हिंसोज्झितएकाकी, सर्वोपद्रवसहो वनस्थोऽपि। तरुरिव नरो न सिद्ध्यति, सम्यग्बोधादृते जातु।।
हिंसा से रहित, एकाकी, समस्त उपद्रव को सहन करने वाला मनुष्य वृक्ष की तरह जङ्गल में रहने पर भी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान के बिना मोक्ष को प्राप्त नहीं होता है।
A man free of violence, solitary, enduring all afflictions, dwelling in the forest like a tree — even so, without right-faith and right-knowledge he never attains liberation.
— आराध्य सूत्र · #56
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