Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
विवेक

स्वभावतोऽशुचौकाये, रत्नत्रयपवित्रिते। निर्जुगुप्सा गुणप्रीति, र्मता निर्विचिकित्सिता।।

स्वभाव से अपवित्र किन्तु रत्नत्रय से पवित्र शरीर में ‘गुणों में प्रीति के कारण’ ग्लानि नहीं करना निर्विचिकित्सा अङ्ग माना गया है।

Feeling no disgust toward a body that is by nature impure yet sanctified by the Three Jewels — 'because of love for its virtues' — is held to be the limb of freedom from disgust (nirvichikitsa).

— आराध्य सूत्र · #2

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प्रकृति ने सूर्योदय, सूर्यास्त, गर्मी, बरसात, ठंड सब का समय निश्चित कर रखा है केवल मनुष्य को ही हर बात की छूट दे रखी है, कब सोना, कब जागना, क्या करना सब कुछ स्वयं मनुष्य के हाथ में है वह सब कुछ करने में स्वतंत्र है।
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