Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
विवेक

कापथे पथि दुःखानां, कापथस्थेऽप्यसम्मतिः। असम्पृक्तिरनुत्कीर्ति, र्मूढ़ा दृष्टिरुच्यते।।

दुःखों के कारणभूत मार्ग में, खोटे मार्ग में स्थित व्यक्तियों के विषय में मन से सम्मति नहीं देना, शरीर से सम्बन्ध नहीं रखना, वचन से प्रशंसा नहीं करना अमूढ़दृष्टि अङ्ग माना जाता है।

Not giving mental assent to the path that causes sorrow or to persons set on a wrong path, not associating with them bodily, and not praising them with speech, is held to be the limb of undeluded vision (amudhadrishti).

— आराध्य सूत्र · #1

इसी विषय के और सूत्र

सभी विवेक →
प्रकृति ने सूर्योदय, सूर्यास्त, गर्मी, बरसात, ठंड सब का समय निश्चित कर रखा है केवल मनुष्य को ही हर बात की छूट दे रखी है, कब सोना, कब जागना, क्या करना सब कुछ स्वयं मनुष्य के हाथ में है वह सब कुछ करने में स्वतंत्र है।
विवेक