्या देवता के समान रक्षक है, राजाओं के द्वारा विद्या की पूजा की जाती है धन की नहीं अत: जो विद्या से रहित है वह पशु के समान है।
Knowledge is a person's finest beauty, hidden secret wealth; it grants enjoyment, fame and happiness; it is the teacher of teachers, a kinsman in a foreign land, a protecting deity. Kings honour knowledge, not wealth — therefore one devoid of knowledge is like a beast.
— आराध्य सूत्र · #46
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