Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 2

जिनागम ज्ञान- मुक्तिपथ का वायु यान।

126 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

भूख सहो, दारिद्र सहो, सहो लोक अपवाद। निन्द काम तुम मत करो, यही ग्रन्थ का सार।।
चरित्र
सुलझे पशु उपदेश सुन, क्यों न सुलझे पुमान्। नाहर से भये वीर जिन, गज पारस भगवान्।।
पुरुषार्थ
किसी आम के वृक्ष तले दो व्यक्ति कहीं से आए थे, एक लगा पत्तों को गिनने दूजे ने फल खाए थे। खाने वाला चतुर मात्र गिनने वाला मूरख जानो, इसी तरह ज्ञानी और अनुभवी को पहचानो।।
ज्ञान
ज्ञान ही भव का कूल है, ज्ञान ही दु:ख का मूल। राग रहित अनुकूल है राग सहित प्रतिकूल।। चुन-चुन इसमें उचित को, मत चुन अनुचित भूल। सब शास्त्रों का सार है, समता बिन सब धूल।।
ज्ञान
स्वाध्याय से मिलता ज्ञान, पूज्य जगत में हो विद्वान्। है यह सुख सम्पति की खान, कोई वस्तु न इसके समान।। स्वाध्याय से पाते बुद्धि, स्वाध्याय से मन की शुद्धि। स्वध्याय से मिलता ज्ञान, इसके बिन नर पशु समान।। आत्मज्ञान धन गुप्त महान, ज्ञानदान से बढता मान। भाई बाँटे हरे न चोर, यथा शक्ति इस धन को जोड़।। सुख में दुख में एक समान, जिनवाणी है मात समान। माता सकल गुणों की खान, इससे बने वीर भगवान।।
ज्ञान
खोदो जितना स्रोत को, उतना मिलता नीर। सीखें जितना ही अधिक, उतनी मति गम्भीर।।
ज्ञान
शिक्षित को सारी मही, घर है और स्वदेश। फिर क्यों चूके जन्म भर, लेने से उपदेश।।
ज्ञान
एक चरण हूँ नित पढ़े, तो काटे अज्ञान। पनिहारी की लेज से, सहज कटे पाषाण।।
पुरुषार्थ
लाख मूर्ख तज राखिये, इक पण्डित गुणवान। सर शोभा इक हँस से, लाख काक क्या काम।।
संगति
जो भी सीखा जीव ने, एक जन्म में ज्ञान। उससे अग्रिम जन्म भी, होते उच्च महान।।
ज्ञान
सीख सरल को दीजिए, विकट मिले दुख होय। वी(पक्षी)ने सीख कपि को दयी, दियौ घोसला खोय।।
संगति
पर औगुण मुख न कहे, पोषै पर के प्राण। विपदा में धीरज धरे, ये लक्षण विद्वान्।।
चरित्र
परिजन धन कछु न चले, मरण समय में साथ। ज्ञान अडिग निज की निधि, भव भव जावे साथ।।
ज्ञान
जैसे माता पुत्र को, कर देती बलवान। जिनवाणी जगमात है, अमर करत है ज्ञान।।
भक्ति
विविध भाव के जीव हु, दीखत हैं जगमांहि। एक कछु चाहे नहीं, एक तजे कछु नाहीं।।
अनासक्ति
मनुष्य जन्म अरू जिनवचन, मिले न बारम्बार। पक्का फल जो गिर गया, लगे न दूजी बार।।
धर्म
मूढ़ मुढ़ाना बहुत सरल है, मन मुण्डन आसान नहीं। व्यर्थ भभूत लगाना तन पर, गर भीतर का ज्ञान नहीं।।
चरित्र
सरस्वती के भण्डार की बड़ी अपूरव बात। ज्यों खर्चें त्यों त्यों बढ़े, बिन खर्चें घट जात।।
ज्ञान
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय।।
पुरुषार्थ
बनती हैं भूमिकाएं प्रथमानुयोग से, आती है योग्यताएं चरणानुयोग से। पकती हैं पात्रताएं करणानुयोग से, तब झलकती है आत्मा द्रव्यानुयोग से।।
ज्ञान
तन रोगों की खान, धन भोगों की खान। ज्ञान सुखों की खान, दुख खान अज्ञान।।
ज्ञान
सौ का नोट मैला भी हो, तो सौ में ही चलेगा, पर पाँचसौ का नया नोट हो, लेकिन गर्वनर के हस्ताक्षर न हों, तो पाँच रुपये में भी नहीं चलेगा, पकड़ा जावेगा तो जैल होगी इसी प्रकार अरहन्त की मुहर जिसमें लगी है, वही शास्त्र सत्य है।
धर्म
ज्ञान अन्न के समान है जैसे अन्न को अच्छी तरह पचा लेने के बाद ही अपना होता, उसी प्रकार पढ़ा हुआ ज्ञान आत्मसात करने पर ही अपना होता है।
