Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Discernment (Vivek)

विवेक

522 सूत्र · पृष्ठ 6 / 7

प्रत्येक वस्तु किराये की हो सकती है, पर विवेक किराये से नहीं मिलता, वह तो निजी ही होना चाहिए।
विवेक
जैसे पानी से मकान बनता भी है तो गिरता भी है इसी प्रकार प्रशस्त और अप्रशस्त राग को जानना चाहिए।
विवेक
अज्ञानी प्राणी सुख को प्राप्त करने के लिए दुःख के साधन जुटाता है, गुण प्राप्त करने के लिए दोष देखता है, धर्म के लिए पाप करता है, उसका ऐसा करना मानो तैल के लिए रेत पेलने जैसा है।
विवेक
परिणामों का परिणाम- दोष अर्थात् दुर्बलता या विकारों से मुक्ति ही दुःखों से मुक्ति का उपाय है।
विवेक
सम्यक्त्व रत्न के बदले जो विषय सुख की आकाङ्क्षा करता है, वह मनुष्य उस विषयी मनुष्य के तुल्य है जो किसी दासी के साथ सम्भोग करने के बदले में चिन्तामणि रत्न देता है।
विवेक
दर्शन विशुद्धि- प्रारम्भ के चार अङ्ग निःशङ्कित, निःकाङ्क्षित निर्विचिकित्सा और अमूढ़दृष्टि वीतरागता प्रकट करते हैं एवं अन्त के चार अङ्ग उपगूहन, स्थितिकरण, वात्सल्य और प्रभावना सम्यग्दर्शन की विशुद्धि को बढ़ाने वाले हैं।
विवेक
अनुपगूहन- निन्दा का भाव वात्सल्य और स्थितिकरण के अभाव में होता है।
विवेक
हार्ट फ़ैल होना उतना हानिकारक नही जितना कि श्रद्धा का फ़ैल हो जाना हानिकारक है।
विवेक
सिंह को अपने शत्रु की पहचान होती है, कुत्ते को नहीं, इसी प्रकार सम्यग्दृष्टि को अपने वास्तविक शत्रु मिथ्यात्व की पहचान होती है मिथ्यादृष्टि को नहीं।
विवेक
व्यन्तर ने सेठ से अपनी पूजा का आग्रह किया, सेठ ने मना कर दिया, उसने कहा हम तुम्हारे लड़के को मार डालेंगे, सेठ ने कहा आयु पूर्ण हुए बिना कोई नहीं मरता, दुर्भाग्य से लड़का मर गया, व्यन्तर ने कुछ दिन बाद फिर कहा हमारी पूजा करो नहीं तो दूसरे लड़के को ले जायेंगे, सेठ ने कहा- हमको ले चलो हम तुम्हारी पूजा नहीं कर रहे हैं, लड़के ने क्या बिगाड़ा है, देव ने क्षमा माँगी, कोई किसी का कुछ नहीं कर सकता, अतः हमें भय और लोभ से भी व्यन्तरादि की पूजा नहीं करना चाहिए।
विवेक
तीन मूढ़ताओं से रहित आठ अङ्गों से सहित सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन कहलाता है।
विवेक
सम्यग्दर्शन से दुर्गति का नाश होता है, निर्दोष ज्ञान से कीर्ति की प्राप्ति होती है, चारित्र से लोक में पूजा होती है परन्तु मोक्ष तीनों की एकता से ही प्राप्त होता है।
विवेक
ज्ञानीजनों ने समस्त पापों को सरसों के समान और मिथ्यात्व को मेरु के समान उपमा दी है।
विवेक
जिस प्रकार राम को सीता का पता लगते ही प्राप्त करने की अत्यधिक छटपटी हुयी, उसी प्रकार अपनी आत्मा की खबर लगते ही सम्यग्दृष्टि को आत्मा की प्राप्ति की छटपटी होना चाहिए, जिसे छटपटी नहीं है वह सम्यग्दृष्टि नहीं है।
विवेक
विपत्ति में धैर्य रखने से, प्रारब्ध कार्य के पूर्ण करने आदि से तथा प्रशंसनीय प्रशम आदि गुणों से प्राणियों के आत्मरूप सम्यग्दर्शन का भी निर्णय किया जाता है।
विवेक
सम्यग्दर्शन के एक-एक अङ्ग को प्राप्त कर भव्य जीव मोक्ष को प्राप्त हुए हैं, फिर जो समस्त अङ्गों से सहित हैं वे क्या मुक्त नहीं होंगे, अर्थात् अवश्य होंगे।
