Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

उपदेशो हि मूर्खाणां, प्रकोपाय न शान्तये। पय: पानं भुजंगानां, केवलं विष वर्धनं।।

उपदेश मूर्खों के क्रोध की शान्ति के लिए नहीं होता किन्तु क्रोध की वृद्धि के लिए होता है अत: उनको उपदेश न दें, जैसे सर्प को दूध पिलाओ तो विष ही बढ़ता है, निर्विष नहीं होता।

Advice does not calm a fool's anger but only increases it, so do not counsel fools — just as feeding milk to a snake only increases its venom, never removes it.

— आराध्य सूत्र · #56

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति