Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Meditation

ध्यान

163 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

आत्मा और परमात्मा का चिन्तन करने का नाम ही उपवास है।
ध्यान
ईश्वर के चिंतन से करोड़ों पाप इस तरह नष्ट हो जाते हैं, जैसे आग की एक चिंगारी सूखी घास के ढेर को जला देती है।
ध्यान
जैन दर्शन में आत्मा का ध्यान प्रमुख है और जैनेत्तर दर्शन में परमात्मा का ध्यान मुख्य है।
ध्यान
'ध्यान' स्वयं में सोई हुई शक्ति को जगाने की प्रक्रिया है।
ध्यान
'ध्यान' में परिग्रह और परिचय ही बाधक है।
ध्यान
'ध्यान' की अग्नि कर्मों के पर्वतों को तिनके की भाँति जला देती है।
ध्यान
आत्महित की भावना ही सच्चा 'ध्यान' है।
ध्यान
'ध्यान' के लिए वित्त की नहीं चित्त की जरूरत होती है।
ध्यान
दुनिया में ऐसा कोई मंत्र नहीं जो एकाग्रता से सिद्ध न हो सके।
ध्यान
परमात्मा पर वस्तु है किन्तु परमात्मा का ध्यान निज वस्तु है एवं संसार से पार उतारने में समर्थ है।
ध्यान
अर्हन्त, सिद्ध के समान आत्मा का चिन्तन करना पिण्डस्थ ध्यान कहलाता है, मन्त्र वाक्यों का ध्यान करना पदस्थ ध्यान कहलाता है, अर्हन्त का ध्यान करना रूपस्थ ध्यान कहलाता है और सिद्धों का ध्यान करना रूपातीत ध्यान कहलाता है।
ध्यान
जिस प्रकार जल में असीम शक्ति है, एक लोटा पानी में विद्युत शक्ति का पता नहीं लगता, जब वह एकत्र होकर सरोवरों में पहुँचता है तो उसमें असीम शक्ति प्रकट हो जाती है, उससे कई मेगावाट बिजली बनने लगती है, जिससे बड़ी-बड़ी मशीने व रेल आदि चलने लगती हैं, बिजली की शक्ति उसमें छिपी है, इसी प्रकार मन की बिखरी शक्ति ध्यान से एकत्र होती है।
ध्यान
एक-एक इन्द्रिय में एक-एक परमेष्ठी को स्थापित कर ध्यान कर सकते हैं।
ध्यान
परमात्म तत्त्व का अनुभव तभी होगा, जब ‘विषयभोग, निद्रा, हँसी, जगतप्रीत, बहु बात’; ये पाँचों सुहायेंगे नहीं।
ध्यान
सांसारिक सम्पदायें आँख खोलने से मिलती हैं लेकिन आध्यात्मिक सम्पदा आँख बन्द करने पर मिलती है।
ध्यान
हित का बुद्धिगत उपाय ‘एकान्तवासी’ होकर स्वाध्याय तथा तप करना है।
ध्यान
कोई पुरुष किसी के प्रेम में आकर अपने आप को भूल जाता है तो क्या वह आत्मा में रुचि करके पर को नहीं भूल सकता है? आत्म रुचि करो सर्व चमत्कार व सिद्धि पा लोगे।
ध्यान
लेखन, स्वाध्याय स्वाधीन है, सल्लेखना-कल्पवृक्ष है, ‘मौन’ मुमुक्षु का सर्वोपरि कार्य है।
ध्यान
हम भीतर गये हम भी तर गये। तुम भीतर जाओ तुम भी तर जाओ अर्थात् आत्म ध्यान से कल्याण होता है।
ध्यान
परमानन्द की प्राप्ति के लिए तो सबसे चित्त हटाना ही होगा।
ध्यान
सबसे दुर्लभ तो आत्मस्थिरता है, उसके पाने पर फिर कोई भी स्थिति पाने योग्य नहीं रहती।
ध्यान
बाह्य कार्य कोई भी अपने ऊपर मत लो, इस मनुष्य जीवन के क्षण ही कितने है? आत्मा का लाभ शुद्धात्मा के ज्ञान व ध्यान से है।
ध्यान
जब तुम्हें कोई चिंता हो, तब अखण्ड अविनाशी अपने ज्ञायकभाव का चिंतन करो, इसके ध्यान के प्रताप से तत्काल चिंता नष्ट हो जाती है।
ध्यान
चिंता-शंका से रहित, परमात्म गुणस्मरण-आत्म स्वरूपलीनता ही मोक्ष का उपाय है।
ध्यान
अपने लक्ष्य में ज्ञायक स्वरूप बना रहना एक किला है, यदि तुझ पर विपदा रूप शत्रु आक्रमण करे, तब अपने उपयोग को उस किला में गुप्त कर दे, फिर तू अजेय है।
ध्यान
भीड़ का भी आनंद होता है, लेकिन भीड़ से करोड़ गुना आनंद एकान्त में मिलता है।
ध्यान
योगी के एक क्षण का आनंद भोगी को जीवन भर में नहीं मिल पाता है।
ध्यान