विवेक
सम्यग्दर्शन रूपी रत्न का यह महान् गुण है कि दूसरे के द्वारा किये हुए दोष को भी प्रयत्न पूर्वक छिपाया जाता है।
विवेक
मनुष्य सम्यक्त्व के माहात्म्य से तीर्थंङ्कर तथा चक्रवर्ती आदि की विभूति को पाकर अन्त में मोक्ष रूप परमपद को प्राप्त होता है।
विवेक
आठ अङ्गों से सहित सम्यत्व दृढ़ होता है अन्यथा सम्यक्त्व की हानि होती है।
विवेक
सम्यक्त्व से रहित ध्यान दुःख का ही खजाना है, तप का फल सन्ताप मात्र है, स्वाध्याय भी बन्धन है, अज्ञानी जनों के इन्द्रिय निग्रह भी अच्छा फल देने वाले नहीं हैं, अनुपम दान, ब्रह्मचर्य निश्चय से श्री को देने वाले नहीं हैं, तथा तीर्थादि की यात्रा भी पूर्ण फल नहीं देती है, सभी कार्य अन्तर्गड़ु अर्थात् भीतर से सारहीन होते हैं अतः सम्यक्त्व प्राप्त करने का पुरुषार्थ करना चाहिए।
विवेक
संवेग, निर्वेग, निन्दा, गर्हा, उपशम, भक्ति, वात्सल्य, अनुकम्पा ये सम्यग्दर्शन के आठ गुण हैं।
विवेक
करूणा, वात्सल्य, सज्जनता, आत्मनिन्दा, समता, भक्ति, वैराग्य, धर्मानुराग ये भी सम्यग्दर्शन के आठगुण माने गये हैं।
विवेक
धर्म में, धर्म के फल में, शास्त्र में, परिग्रह रहित साधु में जो अत्यधिक अनुराग है वह संवेग कहलाता है।
विवेक
राग-द्वेष के कारण घोर दुष्कृत हो जाने पर गुरु के आगे दोषों को कहना आलोचना कहलाती है इसप्रकार आलोचना एवं प्रतिक्रमण आत्मशोधन की डायरी कहलाती है।
विवेक
शुद्ध सम्यग्दृष्टि जीव अविरति होने पर भी नरक, तिर्यञ्च, नपुंसक, स्त्री पर्याय, नीचकुल, विकृत अङ्ग, अल्पायु और दरिद्रता को प्राप्त नहीं होता है।
विवेक
सबसे बड़ा अन्धकार मिथ्यात्व है, जिसको करोड़ सूर्य भी नहीं हटा सकते हैं, यही सबसे बड़ी आग है जिसको मेघ भी नहीं बुझा सकते हैं, यही सबसे बड़ा जहर है जो प्राणियों को जन्म-जन्मान्तरों में विषाक्त बना कर रखता है।
विवेक
लोकमूढ़ता- आश्विन मास में लोग नदी में खड़े होकर पूर्वजों को पानी दे रहे थे, पण्डित बनारसीदास जी अपने घर की ओर मुँह करके पानी देने लगे, किसी ने पूछा क्या कर रहे हो? पण्डितजी ने कहा घर में गाय प्यासी बँधी है उसको पानी पिला रहे हैं, लोगों ने कहा यहाँ से गाय की प्यास कैसे बुझ जायगी? पण्डितजी ने कहा! जब आपके मृतक पूर्वज तृप्त हो सकते हैं तो मेरी गाय की प्यास क्यों नहीं बुझ सकती है, तब लोगों को अपनी अज्ञानता का अहसास हुआ।
विवेक
सम्यक्त्वी की पहचान- अपने में सम्यक्त्वी से होने वाले गुण प्रशमादि से उत्पन्न वचन व्यवहार और काय व्यवहार के अनुमान से जाने जाते हैं।
विवेक
तन, मन, धन पर दृष्टि रखने वाले मिथ्यादृष्टि है एवं पूजन, मनन, अध्ययन पर दृष्टि रखने वाले सम्यग्दृष्टि है।
विवेक
एक बुढ़िया सुई खोज रही थी, किसी ने पूछा हे अम्ब! क्या खोज रही हो? उसने कहा! सुई। सामने वाले ने कहा! प्रकाश में खोजो। बुढ़िया सड़क के उजाले में जाकर सुई को खोजने लगी, किसी ने पूँछा क्या खोज रही हो अम्मा? उसने कहा! सुई। सामने वाले ने पूँछा कहाँ गिरी है? अम्मा ने कहा! घर में। तब सामने वाले ने कहा! घर में उजाला कर के खोजो तब मिलेगी। उसी प्रकार हमारी आत्मा एवं शान्ति अन्दर है पर हम उसे बाहर पैसे, गाड़ी, सुविधा, ऐश-आराम आदि में खोज रहे हैं।