ज्ञान
मन भर वाचन की अपेक्षा कण भर पाचन अच्छा है, और उच्चारण की अपेक्षा उच्च आचरण अच्छा है।
चरित्र
ज्ञानदान तत्काल आनन्द देने वाला है,उससे प्राणी सांसारिक सुखों से तृप्त होकर मोक्ष में सदा आनन्द करता है, अत: चारों दानों में सर्वश्रेष्ठ ज्ञानदान है।
दान
अनुभव हीन का ज्ञान बाचाल होता है, अनुभवी का ज्ञान गम्भीर, मौन और विनम्र हो जाता है।
ज्ञान
पापाचार से बचने के लिए ज्ञान की साधना जरूरी है।
ज्ञान
सम्यग्ज्ञान युक्त मन हो तो धर्म में लगता है, विषयों से विरक्त होता है, नम्रता धारण करता है।
ज्ञान
स्वयं को सदा विद्यार्थी बनाए रखिये, ताकि ज्ञान प्राप्ति के द्वार हमेशा खुले रहें।
विनम्रता
ज्ञानदायिनी माँ सरस्वती के चार हाथ हैं जिनमें क्रम से वीणा, शास्त्र, माला और आशीर्वाद के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं जिनसे हमें निम्न लिखित सीख प्राप्त होती है- 1.कम बोलो, काम का बोलो, 2.मीठा बोलो, 3.धीरे बोलो, 4.जरुरत होने पर बोलो। 2.शास्त्र से-ज्ञानी, करे कर्म की हानि। 3.माला से मौन एवं मन साधा जाता है, कायक्लेश तप की साधना होती है, पञ्च परमेष्ठी की भक्ति होती है, ध्यान की साधना होती है। 4.आशीर्वाद सबको अभयदान करना, सब जीवो पर मैत्री भाव करना, हथेली की तरह सबके प्रति साफ़ दिल होना, हमेशा शत्रु पर भी प्रसन्न होना सिखाता है।
ज्ञान
प्रत्येक व्रत की पाँच-पाँच भावनाओं का पालन नहीं करना चारित्र का मल है, सम्यक्त्व का मल शंकादि दोष हैं, ज्ञान का मल संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय है, तप का मल प्राणियों और इन्द्रियों के विषय में संयम का अभाव है।
धर्म
रामचन्द्र जी बाल्यावस्था में पानी में चन्द्रमा को देखकर उसे पकड़ कर खेलना चाहते थे, नहीं पकड़ पाने पर रोने लगे, पूँछा क्यों रोते हो? मन्त्री ने कहा चन्द्रमा चाहिये, राजा ने कहा! ले आओ चन्द्रमा को, मन्त्री ने दर्पण रख दिया, उसमें बिम्ब पड़ा देखकर, रामचन्द्रजी प्रसन्न हो गये, दर्पण छाती से चिपका कर खेलने लगे, इसी प्रकार ज्ञानज्योति को पाकर ज्ञानी प्रसन्न होता है।
ज्ञान
अन्तराय कर्म का तीव्र उदय होने पर शास्त्र रचना और शास्त्र श्रवण का लाभ नहीं होता है।
कर्म
जो शिक्षित है, वही आँखों वाले होते हैं और अशिक्षित के माथे पर तो दो गढ़े होते हैं।
ज्ञान
दुरभिनिवेश- न्याय मार्ग को भूलकर दूसरों का तिरस्कार करने के भाव से कार्यकरने को दुरभिनिवेश कहते हैं।
चरित्र
जीव जिससे रत्नत्रय की रक्षा करता है,शारीरिक सुख से अत्यन्त विरक्त होता है,पाप को रोकता है और विशुद्धि को बढ़ाता है,सर्वज्ञदेव ने उसे ही ज्ञान माना है।
ज्ञान
मुनिराजों में जैसे-जैसे शास्त्रज्ञान की वृद्धि होती जाती है वैसे-वैसे ही संसार से उनकी आसक्ति दूर होती चली जाती है।
अनासक्ति
तत्त्वज्ञानी मनुष्य को बहुत भारी प्रयत्न करके वही कार्य करना चाहिए, जिससे मन की अत्यन्त निर्मल शुद्धि हो जावे।
मन
स्वाध्याय से भव्य जीवों का 'ज्ञान'सूर्य की किरणों के समान प्रकाशमान होता है,'चारित्र'चन्द्रमा के समान उज्ज्वल होता है और 'मन' अपने वश में रहता है।
ज्ञान
मोक्षलक्ष्मी समागम में उत्सुक मुनियों ने शान्ति के महायुद्ध में 'ज्ञान रूपी शस्त्र' के द्वारा 'रागरूपी' पहलवान को मार गिराया है।
अनासक्ति
