Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Discernment (Vivek)

विवेक

522 सूत्र · पृष्ठ 7 / 7

वरदान की आशा से राग-द्वेष से मैले देवी-देवताओं की आराधना करना देव मूढ़ता कहलाती है।
विवेक
संसार में भ्रमण करने वाले, आरम्भ परिग्रही, हिंसक, कुगुरुओं का सम्मान करना गुरु मूढ़ता कहलाती है।
विवेक
सम्यग्दर्शन से अथवा चारित्र से चलायमान होने वालों को धर्मात्माओं के द्वारा फिर से उसी में स्थापित करना बुद्धिमानों ने स्थितिकरण अङ्ग कहा है।
विवेक
हमेशा मार्दव आदि भावना के द्वारा आत्म धर्म की वृद्धि करनी चाहिये पर के दोषों को ढ़कना चाहिए इसे उपगूहन अङ्ग कहते हैं।
विवेक
काम, क्रोध, मद आदि के द्वारा मोक्ष मार्ग से स्वयं अथवा दूसरों के चलायमान होने पर श्रुत एवं युक्ति के द्वारा स्थितिकरण करना चाहिये, धर्म में स्थित करना अधर्म में नहीं, अज्ञानी जन धर्म...
विवेक
आत्मीय गुणों की वृद्धि करना ही इसका लक्षण है, आत्मशुद्धि में दुर्बलता नहीं आने देना उपबृह्रण अथवा उपगूहन है, आत्मा को रत्नत्रय भाव से च्युत नहीं होने देना ही उपबृह्रण है, इससे गुण श्रेणी रूप से निर्जरा होती है। जिनेन्द्रभक्त सेठ की तरह, निन्दा उसी के कान में करें और प्रशंसा माइक से करें।
विवेक
जो दूसरों के दोष देखने में जागृत हैं और अपने दोष देखने के लिए हाथी की तरह आँख बन्द किये हुए हैं, वे बेचारे जैन मत के योग्य ही नहीं हैं।
विवेक
अपना हित करना चाहिए व जितना बने पर का भी करना चाहिए, परन्तु अपने और पर के हित में आत्महित अच्छा करना चाहिए।
विवेक
बराबरी वाला निन्दा या प्रशंसा करे तो ध्यान देना चाहिए।
विवेक
जहाँ सुमति तहाँ सम्पति नाना, जहाँ कुमति तहाँ विपति निधाना। जहाँ एकता है वहाँ अनेक प्रकार की समृद्धि व ऋद्धि सिद्धि होती है और जहाँ पर वैमनस्य होता है वहाँ पर अनेक प्रकार की विपत्तियाँ आती हैं।
विवेक
सहानुभूति और सहृदयता सुमति में होती है, यह स्वर्ग का द्वार है, जहाँ कुमति है वहाँ नरक का द्वार है एवं जीवन में दुःख, सङ्कट, तनाव व अशान्ति का कारण है।
विवेक
जहाँ सुमति तहां संपति नाना, जहाँ कुमति तहां विपति निधाना॥
विवेक
उपकारी नेवला- (क्रोध के समय विवेक खो जाता है) किसान की पत्नी पानी भरने गयी थी, उसका बालक पालने में सो रहा था, इतने में सर्प आया, नेवले ने सर्प को मारकर बच्चे की रक्षा की, नेवले के मुँह पर खून लगा देख कर महिला ने सोचा इसने बच्चे को मार डाला होगा और विना सोचे पानी का घड़ा नेवले के ऊपर पटक दिया, नेवला मर गया, अन्दर आकर देखा तो बालक सो रहा था और नीचे सर्प मरा हुआ पड़ा था, उसने विना सोचे परमोपकारी नेवले को मार डाला था।
विवेक