विवेक
जैसे मुख में जीभ साथ में आती है और दाँत बाद में, उसी तरह अगृहीत मिथ्यात्व साथ में आता है, गृहीत बाद में आता है, दूध में पानी मिलाना गृहीत है और जो स्वभाव से मिला है वह अगृहीत है।
विवेक
जैसे पनहारिन सिर पर जल का घट रखकर, हाथ छोड़कर चलती है, बातें करती है, हँसती है, लेकिन घट का सिर से सन्तुलन नहीं बिगड़ने देती है, प्रतिपल स्मृति घट पर रहती है कहीं गिर न जाये। जैसे गाय जङ्गल घास चरने जाती है, पर बछड़े का ध्यान हमेशा करती है। जैसे नृत्य कारिणी पूरे मञ्च पर नाचती है पर वाद्य स्वरों के साथ पैरों का संतुलन बनाकर रखती है, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव सबके बीच में रहता है, किन्तु अपने आत्मा को नहीं भूलता है।
विवेक
आठ अङ्ग बन्दर के भी होते हैं, मनुष्य के भी होते हैं, किन्तु जैसे मनुष्य के होते हैं, वैसे बन्दर के नहीं होते, उसी प्रकार आठ अङ्ग मिथ्यादृष्टि के भी होते हैं, सम्यग्दृष्टि के भी होते हैं, किन्तु जैसे सम्यग्दृष्टि के होते हैं, वैसे मिथ्यादृष्टि के नहीं होते हैं।
विवेक
जो सर्वश्रेष्ठ आत्मा को छोड़कर पर द्रव्यों में रमण करता है वही तो मिथ्यादृष्टि है, इसके अलावा और क्या मिथ्यादृष्टि के माथे पर सींग होते हैं?
विवेक
जैसे मन्त्र की पूर्णता विष को दूर करती है वैसे ही आठ अङ्ग की पूर्णता संसार को दूर करती है।
विवेक
सम्यक्त्व के साथ नरक में रहना अच्छा है, किन्तु सम्यक्त्व के बिना देवगति में भी रहना अच्छा नहीं है।
विवेक
हिंसा से रहित, एकाकी, समस्त उपद्रव को सहन करने वाला मनुष्य वृक्ष की तरह जङ्गल में रहने पर भी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान के बिना मोक्ष को प्राप्त नहीं होता है।
विवेक
अभव्य मिथ्यादृष्टि जीव जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहे गए तत्त्वों की श्रद्धा करता है, प्रतीति करता है, रुचि करता है, स्पर्श भी करता है किन्तु धर्म को भोग का कारण बनाता है कर्मक्षय का कारण नहीं बनाता है।
विवेक
हिंसा रहित धर्म, अठारह दोष रहित देव, निर्ग्रन्थ गुरु के श्रद्धान करने से सम्यग्दर्शन होता है।
विवेक
मिथ्यादृष्टि होने से मनुष्य पशु के समान है और सम्यग्दृष्टि होने से पशु मनुष्य के समान है।
विवेक
दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तप सम्यक्त्व के बिना पाषाण के समान है और सम्यक्त्व से सहित होने पर महामणि के समान मूल्यवान हो जाते हैं।
विवेक
संसारी प्राणी देखा-देखी करते हैं, परमार्थ का विचार नहीं करते, नारद जी ने कमण्डल को गुमने के भय से गङ्गा के किनारे रेत से ढक दिया, लोगों ने समझा इससे पुण्य होता होगा इसलिए सबने रेत के ढेर लगा दिए, नारद जी स्नान करके जब बाहर आये तो वहाँ पर रेत के अनेक ढेर बन गये नारद जी ने अपना कमण्डल बहुत खोजा किन्तु कमण्डल ही गुम गया यह लोकमूढ़ता है।
विवेक
तीन मूढ़ता, आठ मद, छह अनायतन, आठ शङ्कादि दोष ये सम्यग्दर्शन के पच्चीस दोष हैं।
विवेक
