प्राज्ञ:प्राप्तसमस्तशास्त्रह्रदय:, प्रव्यक्त लोकस्थिति:, प्रास्ताश: प्रतिभापर: प्रशमवान्, प्रागेव दृष्टोत्तर:। प्राय: प्रश्नसह: प्रभुपरमनो, हारी परानिन्दया, ब्रूयाद् धर्म कथां गणी गुणनिधि:, प्रस्पष्टमिष्टाक्षर:।।
जो समस्त शास्त्रों के रहस्य का ज्ञाता है, लोक स्थिति को जानता है, जिसे किसी प्रकार की आशा नहीं है, प्रतिभावान है, मन्द कषायी है, प्रश्न पूँछने के पहले ही जिसने उत्तर देख लिया है, प्राय: प्रश्नों को सहन करने वाला है, प्रभुत्व सम्पन्न है, दूसरों का मन हरने वाला है, पर की निन्दा नहीं करता है, गण में प्रमुख है, गुणों का भंडार है, स्पष्ट और मिष्ट भाषी है ऐसा वक्ता होता है।
A true speaker is one who knows the essence of all scriptures, understands the world's ways, is free of expectation, is brilliant, of mild passions, foresees answers before questions are asked, patiently bears questions, is masterful, wins hearts, never slanders others, is foremost in his order, a treasury of virtues, and speaks clearly and sweetly.
— आराध्य सूत्र · आ.शा. · #54
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