ज्ञानी और मूर्खों में यही विशेषता मानी गयी है कि ज्ञानीजन नष्ट,मृत और बीती बातों का शोक नहीं करते हैं, अज्ञानी किया करते हैं।
ज्ञान
विद्वानों ने शास्त्र का उत्कृष्ट फल ''संसार से भय'' कहा है, अत: जो शास्त्र से धन की इच्छा करते हैं,वे अमृत से विष की इच्छा करते हैं।
ज्ञान
अन्य दर्शन में जो शुभ वाक्य दिखाई देते हैं वे जैन वाक्य हैं,क्योंकि जो मोती अन्यत्र दिखाई देते हैं उनकी उत्पत्ति समुद्र में ही होती है।
ज्ञान
जिसने व्याकरण नहीं पढ़ा है वह ज्ञान नेत्र से हीन, जन्मान्धवत् है,जो न्यायशास्त्र से रहित है वह तर्कशास्त्र के कहने में असमर्थ है अत: मूकवत् है, जो साहित्य से रहित है वह साहित्य सदन में प्रवेश पाने में पद विहीन है अत: वह पङ्गू है और जो शब्दकोष से रहित है वह निर्धन है।
ज्ञान
शास्त्ररूपी समुद्र से निकाल कर गणधरादि सत्पुरुष रूप मेघों ने जिसकी वर्षा की है,ऐसे चारों अनुयोग रूप जल को भव्य जीव रूपी चातक प्रीति के लिए बार-बार पियें। 'इन्द्रियों के निरोधपूर्वक' किया गया स्वाध्याय परम तप है।
ज्ञान
विनय से सहित विद्या सब के मन को हरती है, जिस प्रकार मणि सहित सोने की अङ्गूठी सबके नेत्रों को आनन्दित करती है।
विनम्रता
अमावस्या और पूर्णमासी को सिद्धान्त ग्रन्थों का स्वाध्याय गुरुघातक है, चतुर्दशी को स्वाध्याय शिष्यघातक है, अष्टमी का स्वाध्याय दोनों को घातक है और प्रतिपदा स्वाध्याय का ही घात करने वाली है। अत: सिद्धान्त ग्रंथों का अध्ययन इन तिथियों में वर्जित है आराधना ग्रंथों का स्वाध्याय किया जाता है।
धर्म
शान्त चित्त वाले मनुष्यों को स्थायी हित के लिए वैराग्य ही प्रिय होता है।
अनासक्ति
ज्ञानी को संसार में नहीं, संन्यास में आनन्द आता है।
अनासक्ति
विद्वान् पुरुष भले ही कुरूप हो तथा वस्त्र-अलङ्कार और वेष से हीन हो, तो भी सज्जनों की सभा में सुशोभित होता है।
ज्ञान
ब्रह्मचर्य, परोपकार, अहङ्कार का अभाव, क्षमा, धैर्य और लोभ का परिहार ये विद्या के परिपाक के उज्ज्वल फल हैं।
चरित्र
शस्त्रविद्या और शास्त्रविद्या ये दोनों विद्याएँ ज्ञान के लिए हैं परन्तु पहली शस्त्रविद्या वृद्धावस्था में हास्य कराती है और दूसरी शास्त्रविद्या सदा आदर को प्राप्त कराती है।
ज्ञान
ये प्राणीउपदेशदाता के विना संसार रूपी दु:खों के महासागर में परिभ्रमण कर रहे हैं।
संगति
विनय से स्वाध्याय करने वाला त्रिगुप्ति धारी होता है, उसके मुख से असत्य, रूक्ष, कठोर, स्वप्रशंसात्मक, परनिन्दात्मक वाणी नहीं निकलती है।
वाणी
ज्ञान और धन पुरूषार्थ पर निर्भर है, जैसे खोदने से पानी निकलता है वैसे ही रटने से विद्या आती है व पुरुषार्थ से धन आता है।
पुरुषार्थ
विनय के अभाव में सर्व शिक्षा निरर्थक है, शिक्षा का फल विनय है, विनय किस अभीष्ट फल को नहीं देती है? विनय का फल सर्व कल्याण है, श्रुतकेवली अवस्था पढ़ने से नहीं तपश्चरण से आती है।
विनम्रता
सत्य बोलना ही सरस्वती की पूजा है, ज्ञान की कीमत नहीं आत्मज्ञान की कीमत है।
सत्य
ज्ञानार्जन के बाद आत्महित में दृष्टि न गयी तो धनार्जन के समान ज्ञानार्जन कहलायेगा।
ज्ञान
ज्ञानी का अपमान, ज्ञान ग्रहण में बाधा, ज्ञान सामग्री का तिरस्कार एवं ज्ञानी से घमण्ड करने से जीव कर्णहीन, वचनहीन एवं बुद्धिहीन होता है।
कर्म
ग्यारह अङ्ग, नौ पूर्व का ज्ञान भव्य मिथ्यादृष्टि को हो सकता है, ग्यारह अङ्ग का ज्ञान अभव्य को भी हो सकता है।
ज्ञान