आठ मद, तीन मूढ़ता, छः अनायतन, आठ शङ्कादि दोष, सात व्यसन, सात भय, पाँच अतिचार, इन चवालीस दोषों से रहित सम्यग्दृष्टि होता है।
विवेक
सात भय, सात व्यसन, पच्चीस दोष से रहित, संसार शरीर भोगों से विरक्त, आठ अङ्ग सहित सम्यग्दृष्टिपञ्च परमेष्ठी का भक्त होता है।
विवेक
जो उग्र, तीव्र स्वभाव, दुष्ट, दुर्भाव, कुशास्त्र श्रवण करने वाला, दुष्टभाषी, मिथ्यामद से युक्त है वह मिथ्यादृष्टि है।
विवेक
जो क्षुद्र (नीच प्रकृति), रौद्र, रुष्ट, दूसरों का बुरा चाहने वाले, चुगलखोर, घमण्डी, ईर्ष्यालु, गायक, याचक, भण्ड वचन बोलने वाला, एवं जिसका दुष्ट स्वभाव है वह मिथ्यादृष्टि है।
विवेक
आत्मा के प्रति या शरीर के प्रति? लौकिक धन श्रेष्ठ है या ज्ञानधन? इन्द्रिय सुख का बहुमान या अतीन्द्रिय सुख का? इष्ट क्या है इन्द्रिय सुख या सम्यग्दर्शनादि? अनिष्ट क्या है? दुःख, आकुलता, मिथ्यादर्शन, मिथ्यादृष्टि इन्द्रिय सुख के लिये बीस हजार का वी.सी.आर., फ्रिज आदि खरीदता है लेकिन धर्म के लिए पुस्तक मन्दिर से लेकर पढ़ता है।
विवेक
मिथ्यादृष्टि मोक्ष के साधन भूत आत्मा का एक क्षण को भी चिन्तन नहीं करता, रात-दिन दूसरों के विषय में सोचता है।
विवेक
मिथ्यात्व पागल बना देता है, अनन्तानुबन्धी स्वगृह में प्रवेश नहीं करने देती है।
विवेक
मोह को निद्रा की उपमा दी है जैसे स्त्यानगृद्धि निद्रा में व्यक्ति बड़े-बड़े काम कर लेता है पर उसे खुद होश नहीं रहता मैं क्या कर रहा हूँ अथवा शराबी की चेष्टाओं के तुल्य मिथ्यादृष्टि की चेष्टाएँ होती है।
विवेक
करोड़पति बाप का बेटा करोड़ रुपये का भान न होने से रोड़पति बना रिक्शा चला रहा था, पिता के मित्र से पता चलते ही रिक्शा वहीं छोड़ देता है, उसी प्रकार संसारी प्राणी को आत्मा की भगवत्ता पता न होने से विषय कषाय में सुख खोज रहा है। सम्यग्दृष्टि होते ही विषय-कषाय से विरक्त हो जाता है।
विवेक
अज्ञानी जीव धतूरे में इत्र, वैश्या में चरित्र, दुर्दिन में मित्र और पापी हृदय में पवित्रता संसार में सुख खोजने में लगा है।
विवेक
प्रयत्न पूर्वक शरीर का एक-एक कण तपश्चरण में लगा करके, जीवन का एक-एक क्षण ज्ञान की साधना में अर्पण करके मानव जीवन को वरदान सिद्ध करना चाहिए अतः देव-शास्त्र-गुरु की निंदा नहीं विनय करके सम्यग्दर्शन की रक्षा करना चाहिए क्योंकि सम्यग्दर्शन लोक की सम्पत्ति से श्रेष्ठ है।
विवेक
भगवान् ने समस्त वस्तुओं को अनेकान्तात्मक कहा है सो यह सत्य है कि असत्य है ऐसी शङ्का नहीं करना निःशङ्कित अङ्ग कहलाता है।
विवेक
तत्त्व यही है, ऐसा ही है, अन्य नहीं है, अन्य प्रकार से भी नहीं है इस प्रकार तलवार पर चढ़ाये हुए पानी के समान दृढ़ श्रद्धान होना निःशङ्कित अङ्ग है।
विवेक
घर में सर्प की शङ्का होने पर नींद खत्म हो जाती है, उसी प्रकार जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कथित पदार्थ में शंका होने से सम्यग्दर्शन में दोष लग जाता है।
विवेक
धन, यौवन, परिवार पर शङ्का करना चाहिए देव-शास्त्र-गुरु पर नहीं।
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चार बदमाश एक-एक मील की दूरी पर खड़े हो गये और दक्षिणा में प्राप्त हुए बछड़े को चारों ने क्रम से कुत्ता कह दिया, पण्डित जी ने बछड़े को छोड़ दिया, उसी प्रकार दृढ़ श्रद्धा व पहचान न होने से धोखा होता है।