रसोई बनाने वाले को, कवि को, वैद्य को, गायक को, हाथ में शस्त्र लिये हुए को, स्वामी को, धनी को, मूर्ख को और रहस्य के जानने वाले को कुपित नहीं करना चाहिए।
विवेक
सूक्ष्मदर्शीदूरदर्शी यन्त्र- (सोच की वजह से एक को लाभ दूसरे को हानि)दो मित्र मेले से सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी यन्त्र लेकर आते है, एक मित्र तो सूक्ष्म दर्शी यन्त्र से सोने-चाँदी का मेल देखकर खरीदता जिससे व्यापार में कई गुना लाभ होने लगा एवं जब व्यापार से थक कर घर में आता और दूरदर्शी यन्त्र से दूरवर्ती बाग बगीचों को देखकर मनोरञ्जन करता और मौज मनाता, दूसरा मित्र रोटी के छोटे चिट्ठों को सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से देखता वे बड़े दिखाई देते तो पत्नी को डाँटता, इसी प्रकार घर के सूक्ष्म कचरे को देखता ज्यादा दिखाई देता तो नौकरों को डाँटता और दुःखी रहने लगा, वस्तु के सदुपयोग की कला न आने से व्यक्ति दुःखी होता है और सोच सही होने से सुखी होता है।
विवेक
मेरा देश महान, सौ में से सौ भगवान- एक बार द्रोणाचार्य ने धर्मराज युधिष्ठिर से सूची देकर कहा ! जाओ नगर में कितने दुर्जन हैं देखकर आओ और इसी प्रकार दुर्योधन को सूची देकर कहा ! जाओ नगर में कितने सज्जन हैं देखकर आओ, दोनों खाली सूची लेकर आ गये, धर्मराज बोले हमें एक भी दुर्जन नहीं मिला, और दुर्योधन बोले कि हमें एक भी सज्जन नहीं मिला, बस यही सकारात्मक और नकारात्मक दृष्टि-कोण में अन्तर होता है।
विवेक
भूल व्यक्ति को चूल पर पहुँचा देती है सचेत न होने पर धूल में मिला देती है।
विवेक
दृष्टि द्रव्य की तरफ हो, तो पर्याय का अहङ्कार नहीं होता है।
विवेक
जो व्यक्ति परीक्षा के विना किसी पर विश्वास करेगा वह आपत्तियों का घर बनेगा।
विवेक
कर्ज, घाव, अग्नि और कषाय इनको कभी थोड़ा नहीं समझना चाहिए क्योंकि ये बढ़ते–बढ़ते बहुत हो जाते हैं।
विवेक
अनेकान्त में शान्ति, एकान्त में अशान्ति व विवाद होता है, 'अस्वत्थामा हतो नरो वा कुञ्जरो वा' यह धर्मराज युधिष्ठिर का स्याद्वादी सिद्धान्त था।
विवेक
जो मूर्च्छा में जीता है वह मूर्ख है और जो होश में जीता है वह होशियार है।
विवेक
बालक वर्धमान ने स्याद्वाद सिद्ध किया- बच्चों ने माँ त्रिशला से पूँछा वर्धमान कहाँ पर हैं? माँ ने कहा ऊपर हैं, बच्चे दौड़कर तीसरी मञ्जिल में गये, वहाँ पिता सिद्धार्थ विराजमान थे, बच्चों ने पिताजी से पूँछा कि वर्धमान कहाँ पर हैं, पिताजी बोले नीचे हैं, बच्चे दूसरी मञ्जिल पर गये, वर्धमान से कहा आपके माता–पिता झूठे हैं, वर्धमान ने कहा नहीं, दोनों सही हैं, माँ की अपेक्षा ऊपर हैं, और पिता की अपेक्षा नीचे हैं, यही स्याद्वाद कहलाता है।
विवेक
दृष्टि को अन्तर्मुखी करने का मतलब अपनी बुराईयों को देखना और दूर करना है।
