Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Discernment (Vivek)

विवेक

522 सूत्र · पृष्ठ 5 / 7

तीव्र आकांक्षा में उचित-अनुचित के विचारने की क्षमता खो जाती है।
विवेक
विवेक, श्रुत से सहित हृदय जिन धर्म में तत्पर प्रशंसनीय है अन्य नहीं।
विवेक
कठिन समय में ज्ञानी रास्ता खोजता और अज्ञानी बहाना खोजता है।
विवेक
विवेक रहित लोगों को सज्जनों की वाणी अर्थहीन लगती है।
विवेक
कौन सा अनुयोग कब पढ़ना–यदि मन शङ्का शील हो तो द्रव्यानुयोग, प्रमादी हो तो चरणानुयोग, तीव्र कषाय हो तो प्रथमानुयोग और यदि मन जड़ हो गया हो तो करणानुयोग पढ़ना चाहिए, पञ्चम काल में प्रायः तीव्र कषायी लोग हैं अतः उन्हें प्रथमानुयोग पढ़कर कषाय मन्द करनी चाहिए।
विवेक
आयु, धन, घर के दोष, मन्त्र, व्यभिचार, औषध, दान, सम्मान-अपमान, ये नौ बातें अवश्य ही गुप्त रखें।
विवेक
एक महिला सिनेमा के पर्दे पर आन्धी-तूफान-वर्षा देख कर सोचने लगी, मेरे छत पर कपड़े सूख रहे हैं वे उड़ जायेंगे और भींग जायेंगे, उन्हे चलकर उठा लूँ, वह सिनेमा घर से उठकर शीघ्रता से घर की ओर चल पड़ी, शीघ्रता के कारण एक मोटर से टकराई और मरगई, उसी प्रकार संसारी प्राणी नकली को असली समझ कर भ्रम बुद्धि से दु:खी होते हैं।
विवेक
मेले में बेटा गुम गया, पुलिस ने मेन गेट पर खड़ा कर दिया, अब जिस प्रकार बेटे को माँ को ढूँढ़ने की ललक है, हमें आत्मा को ढूँढ़ने की ललक होनी चाहिए अन्यथा जीवन की शाम में क्या होगा?
विवेक
पहली मूर्ति एक कान से सुनती और दूसरे कान से निकाल देती थी, दूसरी मूर्ति कान से सुनती और देखकर मौन हो जाती, तीसरी मूर्ति कान से सुनती और मुँह से बता देती, चैथी मूर्ति कान से सुनती और ह्रदय में धारण कर लेती, इसलिए उनकी कीमत क्रमश: एक-दो-तीन-चार हजार थी, हम कौन सी और कितनी कीमत की मूर्ति हैं स्वयं पहचाने।
विवेक
बच्चे को गुलाबजामुन में रखकर दवा खिलाने की कोशिश की, माँ ने कहा बेटागुलाब जामुन खा लेना, मैं आ रही हूँ, और आकर पूछा! बेटा गुलाब जामुन खा ली? बच्चा बोला हाँ माँ गुलाबजामुन खा ली, गुठली बाहर थूक दी, उसी प्रकार लोग ख्याति पूजा लाभ की गुलाबजामुन खा लेते हैं, तत्त्वाभ्यास की गुठली थूक देते हैं।
विवेक
जो वक्ता शादी के समय कहे संसार असार है और मृत्यु के समय कहे बन्ना-बन्नी के गीत गाना चाहिए वह क्षेत्रकाल का ज्ञाता नहीं है।
विवेक
दूसरों के समान जो अपने दोषों को देखता है, वह शरीर से सहित होने पर भी मुक्त के समान है।
विवेक
स्त्रियों का, राजाओं का, युद्ध में समानता रखने वाले शत्रु का, शस्त्र वाले का, नदी का, नाखून और दाँत वाले का तथा सींग वाले का कभी विश्वास नहीं करना चाहिये।
विवेक
धन का नाश, मानसिक सन्ताप, घर के दुश्चरित्र, स्वयं का ठगा जाना एवं स्वयं के अपमान को बुद्धिमान प्रकाशित न करें।
विवेक
चलते हुए मैं खाता नहीं हूँ, हँसते हुए बोलता नहीं हूँ, नष्ट हुए का शोक नहीं करता, किए हुए कार्य का अहङ्कार नहीं करता, दो लोग बात कर रहे हों तो मैं बीच में नहीं बोलता, तब मैं मूर्ख कैसे कहलाऊँगा।
विवेक
मनुष्य पर्याय, उत्तम कुल में जन्म, लक्ष्मी, बुद्धि तथा कृतज्ञता ये सब विवेक के विना होते हुए भी कुछ नहीं हैं, अर्थात् विवेक के विना इनकी सार्थकता नहीं होती है।
विवेक
किसी भी क्षेत्र में जरूरत का सही आँकलन करना अथवा क्या करने योग्य है क्या नहीं करने योग्य है इसका ज्ञान होना औचित्य गुण कहलाता है, इसे ही विवेक कहते हैं।
विवेक