योग और उपयोग के निर्मल रहने पर ही कल्याण संभव होता है।
ध्यान
गुणस्थान उपवास, जाप से नहीं बढ़ते निर्मल परिणामों से बढ़ते हैं।
ध्यान
जो एकाग्रता से सदा वीतरागता की उपासना करता है वह संसार के सभी सुखों को भोगकर उन्हीं के समान हो जाता है।
ध्यान
चिन्तन धारा के अभाव में कल्याण की प्राप्ति असंभव है।
ध्यान
आत्मा का चिंतन करने से क्षुधा, मात्सर्य, काम, क्रोध, मान, माया, लोभ, भय और निद्रा आदि का नाश होता है। ज्ञानी हमेशा गुणग्राही होता है।
ध्यान
प्राणायाम से शरीर की और ध्यान से आत्मा की शक्ति बढ़ती है।
ध्यान
दुनिया से मौन लेकर निज में चर्या करने का नाम सामायिक है।
ध्यान
संत पुरुष के लिए एकान्त में रहकर विचार मात्र से भी सेवा कर सकना संभव है, ऐसा लाखों में एक कर सकता है।
ध्यान
चिंतन द्वारा मन विलीन होता है और मन के विलय होने पर ही कल्याण होता है।
ध्यान
एकान्त स्थान में अकेले ही अपने हित का नित्य चिंतन करे क्योंकि अकेले सोचने वाला ही परम कल्याण को प्राप्त करता है।
ध्यान
प्राणायाम द्वारा अत्यन्त तीक्ष्ण बनाई ऊँकार रूपधार वाली और वैराग्य रूपी पत्थर पर घिसी हुई बुद्धि रूपी छुरी से संसाररूपी सूत्र को काटकर योगी फिर कर्मों से नहीं बँधता है।
ध्यान
जीवन का आदर्श यही है कि जीवन के उस पार देखा जाये।
ध्यान
ज्ञान तीर्थ है, धैर्य तीर्थ है, तप को भी तीर्थ कहा गया है, तीर्थों में भी श्रेष्ठ तीर्थ है मन की परम शुद्धता।
ध्यान
ध्यान के द्वारा पवित्र तथा ज्ञान रूपी जल से भरे हुए, राग-द्वेष रूप मल को दूर करने वाले मानस तीर्थ में जो पुरुष स्नान करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है।
ध्यान
एकान्त में रहना ही महान् आत्माओं का भाग्य है।
ध्यान
ज्ञानपूर्वक होने वाला समभाव ही सामायिक है।
ध्यान
कौन-सा पर पदार्थ मेरा हित करेगा? मेरा हित तो निर्विकल्प अवस्था में है, बाह्य पदार्थ का ध्यान तो विकल्प का हेतु है व रहेगा।
ध्यान
अज्ञानी की श्वासें तेज और ज्ञानी की श्वासें मंद-मंद चलती हैं, स्वरूप का चिन्तन करने वाले योगी की श्वास मंद-मंद चलती है किन्तु भोगी की श्वासें तेज चलती हैं, जो जितना उथला व्यक्ति होता है वह उतना ही हाँफता है।
ध्यान
जब तक मन में विकल्प चलता है तब तक गुरु प्रभु कुछ भी नहीं दिखता है, विकल्प संसार बढ़ाने वाला है।
ध्यान
जैसे चारों ओर से जलते हुए मकान में फँसे शिशु की चिंता एक माँ को होती है, वैसी चिंता साधक को सामायिक (आत्मध्यान) की होनी चाहिए।
ध्यान
साधु शरीर से श्रम भले करते हों पर लक्ष्य अंदर की शान्ति का रहता है, यदि अन्तरंग में शान्ति नहीं तो ‘श्रम’ मजदूर के श्रम समान है।
ध्यान
कोटि-कोटि साधना का उद्देश्य मन को शान्त करना है, अन्यथा सारी साधना बेकार है।
ध्यान
जैसे चारों ओर से जलते हुए मकान में फँसे शिशु की चिंता एक माँ को होती है, वैसी चिंता साधक को सामायिक (आत्मध्यान) की होनी चाहिए।
ध्यान
साधु शरीर से श्रम भले करते हों पर लक्ष्य अंदर की शान्ति का रहता है, यदि अन्तरंग में शान्ति नहीं तो 'श्रम' मजदूर के श्रम समान है।
ध्यान
कोटि-कोटि साधना का उद्देश्य मन को शान्त करना है, अन्यथा सारी साधना बेकार है।
ध्यान
यदि जीवन में उन्नति करने और बुद्धिमानी की कोई बात है तो वह एकाग्रता है।
ध्यान
बाहर की हर चीज दौड़कर पाई जाती है, पर अन्दर की चीज ठहर कर पाई जाती है। सावधानी बुद्धिमत्ता की पहली सीढ़ी है।
ध्यान
मोक्ष प्राप्ति के लिए सभी को बारह भावनाओं का चिन्तन करना पड़ता है, फिर भले ही वह तीर्थंकर ही क्यों न हो?