विवेक
विषयान्ध व्यक्ति अन्धे से भी बड़ा अन्धा है क्योंकि अन्धे को केवल आँखों से नहीं दिखता विषयान्ध की एक भी इन्द्रिय काम नहीं करती हैं।
विवेक
दुर्लभ मनुष्य पर्याय को विषय भोगों में लगाना प्याज की खेती में कपूर की बाड़ी लगाने के सामान है।
विवेक
कोई पदार्थ पहली बार दिखने पर दृष्टि विरागी होती हैं, वही पदार्थ दूसरी बार देखने पर राग होता है, और उसी पदार्थ को तीसरी बार देखने पर प्रायः विवेक नहीं रहता है।
विवेक
उपकरण बदले पर लक्ष्य एवं क्रिया कलाप नहीं बदले इसलिए संसार में ही रुल रहे हैं।
विवेक
जैसे अपने आय-व्यय का विचार न करने वाला व्यापारी अन्त में पछताता है, उसी तरह जो साधु अपने दोषों का परिमार्जन नहीं करता, वह भी व्यापारी की तरह कष्ट उठाता है।
विवेक
विवेकहीन जीव जिस देह से संसार बीज का सिञ्चन करते हैं, विवेकी जीव उसी देह से संसार बीज को सुखा देते हैं।
विवेक
जल तरणी विद्या- एक शिष्य ने बारह वर्ष में जल तरणी विद्या सिद्ध की, और उत्सुकता पूर्वक गुरु को बताया, तो गुरु ने कहा अरे दस रुपए की विद्या के लिए तुमने बारह वर्ष नष्ट कर दिए, नाविक को दस रुपए देकर पार हो जाते दस वर्ष क्यों गंवा दिए, यदि भव तरणी विद्या सीखी होती तो संसार से पार उतर गए होते।
विवेक
वह देव कैसा जो रागी द्वेषी हो, वह धर्म कैसा जहाँ दया न हो, भारी तप कैसा जहाँ ज्ञान न हो और वह विभूति किस काम की जो पात्र दान के काम न आए?
विवेक
आत्मकल्याण की चिन्ता होना उत्तम हैं, शरीर की चिन्ता होना मध्यम हैं, भोगों की चिन्ता होना जघन्य हैं और पर की चिन्ता होना अधम से भी अधम हैं।
विवेक
अन्तर दृष्टि का अभ्यास करो, लौकिक ख्याति से क्या होगा? मोह कृष करो, शरीर कृष करने से क्या होगा, ये दोनों अगर नहीं हैं तो बहुत सारे आवश्यकों का पालन करने से एवं प्रचुर काय क्लेश करने से क्या होगा?
विवेक
विवेक की दृष्टि खोना आँख की दृष्टि खोने से अधिक खराब है।
विवेक
किसी आम के वृक्ष तले दो व्यक्ति कहीं से आये थे, एक लगा पत्तों को गिनने, दूजे ने फल खाये थे। खाने वाला चतुर मात्र, गिनने वाला मूरख जानों, इसी तरह से ज्ञानी और अनुभवी भी पहिचानो।।
विवेक
कुत्ता हड्डी को चबाता है और सोचता है हड्डी से खून आ रहा है, उसी प्रकार अज्ञानी प्राणी समझता है, कि भोगों से आनन्द आ रहा है, पर आनन्द तो आत्मा का स्वभाव है जड़ का नहीं।
विवेक
धोबी के यहाँ से वस्त्र बदले हुए जानकर तुरन्त छोड़ देता है, उसी प्रकार ज्ञानी काम क्रोधादि को विभाव जानकार छोड़ देता है।
विवेक
जो नयदृष्टि से विहीन है उन्हें वस्तु स्वरूप की उपलब्धि नहीं होती और वस्तुस्वभाव से विहीन सम्यग्दृष्टि ही कहाँ होता है ?