रोग में हितकारी भोजन करना, स्वामी के सामने सत्य बात कहना, दुष्ट के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना, शत्रु का क्षय करना, ज्ञान होने पर ध्यान करना, धन होने पर दान करना और स्त्री समूह के समक्ष कोमल व्यवहार करना औषध है।
विवेक
मानव उतनी ही नकल करता है, जितनी उसमें बुद्धि की कमी होती है, जब कोई निर्धन धनवान की नकल करता है, तो वह बर्बाद हो जाता है।
विवेक
वेषधारी साधु को, गुरु को, गौ को, ब्राह्मण को, राजा को, स्त्री को, मूर्ख को, बालक को और सर्प को ज्ञानीजन नाराज नहीं करते हैं।
विवेक
'हाव-भाव से, इशारे से, गति से, चेष्टा से, साथ-साथ बात करने से, नेत्र तथा मुख के विकार से' इतनी बातों से मनुष्य के मन की बातों का अनुमान हो जाता है।
विवेक
कमजोरियों को स्वीकारिये- अपनी कमजोरियों को जान लिया तो समझ लीजिए कि आपने उनको दूर करने का पहला कदम उठा लिया है, अपने आपको अपनी आँखों से देखिए दूसरों की आँखों से नहीं अर्थात् आत्मनिरीक्षण स्वयं कीजिए।
विवेक
परिस्थितियों के साथ सामञ्जस्य और समझौता करना सीखिए- विसङ्गतियाँ प्राणियों के कर्मानुसार बनती हैं, हमारी इच्छानुसार नहीं बन सकती हैं, अतः हम जिन चीजों को नियन्त्रित और परिवर्तित नहीं कर सकते हैं, उनके अनुसार अपने को ढालना और उनसे समझौता करना सीखना चाहिए।
विवेक
विरोधाभासी आकांक्षाओं को एक साथ उद्देश्य न बनाएँ, यदि आप धनवान बनने की इच्छा रखते हैं तो, सन्त बनने की इच्छा को तिलाञ्जलि देना होगा।
विवेक
प्रसिद्ध कहावत है कि दो नावों में सवार व्यक्ति कभी भी अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पाता है।
विवेक
अपने निर्णय स्वयं लें- आप दूसरों से सलाह ले सकते हैं, लेकिन अन्तिम निर्णय खुद का होना चाहिए, महान बनने के लिए आपको अपने जीवन में एक न एक खाई खुद ही पार करनी पड़ेगी, किसी न किसी दरवाजे से आपको अकेला ही निकलना होगा।
विवेक
कौन गलत है या सही है इसकी चिन्ता मत कीजिए, जबकि क्या सही है इसकी चिन्ता ज्यादा कीजिए।
विवेक
हँसी जिसे भाती नहीं, करवानी निज नाम। विना विचारे वह नहीं, करता बुध कुछ काम।।
विवेक
द्रव्य क्षेत्र साधन समय और स्वरूप विचार। करले पहले कार्य फिर करे विबुध विधि वार।।
विवेक
राजा का नाश खोटी मन्त्रणा से, मुनि का नाश परिग्रह से, कुल का नाश कुपुत्र से, लज्जा का नाश शराब से, स्नेह का नाश प्रवास से, समृद्धि का नाश अन्याय से, बालक का नाश लाड़-प्यार से, व्रतों का नाश अध्ययन नहीं करने से, ब्रह्मचर्य का नाश कुसङ्गति से, खेती का नाश देख-रेख न करने से, मैत्री का नाश स्नेह नहीं करने से, एवं धन का नाश आलस से हो जाता है।
विवेक
न्यायाधीश के चार गुण- शिष्टता पूर्वक सुनना, बुद्धिमत्ता पूर्ण उत्तर देना, गम्भीर होकर विचार करना, और निष्पक्ष न्याय करना।
विवेक
सहयोग लेकर या पूँछकर भटकने से बचो और समय बर्बाद करने से बचें, एक बार भटकने की अपेक्षा दो बार पूँछना अच्छा है।
विवेक
समस्याओं और कठिनाइयों का स्वागत करें- आप जीवन की प्रत्येक समस्या से शिक्षा और लाभ ले सकते हैं, और उससे अपने व्यक्तित्त्व का विकास कर सकते हैं। प्रत्येक सङ्कट और कठिनाई में अपने आप से पूछिये कि यह समस्या मुझे क्या सन्देश देती है तथा इससे मैं क्या लाभ उठा सकता हूँ? समस्या का सामना करने के बाद आपको पहले से अधिक बुद्धिमान और परिपक्व बनकर निकलना चाहिए। जीवन में जो भी बात आपके साथ घटित होती है वह अच्छाई के लिए होती है।
विवेक
जीवन में बहादुरी की जरुरत कभी-कभी पड़ती है किन्तु समझदारी की जरूरत हर समय पड़ती है।
विवेक
जल्दबाजी का व्यसन हमें विचार करने का मौका ही नहीं देता, विना विचारे किया गया कार्य सफल नहीं होता है।
