Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
विवेक

जातेऽत्र दुष्कृते घोरे, रागद्वेषादि द्वेषतः। आलोचना मतागर्हा, गुरुणामग्रतो बुधैः।।

राग-द्वेष के कारण घोर दुष्कृत हो जाने पर गुरु के आगे दोषों को कहना आलोचना कहलाती है इसप्रकार आलोचना एवं प्रतिक्रमण आत्मशोधन की डायरी कहलाती है।

When a grievous misdeed occurs through attachment and aversion, confessing one's faults before the Guru is called alochana; thus alochana and pratikramana are called the diary of self-purification.

— आराध्य सूत्र · #29

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प्रकृति ने सूर्योदय, सूर्यास्त, गर्मी, बरसात, ठंड सब का समय निश्चित कर रखा है केवल मनुष्य को ही हर बात की छूट दे रखी है, कब सोना, कब जागना, क्या करना सब कुछ स्वयं मनुष्य के हाथ में है वह सब कुछ करने में स्वतंत्र है।
विवेक