विवेक
निश्चय-व्यवहार दोनों पक्के मित्र हैं लेकिन कार्य के समय दोनों शत्रु हैं, जैसे दो मित्र शतरञ्ज खेलते हैं, खेल के समय दोनों शत्रु हैं, शेष समय मित्र हैं।
विवेक
मञ्जिल पाने के लिये ट्रेन को पकड़ना भी पड़ेगा और छोड़ना भी पड़ेगा, उसी तरह मोक्ष को पाने के लिए व्यवहार को पकड़ना भी पड़ेगा और छोड़ना भी पड़ेगा।
विवेक
नाव से नदी पार होते हैं, नाव में बैठने से कि नाव को छोड़ने से ? यदि छोड़ते हैं तो बीच में छोड़ दें तो भी नदी पार नहीं होगी, जब छोड़ना है तो बैठना क्यों ? बैठना भी पड़ेगा और उस पार पहुँचने पर छोड़ना भी पड़ेगा।
विवेक
निश्चय व्यवहार शरण- अरहन्तादि व्यवहार शरण हैं आत्मा निश्चय शरण है, जैसे लड़की को पिता का घर व्यवहार शरण होता है, पति का घर निश्चय शरण होता है।
विवेक
व्यवहार की महिमा बोलने में है, और निश्चय की महिमा मौन में हैं।
विवेक
निश्चय मोक्षमार्ग के पिछत्तर पर्यायवाची नाम है।
विवेक
जब तक स्वरूप की प्राप्ति न हो तब तक दोनों नयों को पकड़कर रखना चाहिए।
विवेक
व्यक्ति अपने घर दोनों पैरों से जाता है उसी प्रकार आत्मा रुपी घर में जाने के लिए दोनों नयों की आवश्यकता होती है।
विवेक
निश्चय में एक का कल्याण होता है, व्यवहार में अनेकों का कल्याण होता है।
विवेक
वस्त्र को स्वभाव से गन्दा मान लेंगे, तो साफ करने का भाव नहीं होगा, इसी तरह अपने आप को शुद्ध मान लेंगे, तो शुद्ध करने का भाव नहीं होगा।
विवेक
निश्चय व्यहवार- रोटी को पहले तवे पर रखा जाता है बाद में आग पर रखा जाता है तब रोटी सिकती है, उसी प्रकार व्यवहार के आलम्बन पूर्वक निश्चय प्राप्त होता है।
विवेक
रोटी अग्नि सेंकती या तवा ? सीधे अग्नि में नहीं ड़ालते हैं, ठण्डे तवे पर भी नहीं ड़ालते हैं, जिस तवे रूप व्यवहार में अग्नि रूप निश्चय ने प्रवेश कर लिया, उस पर रोटी ड़ालते हैं, जब रोटी तवे पर कुछ कड़ी हो जाती है तो फिर अग्नि में ड़ाल देते हैं, इसी प्रकार प्रारम्भ में व्यवहार का आलम्बन लिया जाता है, बाद में निश्चय प्राप्त होता है।
विवेक
फूल लाल या सफेद- हनुमान जी ने रामचन्द्र जी से कहा ! अशोक वाटिका मुझे सबसे अच्छी लगी उसमें लाल फूल खिले थे, तभी बीच में सीता बोल पड़ी मैं उसमें बहुत दिन रही हूँ उसमें सफेद फूल खिले थे, हनुमान जी और सीताजी में लाल-सफेद रञ्ज पर बहस छिड़ी थी, तभी रामचन्द्रजी ने कहा आप दोनों सत्य बोल रहे हैं, तब हनुमानजी ने कहा सत्य तो एक ही होगा, रामचन्द्रजी ने कहा हनुमानजी जब आप अशोक वाटिका में थे तब क्रोध में थे, इसलिए लाल फूल दिखे, सीताजी उस समय आँसुओं से युक्त थी, इसलिए उसे सफेद फूल दिखे, अतः अपेक्षा से दोनों कथन सही हैं इसी प्रकार प्रत्येक विषय में समझना चाहिए।
विवेक
आँख निश्चनय और पैर व्यवहारनय के समान है जैसे आँख नहीं खोलेंगे तो वस्तु स्वरूप नहीं दिखेगा और चलेंगे नहीं तो मंजिल पर नहीं पहुँचेंगे।
विवेक