विवेक
जब तक योग्य समय न प्राप्त हो, तब तक अपना बुरा करने वाले के साथ भी सद्व्यवहार करना चाहिए।
विवेक
कार्य के प्रारम्भ के पहले समय, स्थान और परिणाम के विषय में विचार जरूर कर लेना चाहिए।
विवेक
छलाङ्ग लगाने के पहले देख भाल कर लेना चाहिये।
विवेक
विना देखे किसी वस्तु का प्रयोग न करें और विना पढ़े कहीं हस्ताक्षर न करें।
विवेक
शेर को भी मक्खियों से रक्षा तो करना ही पड़ती है।
विवेक
कर्ज, फर्ज, मर्ज (रोग) कभी छोटे नहीं होते हैं।
विवेक
मित्र पर अन्ध श्रद्धा व शत्रु पर अन्ध अश्रद्धा नहीं होनी चाहिये।
विवेक
कञ्जूस अन्धा होता है, क्योंकि उसे धन के सिवाय कुछ भी दिखाई नहीं देता हैं। फिजूल खर्ची भी अन्धा होता है, वह आज को देखता है कल की नहीं सोचता। रिझाने वाली नारी अन्धी होती है वह बुढ़ापे की झुरियां नहीं देखती। अज्ञानी भी अन्धा होता है क्योंकि उसे कुछ समझ में नहीं आता है।
विवेक
पहले अपना निर्णय नहीं देना चाहिए, वस्तु निर्णय के तीन तत्त्व हैं अनुभव, ज्ञान और व्यक्त करने की क्षमता।
विवेक
लोभी को धन से, मानी को विनय से, मूर्ख को उसका मनोरथ पूरा करके, पण्डित को सच बोलकर, विनय से मित्र को, सम्मान से बाँधवों को, दान-मान से स्त्री व सेवकों को, तथा चतुराई से सबको वश में करना चाहिये।
विवेक
माया जब आती है तो बुद्धि चली जाती है, माया वेश्या है बुद्धि सती है, दोंनो की सङ्गति कैसे?
विवेक
अन्धकार में रास्ता बदल ने वाले को और अशान्ति में निर्णय लेने वाले को मञ्जिल नहीं मिलती है।
विवेक
भावुकता का भूत विना अनुभव के नहीं उतरता है।
विवेक
संसार में सुखी रहना है तो समन्वय करना सीखो, अन्यथा सब जगह से हटना पड़ेगा, परिस्थिति के अनुसार मनःस्थिति बनाकर समय के साथ चलो।
विवेक
सत्सङ्गति और विवेक ये दोनों निर्मल नेत्र हैं जिसके पास ये नहीं वह अन्धा है व कुमार्ग गामी क्यों नहीं होगा? 'अच्छा काम स्वयं से शुरू करें, बाद में दूसरों से कहें।
विवेक
सावधानी रखो- एक ही पत्थर से दुबारा टकराना मूर्खता है।
विवेक
जीवन में सुख के साथ विवेक न हो तो सुख विलासी बनाता है, और यदि दुःख के साथ विवेक न हो तो दुःख कायर बनाता है।
विवेक
केवल चाबी का गुच्छा मिलने से ताला नहीं खुलता बल्कि सही चाबी से ताला खोलने की कला समझिए।
विवेक
छः बातों से मूर्खता जानी जाती है- 1.अकारण क्रोध करना, 2.विना प्रयोजन वार्तालाप करना, 3.विना आधार पूँछताछ करना, 4.अपरिचित व्यक्ति का विश्वास करना, 5.शत्रु को मित्र समझना, 6.लोक विरुद्ध काम करना।
विवेक
सभी चीजें अनुभव करके नहीं छोड़ी जातीं, जैसे जहर खाकर नहीं छोड़ा जाता है।
विवेक
अपने दोष अपने को दिखाई नहीं देते जैसे अपनी आँख की लालिमा स्वयं को दिखाई नहीं देती, अगर कोई बताता है तो हमें नाराज न होकर उसे सुधार लेना चाहिए।
विवेक
निष्पक्ष होने से नई बात सीखने को मिलती है।
विवेक
इष्ट-अनिष्ट राग-द्वेष के फैसले हैं, वस्तु स्वरूप नहीं।
विवेक
अपनी भूल को समझने वाला स्वयं सुधरता है।
विवेक
विना विचारे की गयी दया, कहीं-कहीं हिंसा से बढ़कर होती है।
विवेक
अपने परिणामों को परखने की कला आ जाये बस यही तो जागृत होना है।
विवेक
विवेक की आँखें स्वयं को पतन से बचाती है।
विवेक
दूसरे लोगों के मस्तिष्क को पढ़ने का प्रयास करें, उन्हे ध्यान से देखें, और मानसिकता को परखें कि वे कैसी मनोदशा में है, उसके अनुसार वार्तालाप करें, देखें व्यक्ति बात करने के इच्छुक हैं या नहीं।
विवेक
क्या कभी आपने अपने से छोटों की कोई गलती पकड़ी है?