ध्यान
अपनी अभिलाषाओं को वश में कर लेने के बाद मन को जितनी देर तक चाहो उतनी देर तक एकाग्र कर सकते हो।
ध्यान
जब विचार चंचल होता है तो वह अस्त-व्यस्त और शक्तिहीन हो जाता है, इसलिए विचारों की स्थिरता ही व्यक्ति को सम्पूर्ण बनाती है।
ध्यान
संसार में प्रत्येक कार्य में विजय प्राप्त करने के लिए एकाग्रचित्त होना आवश्यक है, जो लोग चित्त को चारों ओर से बिखेरकर काम करते हैं, उन्हें कभी सफलता नहीं मिलती है।
ध्यान
लक्ष्य साधने की सफलता अभ्यास से अधिक 'मन की एकाग्रता' पर निर्भर करती है।
ध्यान
मन की एकाग्रता ही लक्ष्य प्राप्ति का मूल मंत्र है।
ध्यान
लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लक्ष्य के प्रति एकाग्र होना आवश्यक है।
ध्यान
एकाग्रता एक उपयोगी, निरापद, निश्चित, लाभदायक और प्राप्त करने योग्य गुण है।
ध्यान
जो आत्मा जिस भाव रूप परिणमन करता है, वह उस भाव के साथ तन्मय हो जाता है, अतः अर्हन्त के ध्यान में तन्मय आत्मा स्वयं भाव अर्हन्त हो जाता है।
ध्यान
यह तो सुनिश्चित है कि बोलने के काल में बोलने वाला स्वलक्ष्य का श्रद्धानी चाहे बना रहे, परन्तु स्वलक्ष्योपयोगी नहीं रहता अतः अधिक मौन रहो, मौन मुमुक्षु का सर्वोपरि कार्य है।
ध्यान
पर का विचार करना और सत्य शान्ति पाना खून से वस्त्र धोकर स्वच्छ करने का व्यामोह है।
ध्यान
अपनी पर्याय पर भी दृष्टि रखकर निर्विकल्पता के स्वप्न देखना बबूल और नीम के बीज बोकर आम और सेव खाने की प्रतीक्षा करने जैसा है।
ध्यान
रहस्य उसी पर प्रकट हो सकता है जिसे तीव्र अंतर्दृष्टि प्राप्त है और जो एक मिनट भी व्यर्थ नहीं खोता है।
ध्यान
सुबह मन में अशुभ विचारों की नो एन्ट्री २४ मिनट के लिए कर दो, वे २४ मिनट आपको २४ घंटे संभाल लेंगे।
ध्यान
संसार में भटकने के लिए बहुत पुरुषार्थ करना पड़ता है किन्तु मोक्ष जाने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता मात्र शान्त बैठना पड़ता है।
ध्यान
एक क्षण भी स्वाध्याय, सत्समागम और ध्यान छोड़ना आपत्ति में पड़ना है अतः उन सब उपायों से अपने आपके आचरण को शुद्ध रखो।
ध्यान
लोग कहते हैं कि कुछ न करना प्रमाद है, कार्य करते रहना पुरुषार्थ है, तत्व कहता है कार्य करना प्रमाद है त्रियोग से कुछ न करना पुरुषार्थ है।
ध्यान
सोचना आस्रव (कर्म बंध का कारण) है, यदि सोचना पड़े तो निज शुद्धात्मा या परमात्मा का चिन्तन करो। इसी प्रकार बोलना पड़े तो ज्ञान-वैराग्य का विकास हो, ऐसा बोलो। तथा करना पड़े तो संयमित चेष्टा करो।
ध्यान
एकान्त निवास के अभिलाषियों को दृढ़ भेदविज्ञानी होना चाहिए अन्यथा एकान्त में पतित भी हो सकते हैं।
ध्यान
आपने जगत् के सारे जीवों के साथ रहकर जी लिया फिर भी भगवान् नहीं बन पाये, अब एक बार स्वयं के साथ रहना सीख लो तो सदा के लिए सिद्धों में वास हो जायेगा।
ध्यान
चित्त की निर्मलता से साधना निर्मल होती है।
ध्यान