व्यवहार- कृष्ण जी शान्तिदूत बनकर दुर्योधन के पास गये, कहा पाण्डव पाँच गाँव में सन्तुष्ट हैं, युद्ध न करो, दुर्योधन ने कृष्णजी को फटकारते हुये बन्दी बनाने का आदेश दिया, तब कृष्णजी ने विराट रूप बनाकर दुर्योधन से कहा तू कौन सी मूली की जड़ है ? देखते-देखते उखाड़ कर फेक दूँगा, इस प्रकार व्यवहार नय से समझाया था।
विवेक
निश्चय- अर्जुन ने युद्ध क्षेत्र में कृष्णजी से पूँछा, किस-किस के साथ युद्ध करना है ? कृष्णजी ने बताया भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, दुर्योधन आदि के साथ, अर्जुन ने कहा रथ वापस ले चलो, जिनकी गोद में खेले, उनसे युद्ध कैसे करेंगे ? तब कृष्ण जी ने निश्चय का सहारा लेकर समझाया था- अर्थात्- आत्मा शस्त्र से छिदती नहीं है, आग से जलती नहीं है, पानी से भीगती नहीं है और वायु से सूखती नहीं है, इसलिए हे अर्जुन ! युद्ध करो।
विवेक
एक पैर से चलना और एक से सम्भलना होता है, उसी तरह व्यवहार-निश्चय नय को समझना चाहिए।
विवेक
पक्षी दो पंख के बिना उड़ नहीं सकता, गाड़ी दो पहियों के बिना चल नहीं सकती।
विवेक
ज्ञान के समय व्यवहार, ध्यान के समय निश्चय काम में आता है।
विवेक
ऊपर की सीढ़ी चढ़ने पर नीचे की सीढ़ी अपने आप छूट जाती है, उसी प्रकार निश्चय प्राप्त होने पर व्यवहार अपने आप छूट जाता है।
विवेक
नये कपडे मिलेंगे तो पहनेंगे अन्यथा नहीं तो ठण्ड सहनी पड़ेगी, इसी तरह अभी शुद्धपयोग...
विवेक
स्वचतुष्टय और परचतुष्टय- पेसेञ्जर का टिकट, पेसेञ्जर के द्रव्य की अपेक्षा है स्लीपर के द्रव्य की अपेक्षा नहीं है, कलकत्ता से दिल्ली के क्षेत्र की अपेक्षा टिकट है अन्य क्षेत्र की अपेक्षा नहीं है, निश्चित तारीक के काल की अपेक्षा टिकट है अन्य काल की अपेक्षा नहीं है, सेकेण्ड क्लास के भाव की अपेक्षा टिकट है फस्ट क्लास के भाव की अपेक्षा नहीं है।
विवेक
जैसे मन्दिर के सामने की फोटो मन्दिर नहीं है बल्कि भीतर-बाहर, आजू-बाजू सभी दीवालों की फोटो मिलाने से मन्दिर कहलाता है, उसी प्रकार वस्तु स्वरूप को समझना चाहिए।
विवेक
बीस प्रकार की भूलें- तीन गृहीत मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र, तीन अगृहीत मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र, सात गृहीत तत्त्व, सात अगृहीत तत्त्व सम्बन्धी भूल।
विवेक
काँटे का पैनापन निसर्गज है, बाण का पैनापन अधिगमज है, क्रोध की ललाई अधिगमज है, क्षमाभाव निसर्गज है, निज आत्मा को निज में लगाना निसर्गज है।
विवेक
मिथ्यादृष्टि- जैसे पित्त रोगी, बहिन को माता और माता को बहिन कहता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि का तत्त्वों के विषय में अनिश्चय रहता है।
विवेक