विवेक
देव का निन्दक दरिद्र, गुरु का निन्दक पापी, स्वामी का निन्दक कुष्ठी व गोत्र का निन्दक कुल का क्षय करने वाला होता है, साधु का निन्दक अपने आप को दूषित करता है, क्योंकि जो सूर्य पर भस्म फेंकता है वह भस्म उसी के सिर पर पड़ती है।
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व्रतादि क्रियाओं को करते हुए उनसे भोगों की इच्छा करना, कर्म और उसके फल में आत्मीय भाव रखना, अन्यदृष्टि प्रशंसा करना और काङ्क्षा रूप भाव मिथ्यात्व का चिन्ह है।
विवेक
जैसे उन्मत्त के मन में नाना प्रकार के विकल्प उठते हैं, वायु से समुद्र में तरङ्गें उठती हैं, वैसे ही मिथ्यात्व के उदय में नाना विकल्प उठते हैं।
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अन्तरित- भूतकाल में हुए राम-रावण आदि या भविष्य में होने वाले तीर्थंङ्कर आदि अन्तरित पदार्थ कहलाते हैं, एवं दूरवर्ती- द्वीप समुद्र स्वर्ग-नरक आदि दूरवर्ती पदार्थ कहलाते हैं। ये आस्तिक्य गुण के विषय हैं।
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इह लोक भय, पर लोक भय, मरण भय, वेदना भय, अगुप्ति भय, अनरक्षा भय, अकस्मात् भय सम्यग्दृष्टि इन सात भयों से रहित होता है।
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अञ्जनचोर के समान निःशङ्क होना चाहिए।
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यह सम्यग्दर्शन का सबसे उत्कृष्ट अङ्ग है।
विवेक
स्वभाव से अपवित्र किन्तु रत्नत्रय से पवित्र शरीर में ‘गुणों में प्रीति के कारण’ ग्लानि नहीं करना निर्विचिकित्सा अङ्ग माना गया है।
विवेक
भूख, प्यास, ठण्डी, गर्मी आदि नाना भावों में एवं मल-मूत्र आदि द्रव्यों में ग्लानि नहीं करना निर्विचिकित्सा अङ्ग है।
विवेक
अपने गुणों की प्रशंसा और दूसरों के अवगुणों की निन्दा करना विचिकित्सा है, उससे जो रहित है वह निर्विचिकित्सा है।
विवेक
राजा जनक की सभा में अष्टावक्र ऋषि गये, लोग एक दम हँस पड़े तो अष्टावक्र ऋषि बोले लोग मेरे चमड़े के आठों टेढ़े अङ्गों को देखकर हँसते हैं, अतः ये राजा जनक की सभा नहीं चर्मदर्शकों की सभा है।
विवेक
दुःखों के कारणभूत मार्ग में, खोटे मार्ग में स्थित व्यक्तियों के विषय में मन से सम्मति नहीं देना, शरीर से सम्बन्ध नहीं रखना, वचन से प्रशंसा नहीं करना अमूढ़दृष्टि अङ्ग माना जाता है।
विवेक
स्वयं शुद्ध मार्ग की, बालक व असमर्थ लोगों के द्वारा होने वाली निन्दा को जो दूर करते हैं, उसे उपगूहन अङ्ग कहते हैं।
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खोटे शास्त्रों में, मिथ्यामतों में एवं कुदेवों में आत्मज्ञानी को सावधानी रखनी चाहिये इसे अमूढ़दृष्टि अङ्ग कहते हैं।
विवेक
सम्यग्दर्शन की शोभा अमूढ़ता से है, सूक्ष्म, अन्तरित व दूरवर्ती पदार्थों में मूढ़ता नहीं होना चाहिए।
विवेक
नदी और सागर में स्नान करना, बालू और पत्थर के ढेर लगाना, पर्वत से गिरना और अग्नि में जलकर (सतिप्रथा को) धर्म मानना लोक मूढ़ता है।
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