विवेक
क्या आप इस बात का ख्याल रखते हैं कि एक बार की हुई भूल को दूसरी बार न करें?
विवेक
क्या कभी आपने अपनी दानवता के दर्शन किए हैं?
विवेक
जैसे मूरख हाथी पाकर ईंधन उस पर ढोता है। तैसे मूरख अमृत पाकर अपने पग को धोता है।।
विवेक
साधु ऐसा चाहिए जैसे सूप स्वभाव। सार-सार को गहि रहे, थोथा देय उड़ाए।।
विवेक
हर एक के अभिप्राय को सुनकर कुछ समय विचार करो, सहसा कदम मत बढ़ाओ।
विवेक
मृत्यु के चार द्वार- अनुचित कार्य प्रारम्भ कर देना, आत्मीय जनों का विरोध करना, बलवान से स्पर्धा करना, स्त्रियों का विश्वास करना।
विवेक
उताबला सो बाबला- एक दिन कड़ाके की ठण्ड थी, उस दिन रानी चेलना का हाथ रजाई के बाहर रह गया, ठण्ड के कारण हाथ अकड़ गया, रानी की नींद खुली और हाथ की दशा देखकर मुँह से निकल गया, उनका क्या होगा? राजा ने आवाज सुनी लेकिन अभिप्राय नहीं समझ सका, उसने सोचा चेलना का सम्बन्ध किसी और से भी है, इसीलिए उसको याद कर रही है, राजा क्रोध में तमतमा उठा, म्यान से तलवार खींचकर रानी को मारने तैयार हो गया, उसको सामने एक पङ्क्ति लिखी दिखी 'सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः...' अर्थात् अचानक कोई काम नहीं करना चाहिए, क्योंकि 'अविवेक' आपत्तियों का बहुत बड़ा स्थान है, जो सोच विचार कर काम करते हैं, उन्हें गुणों की लोभी सम्पत्तियाँ स्वयं प्राप्त हो जाती हैं, यह पढ़कर राजा सहम गया, सोचा मारने के पहले पूँछ लें ये किसको याद करती है? राजा ने चेलना को जगाया और पूँछा तुम किसको याद कर रही हो? चेलना ने कहा स्वामिन्! कल अपन लोगों ने जङ्गल में नदी किनारे विराजमान मुनिको देखा था, वे ऐसी ठण्ड में वहाँ रहते हैं, मैं तो महल के अन्दर रजाई में हूँ, आज रजाई के बाहर हाथ रहा तो ये दशा हो गयी, तब मैंने सोचा उन मुनि का क्या होगा? राजा ने कहा ओहो! इसको स्वप्न में भी साधु दिखाई देते हैं, विना पूँछे तलवार चला देता तो मैं अपनी प्राण प्रिया को खो देता।
विवेक
लोग भगवान् को भी दोष देने से नहीं मानते, एक व्यक्ति बोला मैं ईश्वर से परेशान हूँ, लता में बड़े कद्दू लगाए और पेड़ में छोटे आम लगाए, जब आम के पेड़ के नीचे सोया और नाक पर आम गिरा तब समझ में आया कि भगवान् ने ठीक किया है। लोग अज्ञानता वश किसी की भी समीक्षा करने लगते हैं।
विवेक
समुद्र में पानी का बरसना व्यर्थ है, जिसका पेट भरा है उसको भोजन कराना व्यर्थ है, समर्थ को दान देना व्यर्थ है और दिन में दीपक जलाना भी व्यर्थ है।
विवेक
को स्वामी मम मित्र को, कहा देश में रीत। खरच किता आमद किती, सदा चिन्तवों मीत।।
विवेक
सीरियल= सी-देखो, रियल-वास्तविक, उसे देखो जिसके देखने से पाप का बन्ध न हो।
विवेक