गजब का तमाशा- रामकृष्णपरमहँस जी का इन्दौर में प्रवचन था, प्रवचन के प्रारम्भ में उन्होंने दो-तीन बार कहा ! आज हमने गजब का तमाशा देखा, श्रोताओं को सुनने की उत्कण्ठा हुई, उन्होंने कहा ! एक महिला दो-तीन बच्चों के साथ धान कूट रही थी, वह बीच-बीच में बच्चों से बातें भी करती जाती थी, और फटाफट मूसल भी पटकती जाती थी, लेकिन एक भी मूसल उसके हाथ में नहीं लगा, उसी प्रकार ज्ञानी भी घर में रहता है, घर के सारे काम करता है, पर पाप कर्म से अपने को हमेशा बचाता रहता है।
विवेक
माता की सीख- 1.पञ्चपरमेष्ठी ही मङ्गल एवं शरणाधार हैं, 2.सिद्धचक्र की आराधना करना, 3.तात्कालिक चमत्कार में नहीं फँसना, 4.स्त्रियाँ स्वभाव से चञ्चल होती हैं उनका सहसा विश्वास नहीं करना, 5.परदेश में ढोंगी, कपटी, मिथ्याचारी कौन है इसे समझकर विवेक से आत्मरक्षा करना, 6.परदेश में अत्यन्त सावधानी की जरूरत है, 7.परधन व परस्त्री पर भूलकर भी दृष्टिपात नहीं करना, 8.सप्त व्यसनों से सदैव दूर रहना, 9.जल, ठग, कञ्जूस, हठी, शस्त्रधारी, नेत्रहीन, नख सींग वाले पशु, वेश्या, रोगी, ऋणि, बन्दी, शत्रु, जुआँरी, चोर, झूठ बोलने वालों का विश्वास नहीं करना, इनके मिष्ट व्यवहार को गुड़ लपेटी तलवार समझना, 10.जटाधारी, मुण्डितशिर भस्मधारी, तान्त्रिक वनवासी, कुबड़ा, बोना, काना, छोटी गर्दन वाला, डाकिनी, शाकिनी, दूतों, दासियों का विश्वास नहीं करना, 11.धन प्राप्त होने पर अहङ्कार नहीं करना, 12.सबको माता बहिन तुल्य समझना, 13.स्थान, वन, नगर, राजकुल का विश्वास नहीं करना, 14.घोड़े से सात हाथ, सींग वाले पशु से पाँच हाथ, नारी से बीस हाथ, हाथी से साठ हाथ की दूरी बनाए रखना, क्रूर पशु का और चार्वाक् मत का विश्वास नहीं करना, 15.बोलना कम-विचारना ज्यादा, 16.बैठना कम-चलना ज्यादा, 17.लेना कम-देना ज्यादा, 18.उपदेश कम देना-आचरण ज्यादा करना, 19.आज्ञा कम देना-सेवा ज्यादा करना, 20.खेद कम करना-प्रसन्न ज्यादा रहना।
विवेक
किसकी आँखों में क्या रहता है- 1.माँ की आँखों में ममता, 2.पिता की आँखों में फर्ज, 3.पत्नी की आँखों में कर्तव्य, 4.भाई की आँखों में प्यार, 5.बहिन की आँखों में दुलार, 6.अमीर की आँखों में अहङ्कार, 7.गरीब की आँखों में दीनता, 8.मित्र की आँखों में सहयोग, 9.दुश्मन की आँखों में बदला, 10.कामी की आँखों में वासना, 11.क्रोधी की आँखों में ललिमा, 12.मानी की आँखों में बड़प्पन, 13.लोभी की आँखों में स्वार्थ, 14.कपटी की आँखों में चंचलता, 15.ज्वाँरी की आँखों में धन, 16.मांसभक्षी की आँखों में क्रूरता, 17.सज्जन की आँखों में दया, 18.शिष्य की आँखों में आदर, 19.गुरु की आँखों में 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की भावना ही रहती है।
विवेक
पित्तज्वर वाले को दूध भी कड़वा लगता है।
विवेक
पुराण पढ़ने के साथ-साथ वर्तमान परिणति को भी पढ़ना चाहिए कि भविष्य में इसका परिणाम क्या होगा?
विवेक
जात न पूँछो साधु की पूँछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान।।
विवेक
शिष्य और शीशी को डाट जरुरी है, अन्यथा कीमती वस्तु नहीं ठहर सकती है।
विवेक